मनरेगा का जादुई कमाल 11 साल में भूत हुए मालामाल

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27, 326 मुर्दों को करोड़ों का भुगतान

भोपाल (विनोद उपाध्याय)
जो कहते हैं कि हथेली पर दूब नहीं उग सकती, वे एक बार मप्र तो आएं। यहां आपकी हथेली पर न केवल दूब उगाई जाएगी बल्कि उसकी विधि भी बता दी जाएगी। यहां पर सियासत, अफसरशाही और माफिया का ऐसा कॉकटेल है जो ऐसा करने में सक्षम है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा)में देखने को मिल रहा है।

सियासत, अफसरशाही और माफिया के मेल से मनरेगा मप्र में एक ऐसी जादुई योजना बन गई है कि इसमें रोजगार की गारंटी इतनी पक्की है कि मरने के बाद भी मजदूरी कराई जाती है। यहां के सरपंच और सचिवों की ईमानदारी देखिए कि वे मुर्दो को बाकायदा भुगतान भी करते हैं। ये किसी के आरोप नहीं, जिन्हें झुठलाया जा सके, बल्कि यह हकीकत मनरेगा की वेबसाइट में दर्ज है। उल्लेखनीय है कि देश में ग्रामीण बेरोजगारी, भूख और गरीबी से निजात दिलाने के लिए यूपीए सरकार ने 2006 में महत्वाकांक्षी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना शुरू की थी। आज 11 साल में मप्र में मनरेगा के तहत रिकार्ड तोड़ कार्य हुए हैं जिसके लिए प्रदेश को कई अवार्ड मिल चुके हैं। लेकिन इसका स्याह पक्ष यह है कि प्रदेश के 51 जिलों में अफसरों और सरपंच-सचिवों ने मिलकर जमकर फर्जीवाड़ा किया। इसके लिए तरह-तरह के तरीके अपनाए गए। इन्हीं में से एक है फर्जी मजदूरों द्वारा काम कराना। इस फर्जीवाड़े में सरपंचों और सचिवों ने ऐसा खेल खेला की मजदूरों की सूची में मृतकों का भी नाम जोड़ दिया। पूरे प्रदेश में अभी तक करीब 27,326 मुर्दों को करोड़ों का भुगतान कर दिया गया।
मजदूरों को पता नहीं कब खुल गया खाता
शिवपुरी के साथ ही श्योपुर, सतना, ग्वालियर, बालाघाट, छतरपुर, पन्ना, हरदा, सागर, मंडला, खरगोन, खंडवा आदि जिलों में भी हाल के दिनों में ऐसे मामले सामने आया हैं कि वहां मृत लोगों को भी मनरेगा के तहत मजदूरी कराई गई है। यही नहीं अधिकारियों, सरपंचों और सचिवों ने आपसी मिलीभगत से मजदूरों का खाता खुलवाकर उनके नाम की रकम निकालकर हड़प ली। हाल ही में श्योपुर के हटा विकासखंड के ग्राम पंचायत शिवपुर अंतर्गत आने वाले पुरानाखेड़ा गांव में कागजों पर बनाए गए खेल मैदान और मुक्तिधाम में मनरेगा अंतर्गत दर्शाए गए मजदूरों के फर्जी तरीके से खाते खोलकर लेनदेन करने का आरोप मजदूरों द्वारा लगाया गया है। इस पंचायत के उपसरंपच पति द्वारा उक्त मामले की शिकायत सागर कमिश्नर और लोकायुक्त में भी पांच माह पहले की गई थी जिसकी जांच हटा जनपद में आने के बाद भी जांच न करने का आरोप उपसरंपच पति द्वारा लगाया गया है। वहीं दोनों निर्माण स्थल पर नजर डाली जाए तो लगाए गए आरोपों की पुष्टि अपने आप साबित हो जाती है। इस संबंध में अधिकारियों द्वारा शिकायत प्राप्त होने पर कार्रवाई करने की बात कही जा रही है। जानकारी के अनुसार, ग्राम पंचायत शिवपुर अंतर्गत पंचायत द्वारा ग्राम पुरानाखेड़ा में मार्च 2017 में प्राथमिक स्कूल के सामने खेल मैदान और अन्य स्थल पर मुक्तिधाम का कागजी निर्माण करना पंचायत के पोर्टल पर दर्शाया गया। जिसमें मनरेगा अंतर्गत क्रमश: 71 हजार, 84 हजार रुपए का भुगतान इन कार्यों में मजदूरों के नाम उनके खाते में मजदूरी डालकर आहरण करना दर्शाया गया है। जिन मजदूरों के नाम पर यह कार्य करना व राशि डालना बताया गया है उनके अनुसार उन्होंने कोई कार्य किया ही नहीं है वह तो मजदूरी करने दिल्ली गए थे।
पिता को भी बना दिया मजदूर
शिवपुरी जनपद की ग्राम पंचायत गोपालपुर में ग्रामीणों की शिकायत पर अधिकारियों द्वारा की गई जांच में यह खुलासा हुआ है कि पंचायत के पूर्व सचिव ने गांव वालों से जॉब कार्ड में फर्जी मजदूरी करवा डाली। सचिव ने ऐसे लोगों के नाम भी जॉब कार्ड में भर दिए जो गांव में नहीं रहते। जानकारी के अनुसार जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी को ग्राम पंचायत गोपालपुर के ग्रामीणों ने शिकायत दर्ज कराई कि पंचायत का पूर्व सचिव रोशन सिंह वशिष्ठ जब गोपालपुर में पदस्थ था, तब उसने पिता निहाल सिंह वशिष्ट सहित अन्य ग्रामीणों के नाम पर जॉब कॉर्ड बनाकर उनसे फर्जी मजदूरी करवाई। इस शिकायत की जांच के लिए पंचायत विभाग ने पंचायत समन्वय अधिकारी आरके चौधरी, खंड पंचायत अधिकारी दौलत सिंह जाटव, सहायक यंत्री मनरेगा मुकेश जैन की तीन सदस्यीय टीम बनाकर मामले की जांच करवाई। जांच के दौरान टीम ने ग्रामीणों के बयान लेकर पंचनामा बनवाया, जिसके आधार पर टीम ने यह पाया कि पूर्व सचिव रोशन सिंह वशिष्ठ ने पंचायत में मनरेगा के जॉब कार्डों को संबंधितों को वितरित न करते हुए उनका दुरुपयोग किया है। तीन सदस्यीय दल को जांच में ग्रामीणों ने ये बताया जॉब कॉर्ड क्रमांक 607 का मुखिया निहाल सिंह वशिष्ठ 15-20 साल से गांव में नहीं रहता, उसने कोई मजदूरी नहीं की। वह सामाजिक न्याय विभाग का रिटायर्ड बाबू है। जॉब कॉर्ड क्रमांक 603 के अमरसिंह ने बताया कि वह पोस्ट मास्टर के पद पर पदस्थ था। उसे कोई जॉब कार्ड प्राप्त नहीं हुआ है और उसने कोई मजदूरी नहीं की है। जॉब कार्ड क्रमांक 547 का महेन्द्र सिंह गुना में फॉरेस्ट गार्ड के पद पर पदस्थ है। वह 20 साल से गांव में रहता ही नहीं। जॉब कार्ड क्रमांक 548 का शीतल सिंह इंदौर में प्रायवेट फैक्ट्री में कार्य करता है। उसका परिवार 20 साल से गांव में नहीं रहता। ग्रामीण लोकेंद्र सिंह के पिता अमरसिंह ने बताया कि लोकेंद्र 1991 से गांव में नहीं रहता। अमर सिंह के अनुसार उसके पुत्र रूपेन्द्र ने भी कोई मजदूरी नहीं की है। इस तरह के कई बयान गांव वाालों ने दर्ज कराए। जांच टीम ने इन बयानों को दर्ज कर रिपोर्ट लोकपाल व कोर्ट को सौंप दी है। उधर, बड़वानी जिले के निवाली जनपद पंचायत में सरपंचों व सचिवों ने लेखा रिकॉर्ड में हेराफेरी कर पांच करोड़ से ज्यादा का चूना सरकार को लगाया। अधिकारियों ने पक्के कुओं को भी मनरेगा में बना बताकर पैसा स्वीकृत करवा लिया और लाखों लोग जिन्होंने खुद कुएं बनाए थे उनका पैसा हड़प लिया। आईआईएम इंदौर की वर्ष 2012 की रिपोर्ट के मुताबिक धार जिले में सरकार की बिना अनुमति 38.99 करोड़ का कार्य स्वीकृत किए गए। इसमें से 23.24 करोड़ के कार्य कराए गए। जनपद पंचायत ने 170 लाख रुपए फोन पर प्राप्त सूचना आधार पर ग्राम पंचायतों के खाते में जमा किए और एक ही चेक के माध्यम से 8 जनपदों को 4 करोड़ 25 लाख की राशि जारी की। इसी तरह की गड़बड़ी झाबुआ और राजगढ़ जिले में भी सामने आईं ।
10-15 साल पहले मृत लोगों से भी करवा दी मजदूरी
मप्र में मनरेगा में किस तरह धांधली हो रही है, इसका ताजा मामला शिवपुरी में सामने आया है। राजधानी भोपाल में बैठे अधिकारियों की मिलीभगत से यहां सरपंच और सचिव भूतों से भी मजदूरी करा रहे हैं। 10 से 15 साल पहले मरे इन मजदूरों को लाखों रूपए की मजदूरी भी दी गई है। आदिवासियों की शिकायत पर पोहरी के तत्कालीन एसडीएम अंकित अस्थाना ने मामले की जांच की तो मृतकों से मनरेगा में मजदूरी करवाने की बात सही निकली और पाया कि मजदूरी के नाम पर लाखों रुपए का घोटाला किया गया है। जानकारी के अनुसार जिले में मनरेगा के तहत निरंतर घोटाले हो रहे हैं और जिसके चलते कई सहायक सचिव और सचिवों को विभागीय कार्यवाही के साथ सस्पेंड किया गया है। उसके बावजूद भी उक्त कर्मचारी अपनी करतूतों से बाज नहीं आ रहे है। जानकारी के अनुसार आदिवासियों ने पोहरी के तत्कालीन एसडीएम अंकित अस्थाना को शिकायत दर्ज कराई कि पंचायत सचिव विनोद शर्मा ने ग्राम गोहरा के मृतक आदिवासी गुड्डी पत्नी सुजान आदिवासी, बाबू आदिवासी, कंचन आदिवासी, पार्वती पत्नी सुरेश आदिवासी आदि से मनरेगा में मजदूरी करवा कर घोटाला किया है। जब इस मामले की जांच अंकित अस्थाना ने की तो पार्वती आदिवासी की मौत करीब 12 पहले हो चुकी है, इसी प्रकार कंचन आदिवासी व गुड्डी आदिवासी की मौत के संबंध में कंचन आदिवासी की पत्नी बैजंती आदिवासी ने बताया कि कंचन की मौत करीब 15 साल पहले हो चुकी है और उसकी बहू गुड्डी आदिवासी की मौत लगभग 9 साल पहले। कंचन की मौत गोवर्धन थाने में दर्ज तहरीर के आधार पर 2008 में होना पाया गया। बाबू आदिवासी के संबंध में उसकी पत्नी कमला ने बताया कि उसके पति की मौत 12 साल पहले हुई थी और उन्होंने मनरेगा में कोई मजदूरी नहीं की। पार्वती आदिवासी की मौत के संबंध में उसके पति सुरेश आदिवासी ने बताया कि उसकी पत्नी की मौत 10 साल पहले हो चुकी है जबकि पंचायत ने उसके द्वारा तालाब में मजदूरी करना दर्शाया है। खास बात यह है कि पूरा मामला उजागर होने के बाबजूद प्रकरण में जांच के दो महीने बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की गई है। ग्राम पंचायत ठेवला में जिन आदिवासियों की मृत्यु 10 से 15 पहले हो चुकी है उन्हें जीवित बताकर मनरेगा में मजदूरी पर दर्शाकर लाखों रूपये का भुगतान प्राप्त कर लिया गया। मृतक आदिवासियों को वर्ष 2013-14 में मनरेगा में मजदूरी पर दर्शाया गया और इस गलत काम को जायज ठहराने के लिए वर्ष 2014-15 के फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र भी जारी कर दिए गए। लाखों रूपए का आहरण करने का यह कारनामा ग्राम पंचायत ठेवला के पूर्व सचिव विनोद शर्मा, पूर्व सरपंच और पूर्व ग्राम रोजगार सहायक ने कर दिखाया है। वहीं वर्तमान सरपंच श्यामबिहारी शर्मा ने 10-15 साल पहले मृत हो चुके आदिवासियों को 2014-15 में मृत बताकर मृत्यु प्रमाण पत्र पुस्तिका में फर्जी प्रविष्टि की है। कंचन आदिवासी पुत्र बलदेव आदिवासी की मृत्यु के संबंध में थाना गोवर्धन का रोजनामचा क्रमांक 4703 दिनांक 2 मार्च 2008 संलग्न किया गया। जिसमें कंचन आदिवासी के नाम से बंदूक होने से उनकी मृत्यु हो जाने के बाद उनके नाम से जारी बंदूक कंचन के पुत्र ओमप्रकाश द्वारा थाना गोवर्धन में जमा कराई गई थी। थाना गोवर्धन के अभिलेखों में दर्ज तहरीर से कंचन आदिवासी की मृत्यु वर्ष 2008 में होना पुष्ट पाई गई। बाबू आदिवासी की मृत्यु के संबंध में बाबू की पत्नि कमला आदिवासी द्वारा बताया गया कि मेरे पति की मृत्यु 10 से 12 वर्ष पूर्व हुई थी तथा उनके द्वारा कोई मजदूरी नहीं की गई थी एवं न ही उसे मजदूरी का पैसा मिला है। पति का मृत्यु प्रमाण पत्र पंचायत द्वारा नहीं दिया गया है। उस समय सचिव विनोद शर्मा थे। अंकित अस्थाना ने जांच रिपोर्ट में उल्लेख किया है कि मृतक व्यक्तियों के संबंध में जो तथ्य शिकायत में उल्लेखित हैं, जांच में उनकी मौत 10-12 वर्ष के बीच में होना पाई गई। इसके अलावा ग्राम पंचायत द्वारा अनुक्रमांक 6 व 7 से मृतक व्यक्तियों को जारी किए गए प्रमाण पत्र संदिग्ध की श्रेणी में आते हैं। इसके अलावा मृतक व्यक्तियों से निर्माण कार्यों में मजदूरी करना दर्शाए जाने संबंधी आरोप पुष्ट पाए जाने से तत्समय पदस्थ रहे सरपंच, सचिव, ग्राम रोजगार सहायक को धनराशि गबनका दोषी तथा वर्तमान सचिव श्याम बिहारी शर्मा को गुड्डी व बाबू के कूट रचित दस्तावेज तैयार कर मृत्यु दर्शाए जाने का दोषी पाया जाता है।

अपने आप खुल गए खाते
उक्त कार्यों में कागजों पर दर्शाए गए मजदूरों के नाम से राशि निकालने के लिए यूनियन बैंक में मजदूरों के नाम से खाते भी खोल दिए गए और मजदूरों को इसकी जानकारी तक नहीं लगी। फर्जी तरीके से खोले गए खाते की जानकारी हाल में ही मजदूरों को बैंक जाकर पता चली है। मजदूरों के अनुसार वह उक्त बैंक में खाता खुलवाने गए तो पता चला कि उनका खाता पहले से खुला है और पिछले आठ माह से लेनदेन भी हो रहा है। खाते में पंचायत में होने वाले कार्यों की मजदूरी आ रही है जो बकायदा आहरण भी हो रही है। मजदूर जैंसा पिता मन्ना सहित अन्य कई मजदूर के नाम से यह खाते संचालित हो रहे हैं। यह लेनदेन यूनियन बैंक के एक कियोस्क सेंटर के माध्यम से हो रहा है। पंचायत द्वारा पुरानाखेड़ा के निर्माण में स्थानीय मजदूरों द्वारा काम करने की बात बताई जा रही है जबकि यह मजदूर दिल्ली में काम करने गए थे। इन मजदूरों के नाम से खुले खातों में किए गए कार्य का भुगतान भी दर्शाया गया है जिनमें जैंसा पिता मन्ना बंजारा, संतो पति घसिया, अमरी पति जैसा, भग्गी पिता जैंसा बंजारा, हीरा पिता नत्थू बंजारा सहित कई मजदूरों के नाम से आहरण हुआ है। इन मजदूरों के अनुसार उन्होंने कोई भी कार्य पंचायत में नहीं किया है। उन्हें तो बैंक से पता चला है कि यूनियन बैंक में उनके खाते खुले हैं और लेनदेन हो रहा है।

8,81,0000 मजदूर हुए कंगाल
मप्र में ऐसी जादुई योजना बन गई है कि अफसरों से लेकर सरपंच-सचिव मालामाल हो गए हैं, वहीं मजदूरी करने वाले अभी भी बेहाल हैं। आलम यह है की पिछले 4 माह से तो केंद्र सरकार ने 19 राज्यों को फंड ही नहीं भेजा। इसका परिणाम यह हुआ है की मप्र के 8 लाख 81 हजार मजदूरों को 5 माह से मजदूरी ही नहीं मिली है। इससे मजदूरों के सामने खाने के लाले पड़ गए हैं। दरअसल, केंद्र सरकार ने मनरेगा के तहत 19 राज्यों में लगभग 92 मिलियन श्रमिकों के लिए मजदूरी का भुगतान नहीं किया गया है। मनरेगा संघर्ष मोर्चा के मुताबिक 92 मिलियन से अधिक सक्रिय मजदूरों को समय पर उनकी मजदूरी नहीं मिल रही है और देरी से मजदूरी भुगतान लगभग 3,066 करोड़ रुपए हो सकता है। केंद्र्र सरकार के लिए दूसरी किश्त राशि जारी करने के लिए हर साल 30 सितंबर के बाद पिछले वित्तीय वर्ष की लेखापरीक्षित रिपोर्ट भेजने के लिए अनिवार्य है। लेकिन अभी तक बजट नहीं दिया गया। श्रमिकों को मनरेगा के दिशा निर्देशों के तहत हब रोल के बंद होने के 15 दिनों के भीतर भुगतान प्राप्त करना चाहिए। अगर मजदूरी बकाया है, तो मजदूर देरी की अवधि के दौरान प्रति दिन दर पर मुआवजे लेने का हकदार हैं। इन देरी के लिए कोई कानूनी मुआवजा नहीं लिया गया है। स्क्रॉल इंक की अगस्त 2017 की रिपोर्ट के अनुसार, 2016-17 के वित्तीय वर्ष के दौरान, केंद्र सरकार ने मुआवजे का अनुमान 43 फीसदी का 1,208 करोड़ रुपये था। मनरेगा संघर्ष मोर्चा ने दावा किया है कि चालू वित्त वर्ष के लिए मुआवजे के रूप में 34.7 करोड़ रूपए का भुगतान किया गया है, केवल 3.6 करोड़ रुपये या 10 प्रतिशत का भुगतान किया गया है। चालू वित्त वर्ष के लिए मनरेगा के लिए बजट आवंटन 48,000 करोड़ रुपये है, जो इस योजना के तहत सबसे ज्यादा है। जहां तक मप्र का सवाल है तो मनरेगा योजना बदहाली से गुजर रही है। पांच माह से अधिक समय से केंंद्र्र सरकार से राशि नहीं मिलने के कारण मप्र में मनरेगा के तहत करीब 700 करोड़ रुपए से अधिक का भुगतान बाकी है। इससेे न सिर्फ मनरेगा के तहत विकास कार्यों की गति में रोक लग गई है, बल्कि मजदूरी और भुगतान नहीं होने के कारण मजदूरों को भी परेशान होना पड़ रहा है।
न रोजगार की गारंटी, न मजदूरी की
किसी भी कानून का क्रियान्वयन सरकार और नौकरशाही की ईमानदारी और चुस्त-दुरूस्ती पर निर्भर करता है। तत्कालीन संप्रग सरकार के समय जो मप्र मनरेगा के क्रियान्वयन में अव्वल था, वही आज फिसड्डी है, तो इसका कारण भी स्पष्ट है कि सरकार में राजनैतिक ईमानदारी बची नहीं और भ्रष्ट नौकरशाही कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। गरीबों के लिए मनरेगा की मजदूरी भुखमरी और महाजनी कर्ज से बचाव, शिक्षा, स्वास्थ्य और खेती के लिए पैसों की व्यवस्था की भी गारंटी बनती है। मनरेगा इसीलिए निशाने पर है कि सरकार आम जनता को ऐसी कोई गारंटी नहीं देना चाहती। वह तो बाजार की व्यवस्था पर भरोसा करती है, भले ही इसकी कीमत आम जनता को ही चुकानी पड़ती हो। दरअसल, मनरेगा के प्रति मोदी सरकार का रूख शुरू से ही अच्छा नहीं है। यही कारण है कि नौकरशाही आज ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी से हाथ झाड़ रही है। इसका सीधा असर राज्य पर पडऩा ही था। सरकारी रवैये के कारण ग्रामीणों की दिलचस्पी मनरेगा के प्रति घटी है, क्योंकि न रोजगार की गारंटी हैं और न ही मजदूरी की। मनरेगा अब अविश्वास का शिकार हो गया है, जिसके पर्याप्त कारण हैं। एक बार लोगों का विश्वास किसी योजना से उठ जाएं, तो उसे बहाल करना बड़ा मुश्किल होता है। आने वाली किसी भी सरकार के लिए यह आसान नहीं होगा।
53 लाख फर्जी जॉबकार्ड
मप्र में मनरेगा में किस कदर फर्जीवाड़ा हो रहा है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यहां के अधिकारियों ने 53 लाख फर्जी जॉबकार्ड बनाकर करोड़ों रूपए हड़प लिए। आपको बता दें कि 2013 में कपिल सिब्बल ने भी मप्र में 53 लाख झूठे जॉबकार्ड बनवाने का आरोप लगाया था उस वक्त वह कें द्रीय मंत्री थे। केंद्र सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस योजना के तहत बनाए गए 21 लाख 62 हजार 300 लोगों के फर्जी कार्ड एक साल अंदर में रद्द किए गए हैं। गलत आवंटन के लाखों मामले हैं। वहीं सरकार जरूरतमंदों को काम भी उपलब्ध नहीं करा पा रही है। अभी हाल ही में जबलपुर जिले में 80 हजार जॉब कार्ड निरस्त किए गए हैं। मनरेगा योजना के तहत जॉब कार्ड बनवाकर कार्य नहीं करने वाले लोगों के जॉब कार्ड निरस्त करने की जानकारी जिला पंचायत ने पंचायत ग्रामीण विकास विभाग को भेजी है। जिले में करीब 80 हजार लोग ऐसे हैं जिन्होंने तीन पहले पहले जॉब कार्ड तो बनवा लिया, किंतु एक भी दिन कार्य नहीं किया। आलम यह है कि मृतक व गांव से बाहर रहने वाले लोगों के भी जॉब कार्ड निरस्त किए गए हैं।
सिर्फ एक प्रतिशत को 100 दिन का रोजगार
स्थिति यह है कि मप्र में मनेरगा के तहत वर्ष 2016-17 में एक प्रतिशत से भी कम परिवारों को 100 दिन का रोजगार मिला। जिन्हें रोजगार मिल भी रहा है उनके दिन भी साल दर साल कम हो रहे है। वर्ष 2015-16 में जहां प्रदेश में कार्य का औसत दिवस 46 था तो वहीं वर्ष 2016-17 में यह 38 दिन तक सिमट गया। कम दिनों के काम के अलावा सरकार जरूरतमंदो को काम भी नहीं दे पा रही है। वर्ष 2015-16 में 30 लाख 24 हजार परिवारों ने मनरेगा के तहत काम मांगा लेकिन सरकार 27 लाख परिवारों को ही काम दे पाई। इधर वर्ष 2016-17 में काम मांगने वालों की संख्या में और इजाफा हुआ और यह संख्या 32 लाख 61 हजार तक पहुंची लेकिन सरकार पहले से भी कम 25 लाख लोगों को ही रोजगार मुहैय्या करवा सकी। राज्य के प्राय: सभी जिलों में स्थिति को लेकर एक बार फिर अफसर बैकफुट पर हैं। वित्तीय वर्ष 2016-17 के आंकड़ों पर गौर करें तो जबलपुर जिले के शहपुरा-मझौली और पाटन जनपद में मनरेगा की बुरी स्थिति है। तीनों जनपदों में सिर्फ 2-2 परिवारों ने 100 दिन कार्य किया है। हालांकि अन्य जनपदों की भी स्थिति संतोषजनक नहीं है। मनरेगा की पटरी से उतरने के बाद एक बार फिर जनपद और जिला पंचायत की अफसरशाही उजागर हो गई है। जानकारी के अनुसार मनरेगा के तहत चालू वित्तीय वर्ष में सात जनपदों में 22 परिवारों के 82 सदस्यों ने 100 दिन मजदूरी की है, जबकि अलीराजपुर, रायसेन, राजगढ़ सहित अन्य जिलों में यह आंकड़ा हजार के पार है। इन जिलों में एक-एक हजार से अधिक व्यक्तियों ने 100 दिन मजदूरी की है। प्रदेश के समस्त जिलों की बात करें तो 6 हजार 613 परिवारों के 34 हजार व्यक्तियों ने 100 दिन से अधिक मजदूरी की है। मनरेगा में काम पूरा करने की दर में पिछले साढ़े तीन वर्षों के अंदर भारी गिरावट आई है। इसके कारण एक तरफ सरकारी राशि बर्बाद हो रही है तो दूसरी ओर गांवों को सूखा प्रभावित होने के लिए छोड़ दिया गया है। योजना से लोगों की दूरी बनाने का एक कारण यह भी हो सकता है। जब बारिश की कमी के कारण भारत के एक-तिहाई से अधिक जिले सूखे जैसी स्थिति से जूझ रहे थे, उसी समय एक और बुरी खबर आ गई।

मनरेगा जैसी योजना की जरूरत क्यों है?
संविधान में सरकारों की कल्याणकारी भूमिका पर जोर दिया गया है। संविधान निर्माताओं का मानना था कि विकास में वंचित और पिछड़े तबके की हिस्सेदारी होनी चाहिए। भारत जैसे विकासशील देश में सरकार की भूमिका उन क्षेत्रों में कहीं अधिक बढ़ जाती है, जहां कारोबारी फायदे न होने की वजह से अपने पैसे नहीं लगाते हैं। बीते 11 वर्षों में मनरेगा ने इस बात कई बार साबित किया है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जिस आखिरी व्यक्ति की बात कही थी उसके लिए मनरेगा संजीवनी साबित हुई है। सरकारी थिंक टैंक नीति आयोग की रिपोर्ट की ही बात करें तो इसमें कहा गया है कि मनरेगा जैसी कल्याणकारी योजनाओं ने समाज के कमजोर तबके को काफी मदद पहुंचाई है। आयोग का यह भी मानना है कि इनमें से भी महिलाओं और वंचित तबके को अधिक फायदा पहुंचा है। योजना के तहत कार्य दिवसों में इनकी हिस्सेदारी क्रमश: 56 फीसदी और 39 फीसदी रही है। आयोग ने यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र के सामने भी रखी थी। इसके अलावा अगस्त, 2015 में जारी नेशनल काउंसिल फॉर एप्लाइड इकनॉमिक रिसर्च की शोध रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि मनरेगा कामगारों की स्थिति बेहतर करने में सफल रही है। यूनिवर्सिटी ऑफ मेरीलैंड के साथ संस्था ने साल 2004-05 और 2011-12 में देश के 28,000 घरों में एक अध्ययन किया था। इससे साबित हुआ है कि यह योजना गरीबी घटाने और महिला सशक्तिकरण में सफल रही है। बीते साल नवंबर में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी का ऐलान किया तो लोगों के सामने एक बड़ी चुनौती अपने रोजगार को बचाने के रूप में आई थी। देश के कई बड़े शहरों में उद्योग-धंधे बंद होने की वजह से कामगारों को वापस अपने-अपने घर लौटना पड़ा।
कामगारों के साथ मजाक
दरअसल, केंद्र सरकार भी मनरेगा को लेकर निष्क्रिय है। चालू वित्तीय वर्ष (2017-18) में कई राज्यों में मनरेगा की मजदूरी में बढ़ोतरी ने भी सरकार के दावों पर सवाल खड़े किए थे। एक अप्रैल, 2017 से कई राज्यों के मनरेगा कामगारों की मजदूरी में केवल एक रुपये की बढ़ोतरी की गई। राष्ट्रीय स्तर पर बात करें तो बीते साल की तुलना में इस साल मजदूरी में औसतन 2.7 फीसदी की ही बढ़ोतरी की गई। इससे पहले 2016-17 में यह आंकड़ा 5.7 फीसदी था। यहीं नहीं, यह बढ़ोतरी योजना लागू होने के बाद अब तक की सबसे कम बढ़ोतरी है। सरकार ने न केवल न्यूनतम मजदूरी में न के बराबर बढ़ोतरी की है बल्कि, मजदूरों को मिलने वाले भुगतान में देरी से संबंधित मुआवजे में भी कमी की है। साथ ही, इस न्यूनतम मुआवजे का कुछ हिस्सा ही पूरे देश में लाभार्थियों को मुहैया कराया जा रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक सरकार ने मुआवजे संबंधी नियमों को इस तरह से बनाया है जिससे मुआवजे की रकम कम हो गई है। इसके तहत मुआवजे की गणना मजदूरी के भुगतान के लिए अधिकारियों द्वारा जिला स्तर पर मांग किए जाने की तारीख तक किए जाने का प्रावधान किया गया है।
बजट में बढ़ोतरी का आधा सच
मोदी सरकार ने साल 2017-18 के बजट में मनरेगा के लिए 48,000 करोड़ रुपये आवंटित किए। बीते साल यह आंकड़ा 38,500 रुपये था। इस तरह सरकार ने जोर-शोर से इस बात का ऐलान किया कि उसने इस साल मनरेगा आवंटन में करीब 10,000 करोड़ रु की बढ़ोतरी की। सरकार का यह दावा काफी हद तक सही होने के बावजूद भी आधा सच ही है। बीते साल इस योजना के लिए जारी रकम का आंकड़ा 38,500 करोड़ रु से बढक़र 47,499 करोड़ रुपये जा पहुंचा था। साथ ही मजदूरों सहित अन्य मदों में बकाया रकम का आंकड़ा 11,000 करोड़ रुपये जा पहुंचा। इन तथ्यों को देखने पर हम पाते हैं कि इस साल बजट में मनरेगा के लिए आवंटित रकम केवल 37,000 हजार करोड़ रु ही है, जो बीते साल से 10,499 करोड़ रु से कम है। इसके अलावा ताजा सरकारी आंकड़े बताते हैं कि चालू वित्तीय वर्ष के पहले पांच महीने में ही सरकार 48,000 करोड़ रु में से 35,000 करोड़ रु से अधिक जारी कर चुकी है।

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