कालाबाजारियों के चंगुल में प्रदेश का हीरा भंडार

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भोपाल (विनोद कुमार उपाध्याय)। आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि मप्र के पन्ना जिले की खदानों से निकलने वाले अवैध हीरे से कई बड़े औद्योगिक घराने दमक रहे हैं। इसका खुलासा हाल ही में डायरेक्टोरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलीजेंस (डीआरआई) की एक जांच में सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, पन्ना में वैध खदानों के साथ ही अवैध खदानों की भरमार है। सफेदपोश, माफिया, पुलिस की मिलीभगत से हीरे की अवैध खदाने चल रही हैं। उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश के उत्तर-पूर्वी हिस्से में स्थित पन्ना जिला हीरे की खदानों के लिए दुनियाभर में मशहूर है।

 

एशिया की इकलौती डायमंड सिटी होने के कारण यहां नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एनएमडीसी) के अलावा निजी कंपनियां भी हीरा निकालने का काम करती हैं। यह इस बात का संकेत है की यहां के हीरे की खान से निकलने वाले हीरे की कालाबाजारी जारों पर है। उथली हीरा खदानों से निकलने वाले बेशकीमती हीरों का काला कारोबार बेखौफ जारी है। पन्ना जिले में संचालित होने वाली उथली खदानों से हर साल 500 करोड़ रुपए से भी अधिक कीमत के हीरे निकलते हैं, लेकिन हीरा कार्यालय में ये हीरे जमा नहीं हो पाते। अधिकांश हीरों की चोरी-छिपे बिक्री हो जाती है, जिससे शासन को हर साल करोड़ों रुपए के राजस्व की क्षति होती हैं।
पन्ना में 3.20 करोड़ कैरेट हीरे का भंडार
बुंदेलखंड के पन्ना की रत्नगर्भा धरती हीरा उगलती है। यहां 50 वर्ग किमी से ज्यादा क्षेत्रफल में हीरा पाया जाता है। जिले में तकरीबन 3.20 करोड़ कैरेट हीरे का भंडार है जिसकी अनुमानित कीमत कम से कम 8.64 लाख करोड़ रुपए है। इस भंडार से यहां हर साल 100 करोड़ रुपए का वैध कारोबार होता है, जबकि अवैध कारोबार का कोई हिसाब नहीं है। हीरे का यही अवैध करोबार दलालों, कंपनियों तथा मुंबई, सूरत और देश के दूसरे हीरा व्यापारियों को पन्ना में आकर्षित करता है। अब यहां के हीरे के आकर्षण ने कई औद्योगिक घरानों को आकर्षित किया है। जिसमें वेदांता व अदानी भी शामिल हैं।कलर, कैरेट, क्वालिटी और कट के आधार पर हीरे का मूल्य आंका जाता है। पन्ना की धरती से निकलने वाला हीरा अपने कलर, कैरेट और क्वालिटी के लिए विख्यात है। यही कारण है कि देशभर के हीरा व्यापारी खरीदारी के लिए यहां आते हैं। देश-विदेश में पन्ना के हीरे का आकर्षण बढ़ता देख इसका फायदा उठाने के लिए कई औद्योगिक घराने यहां की हीरा खदानों को पाने की कवायद में जुट गए हैं। फिलहाल सबकी नजर बंदर हीरा खान परियोजना पर है। इस परियोजना के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की खनन कंपनी नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एनएमडीसी), वेदांता और अदानी के साथ कई और नामी कंपनियां बोली लगा सकती हैं। राज्य सरकार इस साल के अंत तक देश की पहली हीरा खान की नीलामी करने जा रही है। हालांकि, देश की एकमात्र हीरा खनन करने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एनएमडीसी को इस क्षेत्र में निजी क्षेत्र की कंपनियों से कड़ी टक्कर मिल सकती है।
तस्करों और माफिया की नजर पन्ना के हीरों पर
आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि मप्र के पन्ना जिले की खदानों से निकलने वाले अवैध हीरे से कई बड़े औद्योगिक घराने दमक रहे हैं। इसका खुलासा हाल ही में डायरेक्टोरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलीजेंस (डीआरआई) की एक जांच में सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, पन्ना में वैध खदानों के साथ ही अवैध खदानों की भरमार है। सफेदपोश, माफिया, पुलिस की मिलीभगत से हीरे की अवैध खदाने चल रही हैं। उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश के उत्तर-पूर्वी हिस्से में स्थित पन्ना जिला हीरे की खदानों के लिए दुनियाभर में मशहूर है। एशिया की इकलौती डायमंड सिटी होने के कारण यहां नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एनएमडीसी) के अलावा निजी कंपनियां भी हीरा निकालने का काम करती हैं। यहां 17वीं शताब्दी से हीरे की खुदाई हो रही है। लेकिन इस जिले के लोगों की आर्थिक स्थिति आज भी बदहाल है। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने इस जिले को देश के 250 सबसे पिछड़े जिलों में शामिल किया। यह इस बात का संकेत है की यहां के हीरे की खान से निकलने वाले हीरे की कालाबाजारी जारों पर है। उथली हीरा खदानों से निकलने वाले बेशकीमती हीरों का काला कारोबार बेखौफ जारी है। पन्ना जिले में संचालित होने वाली उथली खदानों से हर साल 500 करोड़ रुपए से भी अधिक कीमत के हीरे निकलते हैं, लेकिन हीरा कार्यालय में ये हीरे जमा नहीं हो पाते। अधिकांश हीरों की चोरी-छिपे बिक्री हो जाती है, जिससे शासन को हर साल करोड़ों रुपए के राजस्व की क्षति होती है। उल्लेखनीय है कि पन्ना में देश का इकलौता हीरा कार्यालय है, जहां पर हीरा अधिकारी से लेकर हीरा पारखी, हवलदार व अन्य कर्मचारी पदस्थ हैं। हीरा कार्यालय से हर साल हीरों की खोज के लिए पट्टे जारी किए जाते हैं, जहां संबंधित व्यक्तियों द्वारा खुदाई कराई जाकर हीरों की तलाश की जाती है। राजस्व भूमि के अलावा हीरा कार्यालय द्वारा निजी पट्टे की भूमि में भी खदान संचालित करने की अनुमति दी जाती है, इसके अलावा हीरा धारित वन क्षेत्र में भी अवैध रूप से बड़ी संख्या में खदानें चलती हैं। विधानसभा में भी पन्ना की खदानों में हीरों के अवैध खनन का मामला उठ चुका है लेकिन हीरे का अवैध खनन निर्बाध जारी है। दरअसल, देश में हीरे की तस्करी बड़े ही सुनियोजित तरीके से की जा रही है और पन्ना के छोटे-छोटे तस्करों की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। पन्ना में अवैध रूप से खनन करके निकलने वाला कच्चा हीरा तस्करों के माध्यम से हीरा व्यवसायियों तक पहुंचाया जाता है। हीरा व्यवसायी उस कच्चे हीरे को विदेशों में भेजते हैं। जहां उस हीरे को तराशा जाता है और उसके गहने बनते हैं। वहां से बने गहने कैरियर के माध्यम से भारत लाए जाते हैं। पिछले साल मुंबई एटीएस के हाथ ऐसे सुराग मिले हैं जिसके अनुसार अंडरवल्र्ड सोने के बदले हीरे ले रहा हैं। इसमें से कुछ हीरे हवाला से पार हो रहे हैं तो कुछ दुबई के रास्ते पहुंच रहे हैं। यानी पूरे विश्व के तस्करों और माफिया की नजर पन्ना के हीरों पर है।
तस्करी के हीरे से दमक रहे बड़े घराने
खुफिया एजेंसियों के सूत्रों की माने तो देश के कई बड़े घराने पन्ना से तस्करी करके लाए गए हीरों से दमक रहे हैं। चार साल पहले, जुलाई 2013 में अंडर-गारमेंट में सिंगापुर से तस्करी के हीरे लाते एयरपोर्ट पर 4,000 करोड़ रुपए वाले सियाराम गु्रप की बहू विहारी सेठ (विहारी सेठ सिल्क के बड़े व्यवसाई सियाराम पोद्दार शूटिंग गु्रप की बहू और अभिषेक पोद्दार की पत्नी हैं। विहारी पोद्दार का परिवार सिंगापुर में रहता है। वहां उनका डायमंड व गोल्ड ज्वेलरी का भी व्यवसाय है। ) पकड़ी गई थीं। विहारी की जब्त लाल डायरी में दर्ज खरीदारों के नाम का तीन साल बाद अब जाकर खुलासा हुआ। डीआरआई ने कार्रवाई कर डायरी कोर्ट को सौंपी थी। जिसके डिटेल अब छनकर बाहर आए हैं। विहारी सेठ ने कुल 16.41 करोड़ रुपए के हीरे और सोने के जेवरात मुंबई के कई बड़े रसूखदार बिजनेसमैन को बेचे। काफी सस्ते में मंहगे जेवरात खरीदने में इन अमीरों ने यह नहीं सोचा कि इस माल का सोर्स क्या है। कहीं यह तस्करी का माल तो नहीं। उस समय विहारी के पास से बरामद लाल रंग की डायरी की डीआरआई ने छानबीन की तो माल खरीदने वाले मुंबई के नौ बड़े लोगों के नाम का खुलासा हो गया। डीआरआई की पूछताछ में सभी नौ लोगों ने अवैध खरीदारी की बात स्वीकार की तो उन पर जुर्माना लगा है। हालांकि, यह भी सफाई दी कि उन्हें नहीं पता था कि यह माल तस्करी का है। चार हजार करोड़ रुपए वाले सियाराम गु्रप की बहू के पैसा कमाने के लिए तस्करी पर उतरना हर किसी को हैरान करता है। हीरे की तस्करी बड़े ही सुनियोजित तरीके से इस मामले में डीआरआई और मुंबई एटीएस को जो सुराग मिले हैं वह बेहद चौंकाने वाले हैं।
महीनों लग जाते हैं सरकारी प्रक्रिया में
पन्ना जिले की उथली हीरा खदानों से प्राप्त होने वाले बेशकीमती हीरों की तस्करी क्यों होती है, इसकी तहकीकात किए जाने पर यह तथ्य सामने आया है कि हीरा कारोबार करने पर तुआदार (हीरा धारक) को तुरन्त पैसा नहीं मिलता। हीरा जमा होने पर जब नीलामी होती है और हीरा बिकता है तब पैसा मिलता है। इस प्रक्रिया में कई महीने लग जाते हंै, जबकि हीरा कारोबारियों को सीधे बेचने से तुआदार को तुरंत पैसा मिल जाता है। व्यवस्था में इस खामी के कारण ही अधिकांश हीरों की चोरी-छिपे बिक्री कर दी जाती है। पन्ना में भले ही कीमती पत्थरों की खुदाई होती है लेकिन कहीं भी हीरे की दुकानें नहीं दिखाई देती। कारण पन्ना में कीमती पत्थरों की तस्करी करने वाले स्मगलर।
एनएमडीसी से मुकाबले की तैयारी
पन्ना के हीरे के भंडार को देखकर विश्व की सबसे बड़ी खनन कंपनी रियो टिंटो ने जब बंदर हीरा खान परियोजना को अपने हाथ में लिया था, तभी से कई कंपनियां इस ओर आकर्षित हुई थी। वैश्विक खनन कंपनी रियो टिंटो ने अनुमान लगाया था कि इसमें प्रति 100 टन पर 70 कैरेट हीरा निकाला जा सकता है। रियो टिंटो के इस परियोजनाओं से हाथ खींचने के बाद मध्य प्रदेश सरकार ने अब इसकी नीलामी का फैसला किया है। सबसे पहले एनएमडीसी ने इस खान को पाने का प्रयास शुरू किया, क्योंकि एनएमडीसी के पास पन्ना में हीरे की एक खान है लेकिन अब एनएमडीसी को नीलामी में टक्कर देने के लिए वेदांता और अदानी भी तैयारी कर रही हैं। राज्य सरकार की ओर से अभी नीलामी की आधार कीमत या प्रति कैरेट राजस्व साझेदारी की घोषणा नहीं की गई है लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र की खनन कंपनी असमंजस में है कि कितने क्षेत्र में नीलामी की जा सकती है। मध्य प्रदेश के खनन सचिव मनोहर लाल दुबे ने बताया कि इस परियोजना के लिए निविदा आमंत्रित करने का नोटिस जल्द जारी किया जाएगा। यह एक ऑनलाइन निविदा प्रक्रिया होगी। बताया जाता है कि गौतम अदानी का अदानी गु्रप और लंदन-बेस्ड भारतीय अरबपति अनिल अग्रवाल के नियंत्रण वाली वेदांता रिसोर्सेज की छोटी टीमों ने हाल के महीनों में यहां का दौरा किया है। खनन सचिव भी स्वीकार करते हैं कि दोनों कंपनियों के अधिकारियों ने इस प्रोजेक्ट को लेकर उनसे मुलाकात की। सूत्र बताते हैं की दोनों कंपनियों ने अपने-अपने स्तर पर बंदर खान को पाने का प्रयास शुरू कर दिया है।
तराशने में नहीं होता वेस्ट हीरा
पन्ना की हीरा खदानों में घरानों के बढ़ते आकर्षण का सबसे बड़ा कारण है कि यहां के हीरे तराशने के बाद वेस्ट नहीं होते। पन्ना में हीरे की खुदाई के लिए 1968 में नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (एनएमडीसी) की स्थापना की गई थी। एनएमडीसी पन्ना जिले के मझगांव में हीरे की खदान का संचालन करती है, जो अब तक कई नायाब हीरे दे चुकी है। कहा जाता है कि यहां से निकला हीरा साउथ अफ्रीका की खदानों से भी अच्छा होता है। ये चमकदार होता है और काटने में कम वेस्ट होता है। एनएमडीसी की मानें तो ये खदान साल भर में करीब 100 हजार कैरेट हीरा उत्पादन कर सकती है। सर्वाधिक हीरा खदानें इटवां सर्किल में चलती हैं तथा इस क्षेत्र में सबसे अधिक हीरा भी निकलते हैं। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि सर्वाधिक हीरा खदानों वाले इस इलाके में निकलने वाले हीरे नियमानुसार हीरा कार्यालय में जमा नहीं होते। इटवां सर्किल में बगीचा, किटहा, हजारा, मडफा, हरका हजारा मुढ्ढा, रमखिरिया तथा सिरसा द्वारा आदि क्षेत्रों में हीरा खदान के पट्टे दिए जाते हैं। यहां खदानों से निकलने वाले हीरे यदा-कदा जमा होते हैं। अधिकांश खदानें बड़े कारोबारियों की होती हैं, इसलिए ये लोग हीरा मिलने पर उसे जमा करने के बजाय सीधे व्यापारियों को बिक्री कर देते हैं। इस काले कारोबार पर हीरा कार्यालय का सीधे तौर पर कोई अंकुश नहीं है, फलस्वरूप बेशकीमती हीरों की तस्करी का धंधा यहां खूब फल-फूल रहा है। पन्ना में आगेन नदी द्वारा बनाए गए ढेर में रामखेरिया नामक स्थान पर 12 से 18 मीटर की गहराई से हीरे प्राप्त होते है। इनका वार्षिक उत्पादन 11,000 कैरेट है। इसमें 50-60 प्रतिशत जवाहरात किस्म का हीरा होता है। पन्ना की ही खानों से नगों एवं औद्योगिक कार्यों के उपयुक्त पत्थर प्राप्त होता है। जानकारों के मुताबिक इटवां सर्किल में ही सौ से भी अधिक लोग ऐसे हैं जो सीधे तौर पर हीरा कारोबार से जुड़े हैं। हीरा खदानों में खुदाई का काम करने वाली जेसीबी मशीनें एक सीजन में दो से ढाई करोड़ रुपए का धंधा करती हैं। इतनी भारी-भरकम राशि हीरा खदानों में व्यय की जाती है, फिर भी इस क्षेत्र से एक भी हीरे जमा नहीं होते। यदि हीरे नहीं मिलते तो फिर हर साल लोग हीरों की तलाश में लाखों-करोड़ों रुपए क्यों खर्च करते हैं तथा यह पैसा कहां से आता है, कभी इस बात की गहराई से छानबीन की गई है। इसलिए पन्ना के हीरे की खानें अब बड़े कारोबारी घरानों को आकर्षित करने लगी हैं।

मजबूत चक्रव्यूह कालाबाजारी का
पन्ना जिले में हीरे की एक समानांतर अर्थव्यवस्था है। सरकारी व्यवस्था के ठीक विपरीत इस व्यवस्था में सबकुछ है। वैध के नाम पर जमकर अवैध उत्खनन हो रहा है। पुलिस-प्रशासन भी इसे अच्छे-से जानता है। डकैत तो खत्म हो गए लेकिन नए-नए व्यापारी और साहूकार खड़े हो गए हैं, जो इस अवैध कारोबार के लिए आग में घी का काम कर रहे हैं। इस काले कारोबार में मजबूत और ऊंची पहुंच वाले लोग भी शामिल हैं। करोड़ों रुपए का लेन-देन चौक-चौराहों पर ही हो जाता है। पन्ना जिले में ज्यादातर आपराधिक वारदातों के पीछे वजह हीरा ही होती है। अच्छी गुणवत्ता वाले हीरों की ज्यादातर खदानें अब आरक्षित वन क्षेत्र में चली गई है, जिससे कारोबार को नियंत्रित करना मुश्किल हो गया है। इससे अवैध कामकाज को भी ताकत मिल रही है। हीरा खनन में करीब 28 हजार से ज्यादा मजदूर और श्रमिक लगे हैं और करोड़ों रुपए के हीरे निकालने के बाद भी उनकी आर्थिक सेहत पर कोई असर नहीं दिखता।
हीरे की खदानों को कई लोगों को बनाया करोड़पति
हीरा मिलना वाकई भाग्य की बात है। हीरे की खदान लगाकर जहां कई लोग करोड़पति हो गए हैं, वहीं कई लोग घर की जमा-पूंजी दांव पर लगाकर कंगाल हो गए हैं। हीरे के खदान से निकलने से लेकर महानगरों तक पहुंचने के बीच करोड़ों का खेल हो जाता है। हीरा कालाबाजारी के इस कारोबार से जुड़े लोग बहुत मजबूत और पहुंच वाले हैं। यही कारण है कि हीरा विभाग और खनिज अमला हीरे से जुड़े मामलों में जल्दी हाथ नहीं डालते हैं। सूत्र बताते हैं कि जिले की वैध हीरा खदानों से निकलने वाले हीरे का 80 फीसदी से भी अधिक भाग कालाबाजारी की भेंट चढ़ जाता है, जबकि अवैध खदानों से निकलने वाले शत-प्रतिशत हीरे की कालाबाजारी हो जाती है। कालाबाजारी होने वाला अधिकांश हीरा स्थानीय हीरा कारोबारियों और बड़े लोगों से होकर गुजरता है। इसकी जानकारी पुलिस के साथ खनिज और जिला प्रशासन के अधिकारियों को भी होती है। हर माह करोड़ों के हीरे के अवैध कारोबार पर पुलिस प्रशासन भी हस्ताक्षेप नहीं करती है। पन्ना में मिलने वाले हीरे की अवैध बिक्री का आलम यह है कि ग्राम पंचायतों में लगने वाली हाट बाजारों में भी 8 से 10 लाख का कैश भुगतान हो जाता है। ग्राम पंचायत जमुनहाई की हाट बाजार में हीरे बिकवाने का काम करने वाले बिचौलिए ने बताया कि जिन्हें हीरा मिला होता है उसकी जानकारी उन लोगों तक पहुंच जाती है। इसके बाद इन्हें खरीदने के लिए पन्ना और बृजपुर सहित आसपास के व्यापारी संपर्क करते हैं। यहां चाय-पान की दुकानों में बैठकर लोग 8 से 10 लाख का कैश भुगतान कर देते हैं।
ज्ञातव्य है कि मंत्री कुसुम मेहदले ने मुख्यमंत्री को शिकायत की थी कि जून 2015 में खदान से 80 कैरेट का हीरा निकला था, जिसकी कीमत 50 करोड़ रुपए थी। वह हीरा खदान संचालकों और पुलिस अफसरों ने मिलीभगत कर बेच दिया है। इसके पहले एनएमडीसी ने 2010 में दावा किया था कि खदान से 37.68 कैरेट का हीरा निकला था, जिसकी कीमत करीब 1 करोड़ रुपए थी। एनएमडीसी का यह भी दावा था कि वह खदान से निकला अब तक का सबसे बड़ा हीरा था। पन्ना में ज्यादातर हीरे ऐसी खदानों से निकले हैं जो ज्यादा गहरी नहीं है। जमीन से दो से तीन फीट नीचे ही काफी बड़े हीरे निकले हैं। 1961 में 44.55 कैरेट का हीरा महुआ टोला की खदान से निकला था। इसके बाद 2015 में 80 कैरेट का हीरा निकला, जिसे लेकर खदान संचालक भाग गया। पन्ना में हीरा खदानें होने के बाद भी सरकार को न के बराबर लाभ हो रहा है। मंत्री कुसुम मेहदेले कहती हैं कि पत्थर तथा हीरा उत्खनन पन्ना जिले का प्रमुख उद्योग है। इनमें हजारों लोगों को रोजगार मिल रहा है।
हीरा कारोबार पर ‘असुरक्षा’ का साया
पन्ना का हीरा कारोबार ‘खदान से दुकान’ तक असुरक्षित है। चिंताजनक पहलू है कि, कभी सरकार और प्रशासन ने फिक्र तक नहीं की। हीरा खदानों में काम करने वाले मजदूरों से लेकर व्यापारी तक खतरे में हैं। यही कारण है कि दुनियाभर में चमक बिखेरने वाले पन्ना के हीरे की चमक से हीरा नगरी ही दूर है। करोड़ों के हीरे के अवैध कारोबार ने यहां पूरा एक रैकेट खड़ा कर दिया है। इससे यहां अपराधिक वारदातें तक होने लगी हैं। यहां हीरे के लिए हत्या, लूटपाट, छल-कपट और टोने-टोटके जैसी चीजें आम हो गई हैं। यहां हीरे के लिए लोग किस हद तक जा सकते हैं इसका ताजा खुलासा 8 नवंबर को हुआ। 8 नवंबर को पन्ना की विशेष अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए प्रतिष्ठित हीरा व्यवसायी रतन जडिक़ के हत्यारों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। हत्याकांड में शामिल एक महिला सहित कुल चार लोगों पर सजा के साथ ही जुर्माना भी लगाया गया है। हत्या लूट-डकैती ओर साक्ष्य छिपाने की धारा 302, 394, 397 ओर धारा 407 में अलग-अलग सजा सुनाई गई है। पुलिस के अनुसार, 23 फरवरी 2016 की रात 4 आरोपियों ने रतन जडिक़ के घर मे घुसकर उनकी बेरहमी से हत्या कर दी थी। जानकारी के अनुसार जिस दिन इस वारदात को अंजाम दिया गया, उसके कुछ दिन पहले से मृतक के परिजन मुंबई गए हुए थे। घटना के पूर्व पन्ना में ऐसी भी चर्चा थी कि हीरा व्यवसायी जडिक़ को कथित तौर पर एक बड़ा हीरा मिला है। इसी हीरे के लालच में आकर इन अपराधियों ने घटना को अंजाम दिया था। इसमें से दो आरोपी मृतक के पूर्व परिचित भी थे। आरोपियों ने पहले तो रतन जडिक़ का गला घोंटा फिर पैरों के अंगूठे में करंट के तार लगा दिए ताकि ये लगे कि करंट से मौत हुई है। लूट और हत्या करने के बाद आरोपियों ने रतन जडिय़ा के मकान पर बाहर से ताला लगा दिया था। दो दिन बाद मकान से बदबू आने पर किरायेदार द्वारा पुलिस को सूचना दी गई। मौके पर पहुंची पुलिस ने ताला तोडक़र देखा तो सभी के होश उड़ गए थे। पुलिस ने मौके पर बारीकी से छानबीन की। वैज्ञानिक अधिकारी और डॉग स्क्वॉड की मदद से आरोपियों तक पहुंचने में सफलता हासिल की। इस जघन्य हत्याकांड में 1 महिला सहित 3 आरोपी शामिल थे। जिनमें 2 आरोपी यूपी ओर 2 आरोपी एमपी के थे।
अपराधिक वारदातों के इर्द-गिर्द हीरा
पन्ना के आपराधिक इतिहास की सबसे अधिक दिल दहलाने वाली वारदात भी हीरे से जुड़ी है। जिसमें सन् 1996 में बड़े हीरा कारोबारी जडि$क परिवार के 6 लोगों की हत्या कर दी गई थी। दरअसल, जिले के हीराधारित पट्टी क्षेत्र में होने वाली अपराधिक वारदातों के इर्द-गिर्द हीरे की अहम भूमिका होती है। हीरे की खदानें लगाने वाले लोग भाग्य आजमाने के साथ टोटके भी करते रहते हैं, ताकि खदानों को किसी की नजर न लगे। जिन खदानों में हीरे ज्यादा मिलने लगते हैं वहां को लेकर लोग तरह-तरह की चर्चा करने लगते हैं। खदान लगाने वालों ने बताया कि खदानों को किसी की बुरी नजर न लगे इसलिए मवेशियों की हड्डियों को खदान के ऊपरी हिस्से में लगा दिया जाता है या रख दिया जाता है। हीरा मिलने को लेकर भी अन्य कइ तरह के टोटके आजमाए जाते हैं। कुछ लोग साधू-संतों को जमीन दिखाने के बाद खदान के लिए स्थान का चयन करते हैं। हीरे को लेकर जमीनों में कब्जे हिस्सेदारों को उनका हिस्सा नहीं देने सहित कई प्रकार के विवाद सामने आते रहे हैं। यहां हीरा है तो हीरे को लेकर विवाद भी है।
अवैध खदानों की भरमार
गौरतलब है कि जिले की उथली हीरा खदानों से जैम क्वालिटी का उच्च गुणवत्ता वाला हीरा निकलता है। यही कारण है कि यहां हीरे के लिए लूट मची है। हीरा विभाग के अनुसार जिले में 10 से 15 किमी के क्षेत्रफल की लंबी पट्टी में हीरा पाया जाता है। हीराधारित पट्टी भी कहते हैं। जिले में करीब 350 हीरा खदानों के पट्टे दिए गए हैं। एक हीरा खदान के लिए 200 रुपए में एक साल के लिए 8 बाई 8 मीटर का क्षेत्रफल आवंटित किया जाता है। हीरा विभाग के रिकॉर्ड से कई गुना ज्यादा खदानें पन्ना, बृजपुर, पहाड़ीखेड़ा सहित आसपास के क्षेत्र में चल रही हैं। इनमें से अधिकांश अवैध होती हैं। इन खदानों में न सिर्फ अवैध रूप से विस्फोट किए जाते हैं, बल्कि शत-प्रतिशत हीरे का कालाबाजारी भी हो रहा है। अवैध हीरा खदानों पर खनिज विभाग और जिला प्रशासन लगाम नहीं लगा पा रहा है। हीरा कारोबार से जुड़े लोग एक-दूसरे से छल कपट करते रहते हैं। जो लोग हीरा खदान लगाकर इस काम को छोड़ चुके हैं, उनके पूछने पर उत्तर मिलता है कि उनके पार्टनर ने धोखा दे दिया। इसके बाद उन्होंने खदान लगाना बंद कर दिया। पवई क्षेत्र के एक कारोबारी ने बताया कि उसने अपने रिश्ते के बड़े भाई के साथ मिलकर खदान लगाई थी। जब हीरे की चाल बीनने का समय आया तब उसे कहीं चाय लेने भेज दिया जाता था तो कहीं किसी काम से। पार्टनर चूंकि परिवार के ही लोग थे, इसलिए विश्वास में वह चला जाता था। जिस खदान में शत-प्रतिशत हीरा मिलने की उम्मीद थी, वहां उन्हें एक रुपए के भी हीरे नहीं मिले। बाद में मजदूरों से उन्हें पता चला कि उनके ही रिश्तेदारों ने धोखा दे दिया। हीरे के कारण न सिर्फ रिश्ते बिगड़ रहे हैं, बल्कि रिश्तेदार हत्या तक की वारदातों को अंजाम दे चुके हैं। ब्रजपुर, पहाड़ीखेड़ा के खेतों और जंगलों के साथ ही सतना जिले के बरौंधा का कुछ क्षेत्र भी हीरा धारित है। कुछ सालों पहले सतना के जंगलों में हीरों की संभावना कि लिए सर्वे हुआ था। हीरा धारित पट्टी का दो हजार हेक्टेयर का क्षेत्रफल पन्ना टाइगर रिजर्व के बफर जोन और रेगुलर फॉरेस्ट में चला गया है। अब उन क्षेत्रों में वैधानिक रूप से हीरों का उत्खनन नहीं हो पा रहा है। जबकि उन्हीं क्षेत्रों में पहले से अधिकतर अवैध खदानें हैं। उन्हीं से निकला हीरा करोड़ों के काले कारोबार का कारण है। हीरा कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि पूर्व में जिन खदानों में बड़ा और अच्छी क्वालिटी का हीरा मिलता है अब वह वन क्षेत्रों में चली गई हैं। वहां हीरे का डिपॉजिट भी अच्छा था। यही कारण है कि हीरों का अरोड़ों का अवैध कारोबार बिना रोक-टोक चल रहा है। इस पर अंकुश लगाए जाने के प्रयास भी नहीं किए गए हैं।
अवैध खदानें यूपी तक
जिले की सरहद से दूसरे जिलों के अलावा यूपी का भी घना जंगल है। जहां अंदर जाने पर दर्जनों उथली अवैध खदानें हैं। जिनमें आसपास के गांवों से लोग खुदाई के लिए जाते हैं। इन्हीं जंगलों में छोटे-बड़े डकैत घूमते हैं। यही हीरा खदानें उनकी आय का प्रमुख जरिया हैं। आए दिन वसूली के लिए डकैत धमकते रहते हैं। खदान मालिक या तो पैसा देकर जान छुड़ाते हैं अथवा खदान बंद कर चले जाते हैं। यूपी से लगे जंगल में जहां हीरा मिलने की संभावना होती है वह बरौंधा-चित्रकूट पट्टी में हैं। जिसका कुछ हिस्सा सतना जिले और कुछ यूपी के कर्वी जिले में है। कभी इन इलाके की खदानों से पैसा वसूलने कुख्यात डकैत ठोकिया, ददुआ और पप्पू यादव भी पहुंचते थे जो पुलिस मुठभेड़ में मारे जा चुके हैं। कभी हीरा मजदूरों के लिए सिरसा द्वारा सबसे ज्यादा दहशत का क्षेत्र था। कौहारी पंचायत में आने वाले इस इलाके में दशक पहले डकैत मजदूरों का अपहरण भी कर लेते थे जिन्हें खदान संचालकों से फिरौती लेकर छोड़ा जाता था। हालांकि, अब स्थितियों में सुधार है। कुछ डकैत मारे या पकड़े गए जिससे वारदातों में कमी आई है।
रियो टिंटो की दरियादिली अभी तक संदेह में
मप्र में पन्ना की धरती हीरा उगलती है। एक अरब का वैध कारोबार सालाना होता है। अकेले 55 करोड़ का एनएमडीसी ही करती है। 50 किलोमीटर से ज्यादा क्षेत्रफल में हीरा पाया जाता है। लेकिन हीरा भंडार क्षेत्र में आठ साल खनन करने के बाद भी रियो टिंटो करीब ढाई लाख रुपए की कीमत के 27 सौ कैरेट हीरे ही निकाल पाई। कंपनी बंद करने के बाद रियो टिंटो ने हीरे जमा कर दरियादिली दिखाई लेकिन वह आज भी संदेह के घेरे में है। दरअसल, सबसे बड़े हीरा भंडार क्षेत्र में रियो टिंटो सरकारी अनुमति लेकर करीब आठ साल तक प्रॉस्पेक्टिंग के लिए बोर होल व अन्य जरियों से खुदाई करती रही है। लेकिन प्रोजेक्ट बंद करने के ऐलान के बाद हीरा कार्यालय पन्ना में उसके द्वारा करीब ढाई लाख रुपए की कीमत के 27 सौ कैरेट हीरे जमा कराए गए थे। ज्ञातव्य है कि निवेश और लागत में कटौती करने का बहाना कर अगस्त 2016 में छतरपुर जिले के बंदर स्थित हीरा खनन परियोजना को बंद करने का ऐलान करने वाली रियो टिंटो कंपनी की तल्खी भी सामने आई थी। मीडिया रिलीज में कंपनी ने कहा कि हमने सरकार को बंदर प्रोजेक्ट को गिफ्ट कर दिया है। दरअसल, पन्ना की हीरा खदानों में सरकार से अधिक माफिया को फायदा हो रहा है। यही कारण है कि देशभर के हीरा व्यापारी खरीदारी के लिए आते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि रियो टिंटों ने भी 8 साल तक पन्ना की खदानों से अरबों का हीरा निकाला और सरकार को जमकर चूना लगाया। अब जब वेदांता व अदानी ने बंदर हीरा खान परियोजना में अपनी दिलचस्पी दिखाई है तो लोग इन्हें भी संदेह की नजर से देख रहे हैं।

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