11,417 ब्यूरोक्रेट्स से सरकार कराएगी बाबूगिरी

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नौकरशाही नहीं रही भरोसेमंद…

भोपाल (विनोद उपाध्याय)। देश की प्रशासनिक व्यवस्था को नौकरशाहों की कुंडली से मुक्ति दिलाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) समानांतर नौकरशाही खड़ी करने की योजना बना रहे हैं। इस योजना के तहत अब देश और प्रदेशों में नीति निर्धारण की जिम्मेदारी एक्सपर्ट को दी जाएगी, जो प्रशासनिक व्यवस्था के अहम पदों पर पदस्थ होंगे। वहीं वर्तमान में नीति निर्धारण करने वाली नौकरशाही से सरकार बाबूगिरी कराएगी। सरकार के इस कदम से नौकरशाही में हडक़ंप मचा हुआ है। उल्लेखनीय है कि देश में प्रशासनिक व्यवस्था को चलाने के लिए नौकरशाही के 14,355 पद (आईएएस 6,396, आईपीएस 4,802 और आईएफएस 3,157) स्वीकृत हैं। इनमें से वर्तमान समय में 11,355 नौकरशाह (आईएएस 4,926, आईपीएस 3,894 और आईएफएस 2,597) पदस्थ हैं। इन अफसरों में से 32 फीसदी के खिलाफ भ्रष्टाचार की गंभीर शिकायतें हैं। वहीं 17 फीसदी की कार्यप्रणाली विवादित है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पदभार ग्रहण करने के बाद से लगभग आधा दर्जन से अधिक बार नौकरशाही को भरोसेमंद बनाने की कोशिश की लेकिन वह अपने स्टील फ्रेम से बाहर निकलती नहीं दिख रही है। इसलिए अब समानांतर नौकरशाही खड़ी की जा रही है।
पहला प्रयोग उत्साहवद्र्धक
भारत में समय-समय पर देश के प्रशासनिक ढांचे में सुधार और बदलाव की मांग उठती रही है। इसकी वजह है नौकरशाही का वर्तमान स्वरूप। कई राज्यों से मिली रिपोर्ट के अनुसार नौकरशाही अब भरोसेमंद नहीं रह गई है। इसको देखते हुए केंद्र सरकार ने मंत्रालयों के अहम पदों पर अधिकारियों की बजाय एक्सपट्र्स की नियुक्तियां शुरू हो गई हैं। इसी कड़ी में 11 अक्टूबर की देर रात केंद्र सरकार ने राजेश कोटेचा को आयुष मंत्रालय में स्पेशल सेक्रेटरी के रूप में नियुक्त किया। यह पहली नियुक्ति है जब किसी मिनिस्ट्री में सेक्रटरी पद पर आईएएस अधिकारी नहीं बैठाया गया, बल्कि उस क्षेत्र से जुड़े किसी एक्सपर्ट को जिम्मा सौंपा गया। राजेश कोटेचा जामनगर स्थित गुजरात आयुर्वेद विश्वविद्यालय के पूर्व वाइस चांसलर रहे हैं। इससे पहले 25 सितंबर को पीएम मोदी ने अपनी आर्थिक सलाहकार परिषद का गठन किया था। यह भी एक्सपर्ट की समानांतर टीम बनाने की पहल का हिस्सा था। उधर, मप्र में भी ऐसा ही एक प्रयोग किया गया है। 30 सितंबर को रिटायरमेंट होने वाले 1991 बैच के आईएएस अधिकारी एसके मिश्रा को संविदा नियुक्ति दी गई। संविदा नियुक्ति नीति में बदलाव के बाद मध्यप्रदेश में पहली संविदा नियुक्ति दी गई। बताया जाता है कि केंद्र सरकार का पहला प्रयोग उत्साहवद्र्धक रहा है। इसको देखते हुए नौकरशाही में लैटरल एंट्री (बाहरी प्रवेश) पर पीएम मोदी अब तेजी से कदम बढ़ाएंगे। पीएमओ से जुड़े एक अफसर ने बताया कि मंत्रियों के समूह ने लैटरल एंट्री से जुड़े मसले के सभी पहलुओं को समेटते हुए अपनी रिपोर्ट दी थी। इस रिपोर्ट में सरकार के अंदर नीतिगत फैसले वाले पदों पर विशेषज्ञों की नियुक्ति को सहमति दी गई। इसके बाद पीएमओ ने कैबिनेट सेक्रेटरी को अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों की लिस्ट बनाने को कहा है जो सरकार के साथ जुड़ सकते हैं। सूत्रों के अनुसार केंद्र शुरू में मशविरा लेने के स्तर पर इन लोगों की सेवा ले सकती है। रेलवे, वित्त, डिफेंस और हेल्थ ऐसे सेक्टर हैं, जहां सरकार को एक्सपर्ट की तलाश सबसे ज्यादा है। इसके अलावा पीएम मोदी की महत्वाकांक्षी योजना न्यू इंडिया 2022 के विजन के लिए भी बनने वाली टीम में भी एक्सपट्र्स को जगह दी जा सकती है।
पीएमओ की रिपोर्ट से उत्साहित
बताया जाता है कि मंत्रालयों में नौकरशाहों की जगह एक्सपट्र्स को नियुक्त करने का आईडिया प्रधानमंत्री को पीएमओ की रिपोर्ट देखकर आया है। दरअसल, मोदी जब प्रधानमंत्री बने तो पीएमओ में जमकर भर्राशाही दिखी। इसको देखते हुए पीएम ने 1967 बैच के रिटायर्ड आईएएस अधिकारी नृपेन्द्र मिश्र को अपना प्रधान सचिव नियुक्त किया। उसके बाद कुछ ही दिन में पीएमओ ने प्रधानमंत्री का विश्वास हासिल कर लिया। प्रधानमंत्री के आदेशों-निर्देशों का त्वरित पालन होने लगा और पीएमओ ने सभी मंत्रालयों पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली। पीएमओ की इस परफार्मेंस को देखते हुए सरकार ने मंत्रालयों के साथ ही अन्य महत्वपूर्ण विभागों के अहम पदों पर एक्सपट्र्स को पदस्थ करने की तैयारी कर ली है। कार्मिक मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सरकारी विभागों में निदेशक या संयुक्त सचिव के स्तर पर निजी क्षेत्र से 50 ऐसे विशेषज्ञों को शामिल करने के प्रस्ताव पर काम किया जा रहा है। इन पदों पर आमतौर पर सिविल सेवा यानी आईएएस के अधिकारियों की नियुक्ति होती है। अधिकारी ने कहा इस संबंध में मंत्रालय ने हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने प्रस्तुति भी दी है। उन्होंने कहा कि निजी क्षेत्र के लोगों को तय अवधि की संविदा पर लाया जाएगा ताकि अच्छे और प्रभावी प्रशासन देने के सरकार के प्रयासों में उनका सहयोग लिया जा सके। दिल्ली में पदस्थ मप्र कैडर के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों को सरकार में शामिल करने का सुझाव सरकारी शोध संस्थान नीति आयोग की ओर आया था जिसके बाद इस संबंध में कदम उठाए गए। आयोग ने सिविल सेवा सुधारों पर मसौदा एजेंडा रपट में कहा था, अर्थव्यवस्था की बढ़ती जटिलताओं से नीति निर्माण एक विशेषज्ञ गतिविधि बन गई है। इसलिए यह जरूरी है कि पिछले दरवाजे से प्रणाली में विशेषज्ञों को शामिल किया जाए। रपट के अनुसार इस कदम से स्थापित नौकरशाही में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और लाभ होगा। दरअसल सभी विभागों व मंत्रालयों के अहम पदों पर सरकार आजतक आईएएस अधिकारियों को ही नियुक्त करती आयी थी। मगर यदि आप आईएएस अधिकारियों की चयन प्रक्रिया पर नजर डालें तो पता चलता है कि आईएएस अधिकारियों के पास इन मंत्रालयों को चलाने की योग्यता होती ही नहीं है। यही वजह है कि भारत आज भी तीसरी दुनिया बना हुआ है। प्रधानमंत्री कितने भी अच्छे फैसले ले लें, लेकिन उनका क्रियान्वन करने वाले अधिकारी ही यदि अयोग्य होंगे तो विकास कहां से होगा? बहरहाल तीन साल बीत जाने के बाद भी देश के विकास को आपेक्षित गति न मिलने से प्रधानमंत्री मोदी अब नौकरशाहों की फौज के समानांतर विशेषज्ञों की फौज तैयार कर रहे हैं।उधर, प्रशासनिक व्यवस्था में हो रहे बदलाव से नौकरशाहों में आक्रोश है। गतदिनों इंडियन पब्लिक सर्विस एम्पलॉइज फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष वीपी मिश्र ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रधान सचिव नृपेन्द्र मिश्र से पीएमओ में मुलाकात की। प्रधान सचिव को देश भर के कर्मचारियों की समस्याओं से अवगत करवाया। वीपी मिश्र के मुताबिक प्रधान सचिव ने आश्वस्त किया कि उनकी भावनाओं से प्रधानमंत्री को अवगत करवाएंगे।
भ्रष्टाचार और मनमानी चरम पर
बताया जाता है कि मई 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही देश में प्रशासनिक ढांचे में सुधार और बदलाव की मांग तेज हुई। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तो अपने राज्यों से आईएएस अधिकारियों को हटाने की मांग तक केंद्र सरकार से कर डाली थी। इसकी वजह थी आईएएस अधिकारियों की मनमानी और भ्रष्टाचार। इसको देखते हुए पीएमओ ने सभी राज्यों से ब्यूरोक्रेट्स की रिपोर्ट मांगी। देश के करीब डेढ़ दर्जन राज्यों से पीएमओ पहुंची रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश की नौकरशाही भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी हुई है। 32 फीसदी नौकरशाहों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। वहीं 17 फीसदी की कार्यप्रणाली विवादित है। यही नहीं भारतीय नौकरशाही के बारे में यह आम धारणा है कि बाबुओं की रिश्वतखोरी और आरामतलबी की वजह से कोई भी सरकारी काम समय पर नहीं होता। निचले स्तर की सरकारी नौकरी के बारे में तो पक्की राय यही है कि इसमें लोग आराम फरमाते हैं और बिना घूस लिए कोई काम नहीं करते।
समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर कहते हैं कि आज भी नौकरशाही औपनिवेशिक शासनकाल की तरह ही सोचती और व्यवहार करती है। वह अब भी खुद को शासक मानती है। हमारी नौकरशाही का मौजूदा ढांचा और काम करने के उसके तौर-तरीके देश और जनता की जरूरतों से मेल नहीं खाते हैं। समस्या सिर्फ यह नहीं है कि हमारी अफसरशाही जड़ मानसिकता की शिकार है। असल में, वह कई तरह की समस्याओं की गिरफ्त में है। भारतीय नौकरशाही के बारे में यह आम धारणा है कि बाबुओं की रिश्वतखोरी और आरामतलबी की वजह से कोई भी सरकारी काम समय पर नहीं होता। निचले स्तर की सरकारी नौकरी के बारे में तो पक्की राय यही है कि इसमें लोग आराम फरमाते हैं और बिना घूस लिये कोई काम नहीं करते। जाहिर है, सरकारी तंत्र के इस रवैये ने ही विकास-कार्यों की गति बढऩे नहीं दी है। अनेक विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत अगर भूमंडलीकरण का लाभ ढंग से नहीं उठा पाया है, तो इसकी मुख्य जवाबदेही यहां की नौकरशाही पर आती है।
20-25 साल में 100 करोड़ की प्रोपर्टी!
प्रदेश सहित देशभर की नौकरशाही की काली कमाई किसी से छुपी नहीं है। प्रदेश की निलंबित आईएएस शशि कर्णावत प्रदेश की नौकरशाही को सबसे भ्रष्ट बताने से चुकती नहीं हैं। वहीं चार साल पुराने एक मुकदमे में गिरफ्तारी की आशंका के चलते राजस्थान के एक चर्चित आईपीएस अफसर फिर से सुर्खियों में हैं। इस आईपीएस ने कई प्रमुख आईपीएस अफसरों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए हैं। साथ ही, गृहमंत्री राजनाथ सिंह को भी एक लिखित शिकायत भेजी है। यह आईपीएस अफसर हैं, राजस्थान के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक के पद पर पदस्थापित कुमार इंदुभूषण। इनका आरोप है कि आईपीएस बनने पर शुरुआत में लगभग सभी का प्रोपर्टी रिटर्न शून्य होता है। लेकिन कुछ सालों की सर्विस के बाद ही यह प्रोपर्टी बढ़ती जाती है और आईपीएस सर्विस के 20 से 25 साल के बीच लगभग 100 करोड़ की प्रोपर्टी हो जाती है। कुमार इंदुभूषण के खुलासे के बाद मप्र की नौकरशाही में भी भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ आवाज उठने लगी है। कई उपेक्षित अफसर अपनी बिरादरी की पोल खोलने लगे हैं।

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