मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के 12 साल… शिवराज की ब्रांडिंग और मप्र के युवतुर्क

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भोपाल (राकेश अग्निहोत्री)
अमेरिका से लौटने के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को जब भी मौका मिलता है तो कहते हैं कि वो अपने मध्यप्रदेश की ब्रांडिंग करने के लिए गए थे। तो 12 साल अपने कार्यकाल के पूरे करने जा रहे शिवराज की ब्रांडिंग कितनी जरूरी हो गई , जब चुनाव के लिए उल्टी गिनती शुरु हो चुकी है। मध्य प्रदेश की राजनीति के खिलाडय़िों पर भारी इस खिलाड़ी के खाते में भले ही उपलब्धियों की भरमार हो जिसने जनहित की कई योजनाओं को लागू कर मध्य प्रदेश की दशा और दिशा दोनों बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बावजूद इसके लंबे समय से सब को लुभाने वाले इस चेहरे को लेकर विपक्ष जब सवाल खड़े कर एंटी इनकंबेंसी तलाश उसे हवा देने में जुट गया तब जरूरी हो जाता है कि भाजपा अपने और मध्यप्रदेश के इस ब्रांड की चमक धूमिल नही होने दे। ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है कि भाजपा अपने ब्रांड एंबेसडर शिवराज की लोकप्रियता को आखिर चुनाव में भुनाने के लिए बदलते परिदृश्य में किस रणनीति पर और कैसे आगे बढ़ेगी।
29 को पूरे हुए 12 साल
रणनीति की गोपनीयता जितनी जरूरी है उतना ही जरूरी विपक्ष को नजरअंदाज ना करते हुए उनके आरोप हमलों पर समय रहते पलटवार की। तो क्या समय आ गया है कि अब जब 29 नवंबर को शिवराज ने 12 साल पूरे कर लिए तब भाजपा एक साथ कई मोर्चों पर अपनी सक्रियता का एहसास प्रदेश के मतदाताओं को कराएं। सवाल यह भी मायने रखता कि पहली बार वोट डालने वाले युवा का समर्थन ,भरोसा ही नहीं वोट आखिर शिवराज कैसे हासिल करेंगे? जिसने जन्म भले ही दिग्विजय सिंह के दूसरे कार्यकाल में लिया लेकिन अब वह वोटर बनकर सामने होगा। यह वह वर्ग है जो व्यवस्था के खिलाफ खड़ा नजर आता रहा है और जिसने गुजरात में अपनी मौजूदगी दर्ज करा दी है। ऐसे में भाजपा के लिए मध्य्प्रदेश में चौथी बार सरकार बनाने के लिए जितनी जरूरी शिवराज की ब्रांडिंग है उतनी ही बड़ी चुनौती गुजरात के हार्दिक की तर्ज पर मध्यप्रदेश में युवा नेतृत्व और युवा मतदाता को भरोसे में लेना होगी.. यानि युवा तुर्क जिस की जाति ,नाम ,धर्म और उम्र ऊपर-नीचे हो सकती है लेकिन चुनाव में माहौल बनाने और बिगाडऩे में बड़ी भूमिका निभाने की सामथ्र्य रखता है क्योंकि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी दीपक बाबरिया ने चिंतन-मंथन के दौरान यदि टिकट के क्राइटेरिया में दो बार चुनाव हार जाने या पिछला चुनाव ज्यादा मतों के अंतर से हारने के साथ पुरानी पीढ़ी को आगाह किया है कि वह युवा नेतृत्व के लिए रास्ता छोड़ दें तो मीडिया मैनेजमेंट पर भी उन्होंने सवाल खड़े किए हैं।
12 साल बाद भी भरोसा कायम
मध्यप्रदेश में शिवराज के 12 साल तो कुछ दिन बाद सरकार में रहते भाजपा के 14 साल पूरे होने जा रहे हैं जिसे केंद्र में मोदी सरकार अस्तित्व में आने के बाद एक नई ताकत मिली है। बावजूद इसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की कार्यशैली अलग-अलग होते हुए भी जनता के भरोसे पर अभी तक खरी उतरी है । मोदी का आक्रामक अंदाज और लो प्रोफाइल शिवराज की समन्वय ,सामंजस्य की सियासत प्रदेश और देश की जनता के सिर चढक़र बोलती रही है। प्रधानमंत्री बनने के साथ ही मोदी की ब्रांडिंग उसके तौर-तरीके ब्लू प्रिंट जिसमें हर तारीख का अपना एजेंडा है किसी से छुपा नहीं है। तो शिवराज के लिए अब और जरूरी हो जाता है कि भाजपा के ब्रांड एंबेसडर के तौर पर एक बार फिर जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतर कर दिखाएं। ऐसा नहीं है कि सरकार में रहते न्यूज चैनल से लेकर अखबारों की सुर्खियां हो या फिर विज्ञापन ने इस चेहरे को चमकाने में कोई कसर छोड़ी हो। जनसम्पर्क के नीति निर्धारक हों या फिर माध्यम के महाबली सरकार की उपलब्धियों के प्रचार प्रसार के साथ शिवराज के व्यक्तित्व और लोकप्रियता में चार चांद लगाने में बड़ी भूमिका निभाते रहे। सोशल मीडिया के मोर्चे पर भी निजी एजेंसी की मदद से इसे धार दी गई। बावजूद इसके कई मौके ऐसे आए जब सरकार की किरकिरी भी खूब हुई। प्रबंधन के मोर्चे पर टीम शिवराज के भरोसेमंद सरकार के अफसर हो या फिर संगठन के प्रबंधक की तत्परता और दूरदर्शिता पिछले चुनाव में विपक्ष पर भारी साबित हुई। जब कांग्रेस के नए प्रदेश प्रभारी दीपक बावरिया यह आरोप लगाएं कि व्यापम जैसे मुद्दे पर सरकार न्यूज चैनलों पर बहस नहीं होने देती है तो समझा जा सकता है कि भजपा के मैनेजरों से कांग्रेस कितनी हताश और निराश है। जो यह भी कहती है कि फंड की समस्या कांग्रेस में भाजपा की वजह से है। यह आरोप कुछ सवाल तो खड़े करता है लेकिन मिशन 2018 का चुनाव कुछ उसी अंदाज में होने की अंदेशा है जैसे गुजरात में मोदी के खिलाफ उनके विरोधी लामबंद हो चले हैं। चाहे फिर वह कांग्रेस द्वारा गठबंधन के सारे विकल्प खोल देना या फिर जाति वर्ग विशेष पर नजर रखते हुए युवा नेतृत्व और युवाओं को भरोसे में लेने की कोशिश। तो मध्यप्रदेश में भी शिवराज के विरोधी यदि विपक्ष में खड़े नजर आएंगे तो पार्टी के अंदर भी टिकट से नाराज नेताओं को मनाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होगा । एंटी इनकंबेंसी के नाम पर जब खुद मुख्यमंत्री अपने विधायकों को आइना दिखा रहे हैं तब शिवराज और सरकार की ब्रांडिंग भाजपा के लिए मायने रखती है।
जनता से सीधा संवाद शिवराज का ब्रहृमास्त्र
ऐसे में शिवराज जो भाजपा के लिए ब्रह्मास्त्र है की सबसे बड़ी खूबियों में से एक जनता से उनका संवाद -संपर्क के साथ भरोसा जो अभी तक समर्थन में तब्दील होता रहा ।उसमें प्रगाढ़ता लाना टीम शिवराज का लक्ष्य होना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि सरकार और संगठन के बीच सेतु की भूमिका निभाने वाले भाजपा का कार्यकर्ता नाराज ना हो, जो मतदाताओं के बीच मौजूद रहता है। यदि वह आक्रोशित है तो उसका गुस्सा समय रहते शांत कर दिया जाए ।यही वह कार्यकर्ता और मतदाता है जो शिवराज की माउथ पब्लिसिटी कर उनका मनोबल बढ़ा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि शिवराज की ब्रांडिंग नए सिरे से समय रहते नए अंदाज में शुरू कर दी जाए। ब्रांडिंग जिस चेहरे शिवराज की कर भाजपा चुनाव जीतना चाहती है उसके लिए जरूरी है कि तीन कार्यकाल की बड़ी उपलब्धियों को मतदाता तक पहुंचाया जाए । बेहतर होगा 12 साल की बड़ी उपलब्धियों को चिन्हित किया जाए। मतदाता को बार-बार याद दिलाया जाए कि पिछले डेढ़ दशक में मध्य प्रदेश की दशा और दिशा किस तरह बदली । आखिर वह योजनाएं कौन सी है जिसने आम आदमी का जीवन बदल कर उसमें सुधार लाया है। सरकारी स्तर पर जिन योजनाओं का प्रचार प्रसार जोर शोर से अनवरत चलता रहता आखिर उसकी जमीनी हकीकत क्या है ।आखिर वह कौन से हितग्राही है जिन्हें लाभ मिला और वह कौन है जिन्हें उनके हक से वंचित कर दिया गया।
कार्यकर्ताओं को देना होगा महत्व
शिवराज अलग-अलग फोरम और अलग-अलग योजना और कार्यक्रम के जरिए जनता के बीच पहुंचाते रहे हैं। तो उनके लिए यह जानना जरूरी हो जाता है क्या वास्तव में सरकार द्वारा शुरू की गई योजनाओं का लाभ आम जनता को मिल रहा है और यदि नहीं मिल रहा है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? सरकारी स्तर पर हितग्राही सम्मेलन हो या अंत्योदय मेले या फिर विकास यात्रा उपलब्धियों का बखान करने के लिए काफी है। बावजूद अब समय आ गया है जब भाजपा अपने कार्यकर्ताओं को सार्वजनिक तौर पर महत्व दें और उन्हें मंच नसीब कराएं जिससे वह अपने क्षेत्र के मतदाताओं के बीच जाकर सरकार की योजनाओं का क्रेडिट ले सके । तो यहीं पर सवाल खड़ा होता है कि बदलते सियासी परिदृश्य में शिवराज की ब्रांडिंग उन्हें कैसे मजबूत करेगी? क्या आप समय आ गया है आदिवासी, अनुसूचित जाति, महिला, किसान और खास तौर से युवा वर्ग का भरोसा जीतने के लिए अपनी सरकार का लेखा जोखा लेकर इन वर्ग विशेष के बीच जब भी पहुंचे तो भरोसा और मजबूत हो सके ।
कोलारस और मुंगावली में होगी परीक्षा
अबकी बार 200 पार का नारा देने वाली भाजपा के लिए विधानसभा चुनाव से पहले होने वाले दो उपचुनाव, कोलारस और मुंगावली मायने रखते हैं। तो बड़ी चुनौती ब्रांडिंग को असरदार साबित करने की भी है । क्योंकि अटेर उसके बाद चित्रकूट में मिली हार के कारणों में एक यह भी कारण रहा है कि शिवराज की मंशा के अनुरूप ना तो उनकी सरकार की उपलब्धियां जनता के गले उतरी और ना ही कार्यकर्ता को महत्व मिला ।तो शिवराज की ब्रांडिंग में एक आम कार्यकर्ता के साथ संगठन के पदाधिकारी, विधायक, सांसद सब की भूमिका अहम हो जाती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि 29 नवंबर को शिवराज जब अपने कार्यकाल के 12 साल पूरे कर एक नया कीर्तिमान बना चुके है। तो वो अपनी चिपरचित कार्यशैली में प्रदेश की जनता के बीच जाने को उतावले होंगे। लेकिन शिवराज के लिए यह समय सोचने का है कि उनके नाम पर जुटी और जुटाई गई भीड़ आखिर उनकी सरकार के बारे में क्या सोचती है । क्या विपक्ष द्वारा खड़े किए जा रहे सवाल और लगाए जा रहे आरोपों को वह गंभीरता से लेती है ,तो फिर इसकी वजह क्या है?
ध्यान रखने होंगे पिछले दो उपचुनाव
आखिर क्या बात है जिस सरकार की योजनाओं ने देश में धूम मचाई आखिर उसका असर पिछले दो उपचुनाव में क्यों नजर नहीं आया । यदि शिवराज को विकास पुरुष के तौर पर या विकास का पर्याय बताकर भाजपा चुनाव में जाती है तो फिर उपलब्धियों के प्रचार-प्रसार से ज्यादा आवश्यकता सरकार की योजनाओं का लाभ वास्तविक तौर पर हकदार आदमी को पहुंचाने की होना चाहिए । तो क्या अब समय आ गया है जब सरकारी मशीनरी से आगे संगठन के कार्यकर्ता को सम्मेलनों में शिवराज के साथ मंच पर महत्व मिलना चाहिए, शिवराज की ब्रांडिंग के लिए जरूरी है कि उनकी टीम और नीति निर्धारक बदलते समय और नई चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए रणनीति बनाए। क्योंकि न्यूज़ चैनल और अखबार कांग्रेस की माने तो मैनेज किए जा सकते हैं लेकिन सोशल मीडिया के इस युग में तस्वीर बदलते देर नहीं लगती, जिसकी कमान तकनीकी विशेषज्ञ के साथ युवा पत्रकारों के पास है। पिछले 12 साल में शिवराज ने मीडिया घर आने से लेकर खबरनवीसों के लिए कई योजनाएं शुरू करवाई तो उनके हितों का भी ध्यान रखा है लेकिन सच यही है मीडिया घराने के प्रमुख संपादक ही उन तक पहुंच पाते हैं जबकि ग्राउंड जीरो पर तैनात रिपोर्टर आज भी चाह कर उनसे नहीं मिल पाता है। मुख्यमंत्री व्यक्तिगत तौर पर सार्वजनिक रूप से मीडिया को हमेशा महत्व देते रहे हैं बावजूद इसके जिन्हें वह नहीं जानते वह व्यवस्था का आज भी मारा है।

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