इनके पंख किताब में रखे जाते थे, क्यों अब गला तोड़कर मारा जा रहा है

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राष्ट्रीय चिन्हों के अपमान पर लोग काफी नाराज हो जाते हैं. पर देश में राष्ट्रीय पक्षी की हालत बहुत खराब है. हमारे नेशनल बर्ड मोर का गला तोड़कर मार दिया जा रहा है और हमें इसकी खबर तक नहीं है. 5 मार्च 2017 को राजस्थान में कई मोरों की गर्दन तोड़ दी गई. मोरों को मारकर उनके पैर, चर्बी, पंखों का भस्म-चूरन बनाया जा रहा है. वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड (WWF) के लिए काम करने वाली संस्था TRAFFIC ने इस बारे में एक स्टडी पेश की है.

स्टडी के मुताबिक भारत में 3 सबसे पॉपुलर पुराने मेडिकल सिस्टम हैं. आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध. इन तीनों में ही मोर के पंख और बाकी के अंगों से दवाइयां बनाई जाती हैं. पर इन दवाइयों को बनाने के लिए बड़ी मात्रा में मोर मारे जा रहे हैं. तमिलनाडु, केरल, आंध्रप्रदेश, दिल्ली, गुजरात और राजस्थान में बनाई जा रही दवाइयों में इनका इस्तेमाल किया जा रहा है. अस्पतालों में बड़े स्तर पर ये चीजें बनाई और बेची जा रही हैं. सबसे बड़ी बात ये है कि इनमें से बहुत सारे अस्पताल केंद्र सरकार के आयुष मंत्रालय से फंड पाते हैं.

बीते सालों में मोरों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है. 2007 में अपने देश में 15 लाख मोर थे. कुछ निजी स्टडीज और एविडेंस के मुताबिक अब सिर्फ कुछ लाख मोर ही बचे हैं.

मोरों की मौत के मामले में राजस्थान सबसे ऊपर है. साल 2016 में राजस्थान के बूंदी जिले में 200 से ज्यादा मोर मार डाले गए. 5 मार्च को जिन मोरों के शव मिले हैं, उनकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट बताती है कि उन्हें जहर देकर नहीं बल्कि उनके गले की नली तोड़कर उन्हें मारा गया है. सिर्फ राजस्थान ही नहीं, पूरे देश में मोरों पर भयानक खतरा मंडरा रहा है. राजस्थान के साथ-साथ तमिलनाडु, यूपी, गुजरात, एमपी में भी मोरों की मौत में इजाफा हुआ है.

‘ट्रैफिक’ की स्टडी बताती है कि

मोर-पंख की राख से भस्म और चूर्ण बनाए जाते हैं. और इनको उल्टी, सुबह होने वाली बेचैनी, लगातार आ रही हिचकियों के इलाज के लिए बेचा जाता है. राजस्थान की रेवाड़ी कम्युनिटी में मोर-पंख की राख को शहद में मिलाकर दमा के मरीजों को और नारियल के तेल में मिलाकर सिरदर्द के लिए दिया जाता है. वहीं लड़का पैदा करवाने के लिए दूध में मिलाकर पिलाया जाता है. तमिलनाडु के कई सारे टूरिस्ट स्पॉट पर नारिकुरवर ट्राइब्स मोरों की चर्बी से बना तेल और घी बेचते नजर आ जाएंगे. मोरों के पैर और चर्बी का भी इस्तेमाल दवाइयां बनाने में किया जा रहा है. कुछ सिद्ध दवाई वाले मेडिकल स्टोर तो खुलेआम मोर की चर्बी बेच रहे हैं. मोर के पैर को पीसकर तिल के तेल में मिलाकर जोड़ों के दर्द की दवाई के तौर पर बेचा जा रहा है.

अपने देश में मोर-पंख बेचने पर कोई पाबंदी नहीं है. हालांकि इंडियन वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट, 1972 के तहत मोर (या किसी पक्षी) को मारने पर 7 साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है. लेकिन मोर के पंख को देख कर ये पता नहीं लगाया जा सकता कि ये मोर के गिराए हुए पंख हैं या उसे मारकर उखाड़े हुए. क्योंकि बेचने वाले मोर-पंख का निचला हिस्सा काट कर बेच रहे हैं.

 ‘ट्रैफिक’ 2 साल से देश के अलग-अलग राज्यों से ये डेटा इकट्ठा कर रहा है. उसके मुताबिक राजस्थान के गोदामों में तकरीबन 25 करोड़ 71 लाख मोर-पंख की गड्डियां भरी पड़ी हैं. गुजरात में 3 करोड़ मोर-पंख और तमिलनाडु में 2 लाख मोर-पंख की गड्डियां पाई गईं. मोर-पंख खरीदने में ओडीशा सबसे आगे है.

पैसे कमाने के चक्कर में मोरों को मार डालना न सिर्फ गैर-कानूनी है बल्कि अमानवीय भी है. वो बेजुबान हैं और इंसान उनसे ज्यादा ताकतवर है. अपनी ताकत का नाजायज फायदा उठाते हुए इंसान इन बेजुबानों का कत्ल करता ही जा रहा है. ऐसे ही पिछली दीपावली पर कर्मकांड के लिए उल्लुओं के मारे जाने की खबर सामने आई थी.

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