शिवराज मंत्रिमंडल विस्तार ‘जरूरी’ या ‘मजबूरी’

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नए चेहरों के लिए रास्ता खोलना शिवराज के लिए चुनौती
भोपाल (राकेश अग्निहोत्री)। शिवराज सिंह चौहान ने विधानसभा सत्र के बाद मंत्रिमंडल विस्तार की नई संभावनाओं को हवा देकर एक साथ कई सवाल खड़े कर दिए। चाहे वह चुनोती नए चेहरों की इंट्री हो या फिर परफॉर्मेंस के आधार पर कुछ मंत्रियों की रवानगी ही क्यों न हो । लक्ष्य सरकार की छवि चमकाने और एंटी इनकंबेंसी से निजात दिलाने की होगी। सवाल मंत्रिमंडल विस्तार के लिए जरूर अनुकूल और प्रतिकूल समय से भी जुड़ते हैं। तो सबसे बड़ा संकट भरोसे का भी है कि यदि संकेत दिए तो वह अंजाम तक पहुंचता हुआ कब नजर आएगा। 12 साल का कीर्तिमान बनाने वाले शिवराज के लिए मिशन 2018 से पहले का यह प्रस्तावित अंतिम विस्तार विशेषाधिकार रखने वाले मुख्यमंत्री के लिए जरूरी है या फिर अब मजबूरी बन चुका है।
मंत्रिमंडल विस्तार और पुनर्गठन जो भी नाम दें शिवराज पर दबाव भले ही न हो लेकिन संकट भरोसे का जरूर नजर आता है कि आखिर उन्होंने विस्तार को लेकर जो संभावना जताई है वह आखिर पूरी कब होगी। बतौर मुख्यमंत्री तीन कार्यकाल में फेरबदल की याद ताजा की जाए तो उन्होंने अपनी सुविधा से ही अपनी टीम बनाई। फिर भी विधायकों की मुख्यमंत्री से अपेक्षा हो या फिर हाईकमान का भरोसा, सियासत में परसेप्शन और टाइमिंग के मापदंड पर शिवराज को भी गौर करना होगा। समय तेजी से निकल रहा है और वक्त का तकाजा भी है कि शिवराज विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए सरकार और विधायकों के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी की आशंका को बेअसर साबित करने के लिए पहली कड़ी के तौर पर अपने मंत्रिमंडल को एक नई पहचान दें। हम अभी मंत्रिमंडल के नए दावेदारों की बात से आगे उसके मकसद की करना चाहेंगे चाहे फिर वह क्षेत्रीय समीकरण दुरुस्त करने के लिए मध्यप्रदेश के भूगोल से इस प्रस्तावित विस्तार को यदि जोडक़र देखा जाए तो महाकौशल, बुंदेलखंड, विंध्य क्षेत्र पर मालवा-निमाड़ के समुचित प्रतिनिधित्व की दावेदारी ज्यादा नजर आती है । जहां चेहरों को चिन्हित कर उनकी स्वीकार्यता बनाकर उन्हें कैबिनेट में शामिल करना होगा। इसके लिए इंदौर की राजनीति से लेकर उज्जैन, झाबुआ के स्थानीय समीकरणों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बात सिर्फ भाजपा के अंदरूनी समीकरणों की ही नहीं बल्कि मिशन 2018 के दो बड़े चेहरे कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के दबदबे और प्रभाव को ध्यान में रखते हुए महाकौशल से लेकर ग्वालियर-चंबल क्षेत्र की जमावट का भी है। यह एक अंतिम मौका होगा जब लगातार सत्ता में रहते घर के अंदर की साफ-सफाई कर अपनी सरकार की दिशा के साथ उसकी नीति और नीयत खड़े किए जा रहे सवालों का जवाब वह चेहरे बदल कर दे सकते हैं ।
किसी चुनौती से कम नहीं नए चेहरों का चुनाव
अटेर और चित्रकूट उपचुनाव में मिली हार के बाद जब कोलारस और मुंगावली की बिसात भाजपा बिछा चुकी है तब अपने मंत्रियों के परफॉर्मेंस का आंकलन कर नए चेहरों के लिए रास्ता खोलना शिवराज के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगा क्योंकि एक दर्जन से ज्यादा मंत्रियों की जिम्मेदारी इन दो उपचुनावों को लेकर तय की जा चुकी है। ऐसे में क्षेत्रीय समीकरण दुरुस्त करने के साथ परफॉर्मेंस और नई संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए चेहरों की अदला-बदली सोच-समझ कर करना होगी। यह बात इसलिए कि शिवराज के 12 साल पूरे होने के बाद कानून व्यवस्था को लेकर भले ही ज्यादा हो हल्ला मचा हो लेकिन उन्होंने खुद अपनी प्राथमिकताओं में रोजगार के साथ स्वास्थ्य और शिक्षा को सबसे ऊपर बताया था जिसका जिक्र उन्होंने तीसरी पारी की शपथ के आगाज के साथ भी किया था उसकी जिम्मेदारी निभा रहे मंत्री क्या पर्फॉर्मेंस की कसौटी पर खरे उतर रहे हैं। जिन मंत्रियों की तैनाती मुंगावली और कोलारस में सुनिश्चित की गई है वो ऐसे विभाग से ताल्लुक रखते हैं। इन्हें हटाना या फिर इनके विभाग बदलना दो महत्वपूर्ण विकल्प मुख्यमंत्री के सामने होंगे। तीसरी और महत्वपूर्ण बात जब टीम शिवराज अपने विधायकों और मंत्रियों के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी की तह तक जाने के लिए सर्वेक्षणों का सहारा ले रही है तब विधानसभा चुनाव से पहले अंतिम विस्तार में ऐसे चेहरों से दूरी बनाना और इनकी जगह नए युवा-ऊर्जावान चेहरों को सामने लाना भी शिवराज के लिए जरूरी हो जाएगा जिससे अगले चुनाव में टिकट के दावेदारों को लेकर भी एक सकारात्मक संदेश कार्यकर्ताओं तक जा सके। वह बात और है कि टिकट बंटवारे के निर्णायक दौर में जाति, धर्म, वर्ग से परे जिताऊ चेहरों को टिकट से नवाजा जाता है। इसके लिए बीजेपी ने दूसरे दलों के लिए भी द्वार खोल देने की परंपरा को आगे ही बढ़ाया है। शिवराज सिंह चौहान उम्र के मापदंड पर पुरानी पीढ़ी के अनुभवी नेताओं को मंत्रिमंडल से रुखसत करने का सिलसिला जारी रखते हुए विस्तार कर सख्त फैसले लेने के संकेत फिर दे सकते है। बावजूद इसके उन पर दबाव होगा कि पीढ़ी परिवर्तन के दौर में वह मंत्रिमंडल में उबाऊ चेहरों और जिनका परफॉर्मेंस कहीं से भी संतोषजनक नहीं है उन्हें भी बाहर करें क्योंकि सीनियरिटी और खुद को मुख्यमंत्री का भरोसेमंद साबित कर कई मंत्री एक से ज्यादा पारी खेल चुके हैं लेकिन उनके विभाग में उपलब्धियों के नाम पर कुछ ज्यादा नहीं है।
विस्तार में दिखेगी 2018 की जमावट
जिन मंत्रियों पर भ्रष्टाचार में शामिल होने के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष आरोप लगते रहे हैं उनके बारे में भी मुख्यमंत्री को किसी निष्कर्ष पर जरूर पहुंचना होगा। कुछ विवादित नेता भी मंत्रिमंडल का हिस्सा बने हुए हैं जिनके कारण सरकार की किरकिरी भी हो चुकी है। कुल मिलाकर मिशन 2018 की जमावट के लिए जरूरी माने जाने वाले इस मंत्रिमंडल विस्तार के जरिए शिवराज अपने कार्यकर्ताओं ही नहीं प्रदेश के मतदाताओं और विरोधी दलों को भी स्पष्ट संकेत दे सकते हैं। इसके बाद ही अबकी बार 200 पार के दावे को पूरा करने के निकट भाजपा खड़ी नजर आ सकती है। मंत्रिमंडल विस्तार का क्राइटेरिया क्षेत्रीय, जातीय समीकरण मजबूत करना ही नहीं पुरानी और अनुभवी पीढ़ी की जगह नए चेहरे खासतौर से युवाओं को सामने लाने का भी बड़ा मौका होगा। तो शिवराज भरोसेमंद मंत्रिमंडल की एक ऐसी टीम को अस्तित्व में ला सकते हैं जो उन्हें अगले एक साल में मजबूत कर समस्याओं से निजात दिलाए। ऐसे में बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि क्या मंत्रिमंडल विस्तार का यह अनुकूल समय है। यही नहीं सबसे बड़ी बात यह है कि जब मोदी और शाह के लिए हिमाचल और गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे बहुत मायने रखते हैं और प्रचार के इस निर्णायक दौर में क्या मध्यप्रदेश में मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर उनकी ओर से हरी झंडी शिवराज को मिल चुकी है। खासतौर से तब जब मध्यप्रदेश में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी को लेकर नए सिरे से सवाल चित्रकूट उपचुनाव ने खड़े कर दिए। सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या मध्यप्रदेश संगठन और सरकार के मुखिया इस विस्तार को लेकर एक्सरसाइज कर चुके हैं। शायद चित्रकूट के बाद वह नए सिरे से जरूर सोचने को मजबूर हुए होंगे क्योंकि चित्रकूट में मुख्यमंत्री की पसंद को नजरअंदाज कर संगठन महामंत्री और सह संगठन महामंत्री की पसंद उम्मीदवार के तौर पर जब सामने आई तब जीत के समीकरण बदल चुके थे । ऐसे में यदि भाजपा में विधायक के एक उम्मीदवार को लेकर समन्वय नहीं बन पाने की खबरें सामने आती है तो मंत्रिमंडल विस्तार का विशेषाधिकार रखने वाले शिवराज से संगठन की अपेक्षाएं आखिर क्या होंगी।
गुजरात के नतीजों का भी होगा असर
गुजरात की जीत को लेकर मोदी और शाह पर भाजपा को पूरा भरोसा है लेकिन खुदा ना खास्ता यदि परिणाम अपेक्षा के विपरीत नकारात्मक रहे तो फिर भाजपा के अंदर नेतृत्व को लेकर ही नहीं बल्कि आने वाले राज्यों के चुनाव को लेकर एक नई बहस छिड़ सकती है। मोदी और शाह के गुजरात में एंटी इनकंबेंसी यदि सामने आती है तो फिर जिन राज्यों में भाजपा की सरकार है उसमें मध्यप्रदेश भी शामिल है तो भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ही नहीं बल्कि पर्दे के पीछे संघ के लिए भी जरूरी हो जाएगा कि मिशन 2019 को ध्यान में रखते हुए वह नए सिरे से जमावट करे। ऐसे में शिवराज के लिए अनुकूल समय जरूर है, लेकिन बदलती भाजपा में कब क्या हो जाए इसका अंदाजा जिम्मेदार पदों पर बैठे नेता भी नहीं लगा पाते। 12 साल का कीर्तिमान बनाने के बाद मंत्रिमंडल विस्तार की संभावनाओं का शिवराज का बयान और उसके बाद प्रदेश प्रभारी विनय सहस्रबुद्धे से लेकर प्रदेश संगठन के वरिष्ठ नेताओं के साथ मशविरा संकेत साफ है कि भाजपा के अंदर कुछ तो पक रहा है। यदि इसे मंत्रिमंडल विस्तार से जोड़ कर देखा जाए तो बड़ा सवाल यह खिचड़ी पक कर आखिर कब सामने आएगी। क्या शिवराज इस बड़े और अहम फैसले से पहले राहुल गांधी की ताजपोशी के बाद सामने आने वाली कांग्रेस की मध्यप्रदेश की स्क्रिप्ट का भी इंतजार करेंगे और उसके बाद मंत्रिमंडल का विस्तार करेंगे।

आठ चेहरे आ सकते हैं कैबिनेट में,कमजोर परफार्मेंस वाले मंत्रियों होगी की छुट्टी
शिवराज कैबिनेट में अभी छह स्थान रिक्त हैं। संभावना है कि कुछ मंत्रियों की छुट्टी कर आठ नए चेहरे कैबिनेट में शामिल किए जा सकते हैं।मंत्रिमंडल में अभी सीएम सहित 29 मंत्री शामिल हैं। इस लिहाज से अभी छह और नए चेहरों को स्थान दिया जा सकता है। इसके अलावा कुछ कमजोर परफार्मेंस वाले मंत्रियों की छुट्टी भी की जा सकती है। अस्वस्थता के चलते भी कुछ मंत्रियों को अवकाश दिए जाने की चर्चा सत्ता और संगठन के बीच चल रही हैं।माना जा रहा है कि कुसुम सिंह महदेले और हर्ष सिंह को स्वास्थ्य कारणों से अवकाश दिया जा सकता है। इसके अलावा जिन मंत्रियों का परफॉर्मेंस कमजोर रहा है, उनकी भी छुट्टी की जा सकती है। ऐसे मंत्रियों में सूर्यप्रकाश मीणा, गौरीशंकर बिसेन का नाम भी शामिल है।कैबिनेट विस्तार में मालवा निमाड़ को प्रतिनिधित्व मिलने की उम्मीद है। माना जा रहा है कि यशपाल सिंह सिसैदिया या लोकेन्द्र सिंह तोमर, जितेंद्र गेहलोत में से एक को कैबिनेट में स्थान दिया जा सकता है। इसी तरह धार से रंजना बघेल की फिर से कैबिनेट में वापसी हो सकती है। इंदौर को लेकर जो मंथन चल रहा है, उसमें रमेश मेंदोला या सुदर्शन गुप्ता में से कोई अथवा महेंद्र हार्डिया को लिए जाने पर चर्चा चल रही है। बैतूल से हेमंत खंडेलवाल, छिंदवाड़ा से रमेश दुबे या चंद्रभान सिंह, विंध्य से शंकरलाल तिवारी या केदार शुक्ला में से एक को स्थान मिल सकता है। श्योपुर से दुर्गालाल विजय को भी कैबिनेट में लेने की सुगबुगाहट है। रतलाम-झाबुआ लोकसभा में मिली हार के मद्देनजर निर्मला भूरिया को भी मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने पर विचार चल रहा है।

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