सरकार से ताकतवर हुए नौकरशाह

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किसी भी राष्ट्र को निर्मित करने में नौकरशाह की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। संविधान में उनकी भूमिका पूरी तरह स्पष्ट है। उन्हें नियम और कानून के मुताबिक आदेशों का क्रियान्वयन करना होता है। नौकरशाह सरकार तो नहीं होते लेकिन अनेक मौकों पर देखा जाता है कि वे ही सरकार हो गए हैं या सरकार से भी अधिक ताकतवर। यह स्थिति बनना शुभ नहीं है। मंत्रियों एवं आम जनता के बीच वे एक सेतु हैं। सेतु होना अच्छी बात हैं लेकिन उन्हें एक बड़ी शक्ति के रूप में मान्यता मिलना, उनके अहंकार को तो बढ़ाता ही है, इसी से भ्रष्टाचार भी पनपता है। सरकार का कोई भी आदेश मंत्री की प्रशासनिक मंजूरी के बिना जारी नहीं हो सकता और मंत्री अपने इन आदेशों की प्राथमिक स्थिति से लेकर लागू करने तक की स्थितियों के लिये नौकरशाह पर निर्भर हैं।

मंत्रियों की अवहेलना का बढ़ा प्रमाण
देश में नौकरशाहों में विभागीय मंत्री के आदेशों एवं निर्देशों की अवहेलना करने की प्रवृत्ति काफी तेजी से बढ़ी है। लोगों में ऐसी धारणा बन चुकी है कि नौकरशाह कामकाज में अड़ंगा लगाने के लिए ही होते हैं और ऐसा होता भी है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अरूण यादव कहते हैं कि जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजनीतिज्ञों पर कड़ी नजर रखना शुरू किया है, इन नौकरशाहों को मनमानी करने की खुली छूट मिल गयी है। भ्रष्टाचारमुक्त भारत का सपना तभी साकार होगा जब राजनेताओं के साथ-साथ नौकरशाहों पर भी कड़ी निगरानी रखी जाए। यह भी देखने में आ रहा है कि नौकरशाह अपनी ऊर्जा एवं स्वतंत्र सोच से कुछ नया नहीं करना चाहता, उनसे कोई नया होता हुआ काम रूकवाना आसान है, किसी आदेश-निर्देश को रद्द करवाना बहुत सहज होता हैै।
भारी न पड़ जाए नीति आयोग की अनीति
इसको देखते हुए देश के शीर्ष सरकारी थिंक टैंक नीति आयोग ने निजी सेक्टर के एक्सपर्ट के लिए प्रशासनिक व्यवस्था में दरवाजे खोले जाने की नीति बनाई है। उसकी नीति के अनुसार, सचिव स्तर से लेकर तमाम तरह के पदों पर निजी क्षेत्र के लोगों को नियुक्ति दी जाएगी। अब तक सरकारी संस्थानों में नौकरशाही के लोग ही आवेदन करते रहे हैं, लेकिन अब ऑफिसर्स को प्राइवेट सेक्टर और अकादमिक संस्थानों से आवेदन करने वाले लोगों से भी मुकाबला करना होगा। हालांकि सरकार की इस पहल को लेकर संदेह भी है। कुछ सीनियर अधिकारियों का कहना है कि लैटरल एंट्री के मानक पूरी तरह साफ नहीं किए गए तो इसका दुरुपयोग भी हो सकता है।
नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत का कहना है, इस प्रयास के जरिए हम देश के विकास के लिए सबसे प्रतिभावान लोगों को चुन सकेंगे। योजना आयोग की जगह लेने वाले नीति आयोग से जुड़े एक सूत्र ने बताया, वरिष्ठता के आधार पर प्रमोशन की नीति के दिन अब लद चुके हैं। इसकी वजह यह है कि आयोग अब सभी स्तर के पदों पर सीधी एंट्री पर विचार कर रहा है। इनमें वरिष्ठ सलाहकार (सेक्रेटरी रैंक), सलाहकार (अडिशनल सेक्रेटरी रैंक), जॉइंट अडवाइजर्स और डेप्युटी अडवाइजर्स जैसी रैंक भी शामिल हैं। बीते दो सालों में नीति आयोग ने प्राइवेट सेक्टर से टैलंट को हायर करने की कोशिशें की हैं, लेकिन अब तक इन्हें निचले और मध्यम स्तर के पदों के लिए ही भर्ती किया गया है। इन लोगों को ऑफिसर्स ऑन स्पेशल ड्यूटी के तौर पर नियुक्तियां दी गई हैं। आयोग की ओर से नियुक्तियों को लेकर दिए गए नए प्रस्तावों के मुताबिक बाहरी एक्सपट्र्स को सभी पदों के लिए आवेदन का मौका दिया जाएगा। इसके अलावा नौकरशाह भी आवेदन करेंगे और मेरिट के आधार पर नियुक्तियां की जाएंगी।

10 माह में भ्रष्टाचार की 21,00 शिकायतें
सरकारी अफसरों के खिलाफ बीते 10 महीने में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की करीब 21 हजार शिकायतें मिलीं। इसका खुलासा हाल ही में सेंट्रल विजिलेंस कमीशन (केंद्रीय सतर्कता आयोग) ने किया। विजिलेंस कमिश्नर केवी चौधरी ने बताया कि सीवीसी ने कई डिपार्टमेंट्स के 19,557 अफसरों, कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की। कुछ मामलों की जांच में सीबीआई की मदद ली जा रही है। चौधरी के मुताबिक, जनवरी से अक्टूबर तक सरकारी अफसरों के खिलाफ करप्शन की 20,943 शिकायतें मिलीं। इनमें से कमीशन ने 17,420 मामलों की जांच की गई। 96 शिकायतें चीफ विजिलेंस अफसर के पास भेजी गईं, जिनकी जांच में सीबीआई की भी मदद ली रही है। बता दें कि कमीशन को 2016 में 51,207, 2015 में 32,149, 2014 में 64,410 और 2013 में 35,332 भ्रष्टाचार से जुड़ी शिकायतें मिली थीं। इस साल करप्शन के मामलों में कमी आई है। बताया जाता है कि इस दौरान मप्र की नौकरशाही के मामलों में आश्चर्यजनक गिरावट आई है। सूत्र बताते हैं कि बीते 10 माह में मप्र के केवल 5 नौकरशाहों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत मिली है। जिसमें से एक आईएएस, दो आईपीएस और दो आईएफएस अफसर हैं। वहीं विभिन्न विभागों के 107 अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले सामने आए हैं। वहीं मप्र की नौकरशाही की बेलगाम की चर्चा भी खूब की जा रही है। राज्य में नौकरशाही चुने हुए प्रतिनिधियों के नियंत्रण से बाहर है, इसकी शिकायत हर आम और खास आदमी पिछले चार साल से लगातार करता आ रहा है। हम यहां सिर्फ चार साल का जिक्र इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि शिवराज सिंह चौहान ने चार साल पहले ही राज्य में लगातार तीसरी बार भाजपा को सरकार में लाने का श्रेय प्राप्त किया था। लगातार तीसरी बार शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री बनने के बाद राज्य की जनता में यह आस बंधी थी कि अब कोई अफसर अपनी मनमर्जी नहीं चला पाएगा। पहली बार राज्य में ऐसा हुआ कि किसी व्यक्ति को आम चुनाव में जीत हासिल करने के बाद लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिला हो। लगातार तीसरी बार सत्ता की कमान संभालने वाले व्यक्ति से यह अपेक्षाएं स्वाभाविक रूप से हो जाती है कि अब राम राज्य स्थापित हो जाएगा। राजनीति में यदि कोई व्यक्ति बिना किसी अंतराल के लगातार तीन बार मुख्यमंत्री बनता है तो यह धारणा भी स्वाभाविक तौर पर बन जाती है कि वह अब अंगद का पांव हो चुका है अथवा उसके समक्ष कोई राजनीतिक चुनौती नहीं है। पार्टी के भीतर भी उस पर दबाव नहीं डाला जा सकता। फिर भी मप्र की नौकरशाही भ्रष्ट और बेलगाम है यह सरकार के लिए भी चिंता की बात है।
प्रशासनिक ढांचे में सुधार और बदलाव जरूरी
प्रदेश और देश में नौकरशाही के बदलते रूप को देखते हुए समय-समय पर प्रशासनिक ढांचे में सुधार और बदलाव की मांग उठती रही है। इस बहस की शुरूआत 1947 में देश की आजादी के साथ प्रारंभ हो गई थी। अंग्रेजों ने ब्रिटिश इंडिया में सुचारु प्रशासन तंत्र के लिए आईसीएस अर्थात इम्पीरियल सिविल सर्विसेस की व्यवस्था लागू की थी। आईसीएस में शुरूआत में इंग्लैंड से ही अफसर आते थे, बाद में होनहार भारतीयों को भी स्थान मिलने लगा था। नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने भी आईसीएस की परीक्षा उत्तीर्ण की थी, यद्यपि अंग्रेज सरकार की नौकरी करना उन्हें मंजूर नहीं हुआ। बहरहाल 1947 में बहस छिड़ी कि आईसीएस को कायम रखें या भंग कर दें। पंडित नेहरू और उनके गृहमंत्री सरदार पटेल दोनों का मानना था कि नवस्वतंत्र देश की व्यवस्था संभालने के लिए अनुभवी प्रशासनिक अधिकारियों की आवश्यकता है इसलिए आईसीएस को कायम रखा गया। सरदार पटेल ने तो उसे स्टील फ्रेम ऑफ इंडिया की संज्ञा भी दी थी। एक सोच यह भी थी कि एक अखिल भारतीय सेवा होने से प्रशासनिक स्तर पर राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने में मदद मिलेगी। आगे चलकर आईसीएस का देशीकरण हुआ और आईएएस अर्थात भारतीय प्रशासनिक सेवा अस्तित्व में आई। लेकिन उस पर आईसीएस की खुमारी आज भी है। इसलिए प्रशासनिक ढांचे में सुधार और बदलाव की मांग और तेज हो गई है। यही कारण है कि इन दिनों नौकरशाहों की कार्यशैली पर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं की टिप्पणियां सामने आ रही हैं। इसकी वजह है वे देश को लूट रहे हैं, वे आम आदमी को परेशान कर रहे हैं, वे अपने दायित्व एवं जिम्मेदारी से मुंह मोड़ रहे हैं। कितने ही नौकरशाहों पर छापों के दौरान करोड़ों की नकदी, करोड़ों का सोना, अरबों की बेनामी सम्पत्ति बरामद हुई हंै। यह सब दर्शाता है कि देश में नौकरशाह भ्रष्टाचार का पर्याय बन गया है।
बात केवल भ्रष्टाचार की ही नहीं है, बात अपनी जिम्मेदारियों एवं दायित्व के प्रति लापरवाह होने की भी है। यह स्थिति देश के लिये ज्यादा खतरनाक है। इसी स्थिति में कभी कोई पुल ढह जाता है तो कभी अनाज गोदामों में सड़ जाता है, कभी कोई कचरा जान का दुश्मन बन जाता है, तो कभी पूरा शहर सडऩे लग जाता है, कभी कर्मचारी मजबूरन आन्दोलन या काम रोकों के लिए विवश होते हैं तो कभी देश की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है। सवाल है कि स्थिति को इस हद तक बिगडऩे ही क्यों दिया जाता है। नौकरशाह अगर सचमुच समय पर कार्य करें, निर्णय लें या पूर्वाग्रह से ग्रस्त न हो, गलत निर्णय न ले तो स्थितियां इतनी भयावह नहीं हो सकती।

मप्र में डैमेज कंट्रोल की जिम्मेदारी एसके मिश्रा पर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ही तरह मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी प्रदेश में नौकरशाही के कारण हो रहे डैमेज को कंट्रोल करने के लिए एसके मिश्रा को संविदा नियुक्ति दी है। इससे पहले कभी भी प्रदेश में इस तरह की संविदा नियुक्ति किसी भी सरकार ने नहीं की। दरअसल, प्रदेश की नौकरशाही में सरकार के प्रति विरक्ति देखी जा रही है। मप्र में 200 से अधिक सीटों के साथ लगातार चौथी बार सरकार बनाने के सपने में खोई शिवराज सरकार और प्रदेश भाजपा संगठन को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा खुफिया एजेंसियों की एक रिपोर्ट ने चौका दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में ब्यूरोक्रेसी का एक बड़ा वर्ग शिव ‘राज’ के खिलाफ गोलबंदी कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले डेढ़ साल से प्रदेश के कुछ सेवानिवृत नौकरशाह सरकार से असंतुष्ट अफसरों को एकजुट कर रहे हैं। इनमें मप्र के मूल निवासी अफसरों की संख्या सबसे अधिक है। ऐसे अफसरों को साधने की जिम्मेदारी एसके मिश्रा पर आ गई है।
मध्यप्रदेश में विधानसभा के चुनाव 2018 में होना हैं। मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश में भाजपा की जीत का चौका लगाने के लिये कमर कसे हुए हैं। लक्ष्य हासिल करने के लिए मनमाफिक टीम की जरूरत है। इस दृष्टिकोण से एसके मिश्रा टीम शिव ‘राज’ के लिये बेहद अपरिहार्य थे। मुख्यमंत्री ने बिना देर किए मिश्रा को अपनी टीम में अहम स्थान और भरपूर महत्व देकर मध्यप्रदेश की प्रशासनिक बिरादरी को साधने की जिम्मेदारी दे दी है। उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ साल से नौकरशाही में सरकार के प्रति आक्रोश देखा जा रहा है। कई अवसरों पर अफसर सरकार को कोसने से भी नहीं चूक रहे हैं। सरकार इसे इत्तेफाक मान रही थी, लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ लगातार इस पर नजर रखे हुए था। ज्ञातव्य है कि संघ कई बार नौकरशाहों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर चुका है। मप्र के बारे में कहा जाता है कि यहां सरकार किसकी बनेगी यह नौकरशाहों के रूख पर तय होता है। अगर संघ की रिपोर्ट और उसके नेताओं की माने तो जिस तरह 2003 में नौकरशाह और सरकारी कर्मचारी दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में नाखुश थे उसी प्रकार की स्थिति अब शिवराज सिंह चौहान की सरकार में है। प्रदेश के एक वरिष्ट आईएएस अधिकारी कहते हैं की सरकार की नीतियों के कारण ही प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी दो भागों में बंट गई है। अगर उनके दावे को माने तो सरकार के खिलाफ 67 फीसदी अधिकारियों में माहौल है।
उपेक्षा से नाखुश है अधिकारी
दरअसल, सरकार का पूरा प्रशासनिक तंत्र 150-200 नौकरशाहों के इर्दगिर्द घूम रहा है, जबकि प्रदेश में तीनों कैडर(आईएएस, आईपीएस व आईएफएस) के करीब 842 अधिकारी कार्यरत हैं। जो अधिकारी उपेक्षित हैं वे तो नाखुश हैं ही साथ ही वे भी अधिकारी सरकार के खिलाफ हैं जिन्हें बिना किसी वाजिब कारण के उनके पद चलता कर दिया गया। सूत्र बताते हैं की सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि सरकार के खिलाफ जो अफसर हैं उनमें मप्र के मूल निवासियों की संख्या सबसे अधिक है। वजह यह है की सरकार में सबसे अधिक रसूखदार पदों पर दूसरे राज्य के मूल निवासी अफसर अधिक रहे हैं। मप्र के मूल निवासी एक आईएएस कहते हैं की प्रदेश में सबसे अधिक भ्रष्टाचार दूसरे राज्यों के मूल निवासी अफसरों ने किया है, लेकिन सरकार के निशाने पर मप्र के निवासी अफसर रहे हैं। आमतौर पर माना जाता है कि सत्ता का रास्ता सूखने का अंदाज सियासी लोगों के मुकाबले नौकरशाहों का ज्यादा सटीक होता है और यही वजह है कि दिल्ली और भोपाल में बैठे अफसरों ने अपने-अपने सूत्रों से किस सीट पर किस जिले में क्या लड़ाई है इसका आकलन करना शुरू कर दिया था और वह लगातार अपने रसूख का इस्तेमाल इंटेलिजेंस महकमे की रिपोर्ट लेने में भी कर रहे हैं। सरकार ने ऐसे ही असंतुष्ट नौकरशाहों का साधने के लिए एसके मिश्रा को संविदा नियुक्ति दी है।

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