माननीयों के अंधविश्वास

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मध्यप्रदेश विधानसभा के शुरू हुए शीतकालीन सत्र का पहला दिन विधानसभा भवन में वास्तुदोष के भ्रमित मुद्दे पर उठाए गए प्रश्नों पर होम हो गया। सत्र की शुरुआत दिवंगत विधायकों और अन्य नेताओं को श्रद्धांजलि देने के साथ हुई। कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक केपी सिंह ने चौदहवीं विधानसभा में 9 विधायकों की मृत्यु को लेकर विधानसभा भवन में वास्तुदोष की शंका जाहिर की और सरकार से इसे परंपरा, कर्मकाण्ड और पुराणों में मौजूद उपायों से दूर कराने की मांग की। उनकी इस मांग का समर्थन संसदीय कार्यमंत्री नरोत्तम मिश्रा, उच्च शिक्षा मंत्री जयभान सिंह पवैया, सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग आदि ने किया। कांग्रेस विधायक मुकेश नायक ने दलील दी कि भवन में वास्तुदोष है तो विचार जरूर होना चाहिए।
बड़ा दुखद प्रसंग है कि हमारे जनप्रतिनिधि अंधविश्वास से भयभीत दिखाई देते हैं। विडंबना यह है कि 1996 से अरेरा पहाड़ी पर स्थित नवनिर्मित इंदिरा गांधी भवन में विधानसभा स्थानांतरित हुई थी, तब से अब तक 32 विधायकों का निधन हुआ है। इनमें से 2-3 विधायकों की दुर्घटना में मौत हुई है, किंतु अन्य सभी विधायक उम्रदराज थे और कुछ की मौत लाइलाज बीमारियों की वजह से हुई। इनमें से एक भी विधायक की मौत विधानसभा परिसर में नहीं हुई, इसलिए इन मौतों को एकाएक वास्तुदोष का कारण नहीं माना जा सकता है। जरूरत तो यह थी कि माननीय विधायक महाराष्ट्र की तर्ज पर अंधविश्वास के खिलाफ कानून बनाने की पहल करते और जागरूकता अभियान चलाते। यह विडंबना उस समय भी देखने में आई थी जब महाराष्ट्र विधानसभा में अंधविश्वास के खिलाफ कानून लाने में भागीदारी करने वाले मंत्री ही अंधविश्वास की मिसाल सार्वजनिक रुप से पेश करने लग गए थे। कानून का उल्लंघन राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के तत्कालीन श्रममंत्री हसन मशरुफ ने किया था। तब इसी पार्टी के एक नाराज कार्यकर्ता ने उनके चेहरे पर काली स्याही फेंक दी थी। इस कालिख से पोत दिए जाने के कारण मंत्री महोदय कथित रुप से ‘अशुद्ध’’ हो गए। इस अशुद्धि से शुद्धि का उपाय उनके प्रशंसकों ने दूध से स्नान कराकर किया था। यह वही महाराष्ट्र था, जहां अंधविश्वास के परिप्रेक्ष्य में मजबूत कानून लाने के लिए, लंबी लड़ाई लडऩेे वाले अंध-श्रद्धा निर्मूलन समिति’ के संस्थापक नरेंद्र दाभोलकर की हत्या अगस्त 2013 में चंद अंधविश्वासियों ने कर दी थी। हालांकि इसी शहादत के परिणामस्वरूप महाराष्ट्र सरकार अंधविश्वास के खिलाफ कानून बनाने के लिए मजबूर हुई थी। लेकिन जब विधायक और मंत्री ही टोनों टोटकों के भ्रम से न उबर पाएं तो कानून अपना असर कैसे दिखा पाएगा? जाहिर है, जब विधायिका ही अंधविश्वास की गिरफ्त में रहेगी तो सख्त कानून बन भी जाएं तो अंधविश्वास की समाज में पसरी जड़ताएं टूटने वाली नहीं हैं। दरअसल राज्य सरकारें अवैज्ञानिक सोच और रूढि़वादी ताकतों से लडऩेे का साहस ही नहीं जुटा पा रहीं हैं। हालांकि अंध-श्रद्धा निर्मूलन कानून इतना मजबूत है कि महाराष्ट्र सरकार अपने श्रममंत्री के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई कर सकती थी। इस कानून के दायरे में टोने-टोटके करने वाले-तांत्रिक, जादुई चमत्कार, दैवीय शक्ति की सवारी, व्यक्ति में आत्मा का प्रवेश और संतों के ईश्वरीय अवतार का दावा करने वाले सभी पाखंडी आते हैं। साथ ही मानसिक रोगियों पर भूत-प्रेत चढऩे और प्रेतात्मा से मुक्ति दिलाने के दावे करने वाले भी इसके दायरे में हैं। हसन मशरुफ इसलिए इस कानून के दायरे में आ सकते थे, क्योंकि उन्हें कालिख पोते जाने के अभिशाप से मुक्ति के लिए दूध से नहलाने का जो टोटका किया गया था, उसके दृश्य समाचार चैनलों पर दिखाए गए थे और अखबारों में छपे थे। हालांकि उन्होंने बाद में अपने इस पाखण्ड के लिए माफी भी मांगी थी।
राजनीतिकों के अंधविश्वास का यह कोई इकलौता उदाहरण नहीं है। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री रहे वीएस येदियुरप्पा अकसर इस भय से भयभीत रहते थे कि उनके विरोधी काला जादू करके उन्हें सत्ता से बेदखल न कर दें ? लेकिन वे सत्ता से बेदखल हुए और खनिज घोटालों में भागीदारी के चलते जेल भी गए। उन्होंने दुष्टात्माओं से मुक्ति के लिए कई मर्तबा ऐसे कर्मकांडों को आजमाया, जो उनकी जगहंसाई का कारण बने। वास्तुदोष के भ्रम के चलते येदियुरप्पा ने विधानसभा भवन के कक्ष में तोडफोड़ कराई। वसुंधरा राजे, रमन सिंह और शिवराज सिंह ने अपने मुख्यमंत्रित्व के पहले कार्यकालों में बारिश के लिए सोमयज्ञ कराए थे, लेकिन पानी नहीं बरसा। मध्यप्रदेश के पूर्व विधायक किशोर समरीते ने मुलायम सिंह को प्रधानमंत्री बनाने के लिए कामाख्या देवी के मंदिर में बलियां दीं, लेकिन मुलायम प्रधानमंत्री नहीं बन पाए ?
जाहिर है, ऐसे भयभीत नेताओं से समाज को दिशा नहीं मिल सकती ? यह विडंबना ही है कि नेता और प्रगतिशील सोच का बुद्धिजीवी मानने वाले लेखक-पत्रकार भी खबरिया चैनलों पर ज्योतिषीय-चमत्कार, तांत्रिक-क्रियाओं, टोनों-टोटकों और पुनर्जन्म की अलौकिक काल्पनिक गाथाएं गढक़र समाज में अंधविश्वास फैलाने में लगे हैं। भवन के वास्तुदोष में मौत के कारण ढूंढनेे की बजाय विधायक चिकित्सा सुविधाएं मजबूत करें और सडक़ दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों के उपाय यातायात नियमों के पालन में खोजे।
प्रमोद भार्गव

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