EVM के मामले में ज्यादा घाटे में तो बीजेपी रही, बिखरा विपक्ष एकजुट जो हो गया

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EVM पर बहस की शुरुआत की बीएसपी ने, बवाल मचाया आप ने, साथ दिया समाजवादी पार्टी और टीएमसी ने, लड़ाई की अगुवाई की कांग्रेस ने – और विपक्ष एकजुट हो गया. आम आदमी पार्टी ने तो दिल्ली विधानसभा में ही EVM हैक करने का डेमो भी दे दिया. जब चुनाव आयोग ने हैक करने की चुनौती दी तो लीड रोल वाले सबके सब यू टर्न ले लिये. आगे आईं पिछली सीट वाली दो पार्टियां – सीपीएम और एनसीपी. चुनाव आयोग ने हैकॉथन की तारीख तय की तो आप ने नया पैंतरा लिया. अब आयोग के साथ साथ आप की ओर से भी 3 जून को समानांतर हैकॉथन हो रहा है.

हैकॉथन पर सवाल

आयोग के हैकॉथन का आम आदमी पार्टी इसलिए विरोध कर रही है क्योंकि उसे EVM हैक करने के लिए फ्री-हिट की सुविधा नहीं मिल रही है. आयोग के हैकॉथन पर आप नेता संजय सिंह ने बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस की और बोले, “हैकॉथन का मतलब होता है कि हैकर्स को खुली छूट दी जाये कि वो कुछ भी करे और EVM को हैक करके दिखाये.” आयोग ने हैकॉथन के लिए कुछ नियम बनाये हैं जो आप को रास नहीं आ रहे. संजय सिंह पूछते हैं, “अगर EVM को खोलने नहीं देंगें… उसके पुर्जे को समझने नहीं देंगे… मंत्र पढ़ कर बाहर से हैक तो किया नहीं जा सकता.”

हैकॉथन के लिए आयोग ने मशीनें खास तौर पर उन्हीं राज्यों से मंगाई हैं जहां इसी साल उसने चुनाव कराये. यूपी चुनाव के बाद मायावती ने बीएसपी की हार के लिए ईवीएम को ही दोषी ठहराया था. आप नेता अरविंद केजरीवाल ने ईवीएम पर सवाल उठाते हुए पंजाब से गड़बड़ियों के उदाहरण भी पेश किये थे. केजरीवाल ने एक उदाहरण महाराष्ट्र से भी पेश किया था लेकिन जांच में वो शिकायत ही गलत पाई गयी.

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हैक करो तो जानें!

चुनाव आयोग ने पंजाब के बठिंडा और पटियाला से तीन-तीन मशीनें मंगवाई हैं. इसी तरह यूपी में गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर और उत्तराखंड से भी मशीने मंगाई गयी हैं जिनमें बैलेट यूनिट, कंट्रोल यूनिट और वीवीपैट भी शामिल हैं.

वॉक इन चैलेंज

चुनाव आयोग के हैकॉथन में कुछ खास पार्टियों को ही हिस्सा लेने की इजाजत है जबकि आप का इवेंट वॉक इन चैलेंज जैसा है. आयोग के हैकॉथन में सिर्फ राष्ट्रीय स्तर की और पांच राज्यों – उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर, गोवा और पंजाब में चुनाव चुनाव लड़ चुकी पार्टियां ही हिस्सा ले सकती हैं.

टारगेट पर बीजेपी

ईवीएम को लेकर विरोधियों ने शुरू से ही केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी को निशाने पर रखा. इसे हवा देने का मौका उन्हें उस दिन मिला जब भिंड में चेकिंग के वक्त एक ईवीएम में कोई भी बटन दबाने पर बीजेपी का सिंबल आने की खबर आई. इस वाकये को लेकर बीजेपी के विरोधियों ने खूब शोर मचाया. हालांकि, चुनाव आयोग ने जांच में कोई गड़बड़ी नहीं पायी. जब कांग्रेस ने देखा कि ईवीएम के नाम पर विपक्षी दल एकजुट हो रहे हैं तो पार्टी अगुवाई के लिए आगे आ गयी. कांग्रेस नेताओं ने चुनाव आयोग से लेकर राष्ट्रपति भवन तक विपक्ष का नेतृत्व किया. जब कांग्रेस में ही इसका विरोध होने लगा तो पार्टी ने हैकॉथन से दूरी बना ली. शायद तब तक वो अपने मकसद में कामयाब हो चुकी थी.

एक तरफ सोनिया गांधी राष्ट्रपति चुनाव के नाम पर विपक्षी नेताओं से बातचीत कर रही थीं तो दूसरी तरह कांग्रेस नेता ईवीएम पर विपक्ष को किसी न किसी बहाने उलझाये हुए थे. जैसे ही कांग्रेस नेताओं को लगा कि बात बनने लगी, सोनिया गांधी की ओर से विपक्ष को सामूहिक लंच की दावत दी गयी. ये सच है कि नीतीश कुमार ने इस लंच से दूरी बना ली जबकि अरविंद केजरीवाल को न्योता ही नहीं भेजा गया. फिर भी ऐसी कई बातें हुईं जो विपक्षी एकता के लिए बेहद जरूरी हैं. सोनिया के भोज में जिस तरह अखिलेश यादव और मायावती को मिलते देखा गया उसको लेकर शायद ही किसी ने सोचा भी हो. गठबंधन के नाम पर दोनों साथ आने की बात जरूर किये थे, लेकिन मिलने पर मुस्कुराहट और गर्मजोशी भी नजर आएगी – कौन सोच सकता था. 1995 के गेस्ट हाउस कांड के बाद मायावती, मुलायम सिंह यादव के परिवार को फूटी आंख भी देखने को तैयार नहीं थीं, लेकिन ये ईवीएम जो चमत्कार न करा दे. ये तो सभी ने देखा कि किस तरह मायावती के ईवीएम पर हार का ठीकरा फोड़ते ही, कुछ देर बाद मीडिया के सामने आये अखिलेश यादव ने जांच की मांग कर डाली. ये ईवीएम ही थी जो यूपी में विपक्षी एकता की इमारत का नक्शा पास कराने में असरदार साबित हुई. वरना, कांग्रेस नेता तो चुनाव के वक्त हर उपाय करके थक चुके थे. यूपी में हार एक बड़ी वजह जरूर है लेकिन ये ईवीएम का बॉन्ड नहीं तो और क्या है कि अखिलेश यादव और मायावती 27 अगस्त को लालू प्रसाद की पटना रैली में मंच शेयर करने को लेकर सिर्फ तैयार नहीं बल्कि खूब उत्साहित भी हैं. सोनिया के भोज में शामिल 17 दल एकजुट होकर राष्ट्रपति चुनाव में सत्ता पक्ष को तो चुनौती देंगे ही – 2019 में भी जोर का झटका देने की तैयारी है.

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