संघ ने सरकार  को किया सचेत : चौथी पारी के लिए  किसानों को साधो आदिवासियों को बांधो

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148 विधानसभा सीटों पर एंटी इंकम्बेंसी का सबसे अधिक असर

भोपाल (विनोद उपाध्याय)। राजधानी के शारदा विहार स्कूल में तीन दिनों तक चले संघ के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सरकार और भाजपा संगठन को सचेत किया है कि पिछले 14 साल से सत्ता पर काबिज भाजपा के खिलाफ जोरदार एंटी इंकम्बेंसी है। खासकर किसानों और आदिवासियों के प्रभाव वाले करीब 148 विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा ही स्थिति ठीक नहीं है। संघ की रिपोर्ट के अनुसार, पार्टी के आधे से ज्यादा मौजूदा विधायकों के खिलाफ उनके क्षेत्र में भारी असंतोष है। ऐसे में संघ ने सलाह दी है कि सरकार किसान के साथ ही वनवासियों को अपनी योजनाओं का लाभ देकर अपने से बांध ले तो मिशन 2018 साकार हो जाएगा। उल्लेखनीय है कि 2018 में प्रदेश में लगातार चौथी बार सरकार बनाने के साथ ही 200 से अधिक विधानसभा सीटों को जीतने का टारगेट भाजपा ने बनाया है। लेकिन बिजली, सडक़, पानी की बदहाली, भ्रष्टाचार, मंत्रियों और विधायकोंं की निष्क्रियता, किसानों का आक्रोश और वनवासियों की उपेक्षा भाजपा की राह में रोड़ा बने कर खड़े हैं। इन सारी समस्याओं से भाजपा के रणनीतिकार चिंतित थे ही कि संघ की गोपनीय रिपोर्ट ने उन्हें और चौका दिया है।

न किसान खुश…न आदिवासी
संघ की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार से न किसान खुश हैं और न ही आदिवासी। दरअसल, सरकार की योजनाओं का लाभ इन दोनों वर्गों का अपेक्षा से कम मिला है। प्रदेश में 101 ऐसी विधानसभा सीटें हैं जिन पर किसानों का प्रभाव रहता है। वहीं 47 ऐसे विधानसभा क्षेत्र हैं जहां आदिवासी मतदाता सबसे अधिक हैं यानी कुल 148 विधानसभा सीटों पर भाजपा के खिलाफ जबरदस्त माहौल है। संघ द्वारा विभिन्न स्तरों पर कराए गए सर्वे रिपोर्ट में बताया गया है कि 90 से ज्यादा विधायकों के व्यवहार और काम से लोगों में नाराजगी पाई गई है। भाजपा सूत्रों के मुताबिक ग्वालियर, चंबल, महाकोशल और विंध्य संभाग के ज्यादातर विधायक हैं जिन के खिलाफ लोकल लेवल पर एंटी इंकम्बेंसी है। यहां पर विधायकों का पार्टी जिलाध्यक्ष और मंडल अध्यक्षों से तालमेल भी ठीक नहीं है। हालांकि राजधानी में संघ के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक में मिले संकेतों के बाद से लगातार चौथी बार सरकार बनाने के मिशन पर काम कर रहा भाजपा का थिंक टैंक सतर्क हो गया है। अब से करीब एक वर्ष बाद नवम्बर 2018 में विधानसभा चुनाव होना है। इसलिए पार्टी ने सभी वर्ग को खुश करने की नीति पर काम करना शुरू कर दिया है। दरअसल, संघ को मिली जानकारी के मुताबिक मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ आम लोगों में एंटी इंकम्बेंसी नहीं है लेकिन स्थानीय स्तर पर विधायकों के व्यवहार और क्षेत्र में कामकाज से लोगों में नाराजगी है।
आदिवासी क्षेत्रों में कमजोर होती पकड़
संघ के सूत्रों के अनुसार, आदिवासी क्षेत्रों में भाजपा की पकड़ कमजोर पड़ती जा रही है। इसकी वजह है नेताओं और अधिकारियों की निष्क्रियता। संघ का मानना है कि सरकार ने आदिवासियों के उत्थान के लिए जितनी योजनाएं क्रियान्वित कर रखी है अगर उनका ठीक से क्रियान्वयन हुआ होता तो स्थिति भाजपा के पक्ष में रहती। विगत माहों में नगरीय निकाय के चुनाव में भाजपा के हाथों से निकली आदिवासी सीट और जनजातीय इलाकों में भाजपा की कमजोर होती पकड़ से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ चितिंत है। उसने सरकार को संकेत दिया है कि वह अभी से वनवासियों को खुश करने में जुट जाए। संघ ने भाजपा पदाधिकारियों को भी जनजातीय इलाकों में सक्रिय रहने के निर्देश दिए। साथ ही जनजातीयों से जुड़े आयोजन को बड़े स्तर पर करने को कहा। संघ के निर्देशानुसार सरकारी योजना का प्रसार और लाभ दिलवाने के लिए कार्यकर्ताओं की टीम जनजातीय इलाकों में लगाई जाए ताकि ज्यादा संख्या में ऐसे लोगों को जोड़ा जा सके।
33 सीटों पर गड़बड़ाता गणित
मप्र में आदिवासियों का कांग्रेस का वोटबैंक माना जाता रहा है लेकिन भाजपा सरकार ने अपने विकास कार्यों के दम पर कांग्रेस के वोटबैंक में सेंध लगाकर 2013 में 47 अजा-अजजा विधानसभा सीटों में से 33 सीटें जीत ली, जबकि 14 सीटे कांग्रेस के कब्जे में है। लेकिन पिछले चार साल में भाजपा ने आदिवासी बहुल इन क्षेत्रों में अपनी सक्रियता कम कर दी। इसका नतीजा यह हुआ है कि योजनाएं धरातल पर नहीं उतर सकी। इससे यह वर्ग सरकार से नाराज है। यह नाराजगी किसी छोटे वर्ग की नहीं बल्कि करीब 1 करोड़ 73 लाख आदिवासियों की है। 29 लोकसभा सीटों में से 6 अजा-अजजा सीटें हैं। पहले ये सभी सीटें भाजपा के पास थी लेकिन उपचुनाव में एक सीट कांग्रेस ने जीती है। संघ की रिपोर्ट के अनुसार धीरे-धीरे स्थिति और बिगड़ती जा रही है। इसलिए संघ ने सरकार को अगाह किया है कि वह अभी से आदिवासियों का आकर्षित करने में जुट जाए। बताया जाता है कि आदिवासियों को भाजपा के पाले में लाने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने विधानसभा चुनाव से पहले आदिवासियों को एक सूत्र में पिरोए रखने के लिए 18 फरवरी 2018 को श्योपुर में हिन्दू समागम का आयोजन किया जा रहा है। 18 फरवरी को होने वाले इस सम्मेलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा अभा सह कार्यवाह सुरेश सोनी मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहेंगे। यहां बताना लाजिमी होगा कि पहले यह हिंदू समागम कराहल कस्बे में होना तय हुआ था लेकिन अब इसकी जगह बदल दी गई है। अब यह समागम श्योपुर के हजारेश्वर महादेव मेला परिसर में होगा। इस मैदान की क्षमता भी एक लाख आबादी के हिसाब से है। इस वृहद आयोजन के लिए भाजपा, संघ, विद्यार्थी परिषद, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल के कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी दी जाएगी। आयोजन में श्योपुर, विजयपुर के अलावा ग्वालियर ग्रामीण विधानसभा के अन्तर्गत आने वाले घाटीगांव, गुना के बम्हारी, शिवपुरी के पोहरी क्षेत्र से भी इन्हें बुलाया जा रहा है। सूत्र बताते हैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पूरी मंशा हिन्दू के नाते आदिवासियों पर पकड़ बनाए रखना है। इस आयोजन के बाद संघ और भाजपाा मिलकर प्रदेश के हर आदिवासी क्षेत्र में ऐसे समागम करेंगे।
कांग्रेसविहीन 17 जिलों ने डाला चिंता में
संघ और भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेसविहीन वे 17 जिले हैं जिनमें 2013 में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली थी। संघ के सूत्रों का कहना है कि जीत के उत्साह में भाजपा और सरकार ने इन जिलों पर कम ध्यान दिया है। इस कारण एक बार फिर से यहां कांग्रेस मजबूत हो रही है। अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक में इस पर चिंता जाहिर की गई और सरकार को इसका ध्यान दिलाया गया। 2013 में जिन 17 जिलों में कांग्रेस का सफाया हो गया था, उनमें मुरैना, दतिया, उमरिया, नरसिंहपुर, बैतूल, होशंगाबाद, रायसेन, आगर, शाजापुर, देवास, खंडवा, बुरहानपुर, अलीराजपुर, झाबुआ, उज्जैन, नीमच और रतलाम हैं। प्रदेश के उमरिया, बैतूल, अलीराजपुर और झाबुआ जिला आदिवासी बहुल जिले हैं। इनके अलावा प्रदेश के 16 जिले ऐसे हैं, जहां कांग्रेस को एक-एक सीट मिली है, उनमें श्योपुर, सागर, छतरपुर, दमोह, पन्ना, सिंगरोली, शहडोल, कटनी, डिंडोरी, मंडला, हरदा, भोपाल, सीहोर, राजगढ़, इंदौर और मंदसौर हैं। अब इन्हीं जिलों में भाजपा कमजोर होती दिख रही है। इसकी वजह है ये जिले आदिवासी और किसान बहुल हैं। संघ का मानना है कि जिस तरह किसान और आदिवासी सरकार से आक्रोशित हैं उससे इन क्षेत्रों में कांग्रेस को संजीवनी मिल सकती है।
आदिवासी हितों की लगातार अनदेखी
युवा कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कुणाल चौधरी कहते हैं कि मध्यप्रदेश में 2003 से भाजपा सत्ता में है लेकिन 14 वर्षों में सरकार ने आदिवासियों के हितों की लगातार अनदेखा किया है। इतना ही नहीं विकास के नाम पर और वन्य प्राणी संरक्षण तथा वन संरक्षण के नाम पर अनेक स्थानों पर हजारों आदिवासी को उनके परंपरागत निवास स्थानों से जबरन हटाया गया है तथा यह प्रक्रिया अभी भी जारी है। वह कहते हैं कि वन अधिकार कानून जो कांग्रेस पार्टी ने दिया था उसके तहत जो पट्टे वह वन भूमि का अधिकार आदिवासी भाइयों को देना था वह अभी तक 1.5 लाख से अधिक लोगों को अभी तक नहीं दिया तथा 2.5 लाख लोगों को सरकार पट्टे देने का जो दावा करती है उन में बड़ी संख्या में गैर आदिवासी और व्यवसायिक कारणों से वन भूमि पर अवैध कब्जा करने वाले लोगों को वनवासी बनाकर उन्हें पट्टे प्रदान किए गए हैं और इसके असली हकदार आदिवासी भाइयों को बेदखल किया जा रहा है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अरूण यादव कहते हैं कि शिवराज सिंह चौहान की सरकार पिछले 14 सालों से आदिवासी लोगों को शोषित कर रही है तथा स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, आवास, खेती, पशुपालन, रोजगार किसी भी क्षेत्र में कोई विकास नहीं किया। आदिवासी क्षेत्रों में खाली पदों पर नियुक्ति भी नहीं कर रहे तथा फर्जी प्रमाण पत्र बनाकर बड़ी संख्या में आदिवासी लोगों का हक छीना जा रहा है।

भाजपा से छिटकेंगे दलित-आदिवासी!
संघ के एक पदाधिकारी कहते हैं कि भाजपा आज देश में इस लिहाज से विशेष पहचान रखती है कि वह दलित, आदिवासी का चेहरा बनने का पुरजोर प्रयास कर रही है। एक हद तक अब दलित-आदिवासियों में भाजपा का मजबूत वोट बैंक तैयार हो चुका है। वैसे यह लक्ष्य भाजपा ने आसानी से हासिल नहीं किया। एक समय देश में दलित-आदिवासी, अल्पसंख्यक, पिछड़े सभी समुदाय के मतदाताओं पर कांग्रेस का एकाधिकार था। आजादी के चालीस साल तक लगभग यही स्थिति बनी रही। इस दौरान भाजपा और इसके संरक्षक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अथक परिश्रम, लगन और समर्पण के साथ सुदूर अंचल में बसे आदिवासियों पर अपना प्रभाव कायम किया। दलितों के बीच भी पार्टी ने पंडित दीनदयाल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचारों के जरिए अपनी पैठ कायम की। तब जाकर यह स्थिति बनी कि अब आदिवासी-दलित मतदाता भाजपा की विशेष पहचान बन पाए हैं। वह कहते हैं कि मप्र में पिछले कुछ सालों से सरकार की नीतियों के कारण आदिवासियों में आक्रोश है। यह प्रदेश सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। कांग्रेस सांसद और पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया कहते हैं कि मध्यप्रदेश जैसे राज्य में यदि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान मतदाताओं को लुभाने के लिए आरक्षण का समर्थन करते हैं तो उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि मंत्रिमंडल में वे दलित-आदिवासी चेहरों को पूरा सम्मान दे पा रहे हैं या नहीं। मध्यप्रदेश में पिछली तीन लगातर बनी भाजपा सरकारों के मंत्रिमंडल पर नजर डालने से साफ जाहिर होता है कि पार्टी दलित-आदिवासी जनप्रतिनिधियों के साथ छलावा कर रही है। मंत्रिमंडल में इन चेहरों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। अब जनता भाजपा के चरित्र को जान चुकी है। अब वह दिन दूर नहीं दलित-आदिवासी मतदाता भाजपा को सबक सिखाएगी।
कहां गया 15 फीसदी फार्मूला
राज्य सरकारों को मंत्रिमंडल में सदस्यों की अधिकतम संख्या रखने के बारे में नियम बनाया गया है। इसके मुताबिक विधानसभा में कुल सदस्यों की संख्या के 15 फीसदी जनप्रतिनिधियों को मंत्री बनाया जा सकता है। यानि कि यदि मध्यप्रदेश में विधानसभा सदस्यों की कुल संख्या 230 है तो प्रदेश सरकार में मंत्रियों की अधिकतम संख्या 35 तक हो सकती है। यदि प्राकृतिक न्याय की बात की जाए तो सरकार को दलित-आदिवासियों के मामले में भी मंत्रियों की संख्या 15 फीसदी रखने के फार्मूले पर अमल करना चाहिए। इस लिहाज से यदि 2013 विधानसभा चुनाव की बात करें तो अनुसूचित जनजाति की आरक्षित सीटों की संख्या 47 है। इसका 15 फीसदी यानि कि 8 आदिवासी चेहरों को मंत्रिमंडल में शामिल किया जाना चाहिए। वहीं अनुसूचित जाति की आरक्षित सीटों की संख्या 35 है। इसका 15 फीसदी यानि कि कम से कम पांच सदस्यों को मंत्रिमंडल में शामिल किया जाना चाहिए। इस लिहाज से देखा जाए तो 2003 में दलित-आदिवासियों की स्थिति मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिहाज से बेहतर थी।
हर वर्ग को साधने की कोशिश हुई फेल
2003 से मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार है। पांव-पांव वाले नेता कहलाने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने कार्यकाल में हर वर्ग को साधने की कोशिश की है। लेकिन अफसरों ने सरकार की मंशा के अनुसार काम नहीं किया। इस कारण सरकार की ही वर्ग को साधने की कोशिश फेल हो गई है। खासकर किसान, आदिवासी और दलित वर्ग सरकार से नाखुश है। इस कारण करीब 101 विधानसभा सीटों पर भाजपा को चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में शिवराज की असली अग्निपरीक्षा विधानसभा चुनाव 2018 है।
भावांतर को किसान नहीं दे रहे भाव
संघ ने किसानों के असंतोष को लेकर सरकार को तो सचेत कर दिया है लेकिन किसानों का आक्रोश कम नहीं हुआ है। सरकार के प्रति उनके आक्रोश का आकलन इसी से किया जा सकता है कि भावांतर योजना के शुभारंभ अवसर पर उन्होंने मंत्रियों के कार्यक्रमों का बहिष्कार किया। यही नहीं उन्होंने भावांतर योजना का भाव भी नहीं दिया। ज्ञातव्य है कि सरकार ने इस बार खरीफ की समर्थन मूल्य पर खरीदी के लिए नया प्रयोग शुरू किया है। बड़े स्तर पर भावांतर योजना का प्रचार-प्रसार करने के बावजूद किसान योजना में पंजीयन के लिए तैयार नहीं है। कृषि विभाग के अनुसार, प्रदेश में करीब 90 लाख किसान हैं, जबकि प्रदेश में 16 अक्टूबर से शुरू हुई भावांतर भुगतान योजना में करीब 23 लाख किसानों ने पंजीयन कराया है। इससे स्पष्ट हो रहा है कि इस नई योजना की पेंचीदगियां अब भी किसान के जहन में नहीं उतर रही और अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोयाबीन का भविष्य खराब होने की खबर के बावजूद किसान योजना से दूरी बना रहा है। नेशनल ब्यूरो ऑफ इंडिया का सर्वे बताता है कि प्रदेश के 90 लाख किसान हैं जिनमें से इस समय सीमांत व छोटे किसान मिलाकर कुल 85 लाख काश्तकार हैं। इसमें से प्रदेश में भावांतर भुगतान योजना में करीब 23 लाख किसानों ने पंजीयन कराया है। जिसमें से 16 लाख 30 हजार किसानों ने ऑनलाइन पंजीयन कराया है। इनमें सें सोयाबीन के लिए 8 लाख 42 हजार, उड़द के लिए 4 लाख 35 हजार, मक्का के लिए 2 लाख 10 हजार, तुअर के लिए 71 हजार, मूंगफली के लिए 28 हजार, तिल के लिए 30 हजार, मूंग के लिए 12 हजार और रामतिल फसल के लिए करीब 2 हजार किसानों ने भावांतर भुगतान योजना में पंजीयन करवाया है। कृषि विभाग के अनुसार, अधिक से अधिक किसानों को भावांतर भुगतान योजना का लाभ दिलाने के लिए प्रदेश की ग्राम पंचायतों में ग्रामसभाओं के माध्यम से भी 6 लाख 50 हजार किसानों ने ऑफलाइन पंजीयन करवाया।
6 लाख 50 हजार किसानों का भटकना पड़ेगा
प्रदेश में भावांतर भुगतान योजना के तहत फसलों की खरीदी और भुगतान ऑनलाइन होना है। कृषि विभाग के अनुसार, भावांतर भुगतान योजना का लाभ पंजीकृत किसानों को मध्यप्रदेश में उत्पादित कृषि उत्पाद का विक्रय अधिसूचित मंडी परिसर में करने पर ही मिलेगा। फसल कटाई प्रयोगों पर औसत उत्पादकता के आधार पर उत्पादन की सीमा तक लाभ दिया जाएगा। योजना में राज्य सहकारी विपणन संघ और राज्य नागरिक आपूर्ति निगम द्वारा पात्र किसानों को अंतर राशि का भुगतान किया जाएगा। योजना का लाभ दिलाने के लिए ग्राम पंचायतों में ग्राम सभाओं के माध्यम से भी 6 लाख 50 हजार किसानों ने ऑफलाइन पंजीयन करवाया। ऐसे में इन किसानों को फसलों को बेचने और फिर भुगतान में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। सूत्र बताते हैं कि जब भी कोई किसान किसी मंडी में अपनी फसल बेचने जाएगा, उसके पंजीयन की स्थिति ऑनलाइन देखी जाएगी। ऐसे में उसकी मजबूरी यह होगी कि उसने जिस जगह ऑफलाइन पंजीयन कराया है उसे वहीं अनाज बेचना होगा। किसान अगर अपनी फसल बेच देता है तो ऑनलाइन पंजीयन नहीं होने के कारण उसे भावांतर योजना का लाभ भी बड़ी मुश्किल से मिलेगा। इसके लिए उसे बार-बार मंडी का चक्कर लगाना पड़ेगा।
बगैर खरीदी से भी संशय
अक्सर सरकार किसानों से माल खरीदकर समर्थन मूल्य का भुगतान करती है, लेकिन कृषि अधिकारी इस वर्ष बगैर खरीदी के किसान को भाव का अंतर देने की बात समझा नहीं पा रहे हैं। बड़े विज्ञापन और योजना के खुलासे के बावजूद किसान को यह डर है कि इसके पीछे कोई ऐसी बात जरूर छिपी है, जिससे उनका नुकसान हो सकता है। किसान चाहता है कि सरकार समर्थन मूल्य पर उनकी उपज खरीदे। जबकि सरकार मंडी से अपने दाम के अंतर की रकम का भुगतान करना चाहती है। इधर, पूर्व केन्द्रीय मंत्री व सांसद कमलनाथ ने भावांतर योजना पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि इसका हश्र कहीं प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की तरह न हो। उसमें भी सपने दिखाए गए थे, भावांतर में भी सपने दिखाए जा रहे हैं, बीमा योजना की स्थिति सामने है।

भाजपा का दावा सत्ता विरोधी लहर नहीं
मध्य प्रदेश में चौथी बार सरकार बनाने की तैयारी में लगी भाजपा का दावा है कि राज्य में सत्ता विरोधी लहर नहीं है। भाजपा की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान का कहना है कि हमें अगले विधानसभा चुनावों में सत्ता विरोधी लहर का कोई डर नहीं है, क्योंकि हमारी सरकार का प्रदर्शन अच्छा है और हमारे संगठन के कार्यकर्ता जागरूक हैं। हमें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की अगुवाई में सूबे में लगातार चौथी बार सरकार बनाने का भरोसा है।
वहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का भी मानना है कि राज्य में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में उन्हें सत्ता विरोधी लहर का सामना नहीं करना पड़ेगा। शिवराज का मानना है कि उनके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि व उनका कामकाज और राज्य में बीते 12 वर्षो में खुद उनके नेतृत्व में सरकार के कामकाज से चुनावों के दौरान वोट मांगने में उन्हें मदद मिलेगी।

किसानों और आदिवासियों को हथियार बनाएगी कांग्रेस
भाजपा सरकार के प्रति किसानों और आदिवासियों के असंतोष को देखते हुए कांग्रेस ने इनका फायदा उठाने की रणनीति बनानी शुरू कर दी है। आगामी विधानसभा चुनाव में अपना जनाधार बढ़ाने के लिए कांंग्रेस अब किसानों और आदिवासियों को साधने की जुगत भिड़ा रही है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अरूण यादव कहते हैं कि विगत 14 वर्षो से मप्र में भाजपा की सरकार है इस दौरान हरिजन आदिवासियों, मजदूरों, किसानों के उत्पीडऩ और शोषण के अलावा कुछ भी नही हुआ है। प्रदेश की भाजपा सरकार मजदूर किसान विरोधी है जिसका दुष्परिणाम उसे आगामी विधानसभा चुनाव में भुगतना होगा। किसानों को साधने के साथ ही कांग्रेस अब आदिवासी हितों को लेकर सजग है। दरअसल, अब कांग्रेस भी आदिवासी सीटों पर पैठ मजबूत करने में जुट गई है। इसकी जिम्मेदारी उठाई है युवा कांग्रेस ने। पिछले माह से कांग्रेस यहां वोट बैंक को और मजबूत करने में जुटी है। रतलाम-झाबुआ लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में सत्तारूढ़ दल भाजपा ने एड़ी चोटी का जोर लगाया, लेकिन कांगे्रस ने उससे वह सीट छिन ली। कांग्रेस लगातार यह वादा भी कर रही है कि प्रदेश के अंचलों में रह रहे आदिवासियों को उनका हक नहीं मिल रहा है। आदिवासियों के नाम की कई योजनाएं कागजों में चल रहीं हैं। कांगे्रस उन्हें उनका हक दिलाएगी। उधर, कांतिलाल भूरिया कहते हैं कि वनवासियों, आदिवासियों को जबरन विस्थापित किया जा रहा है। नेशनल पार्को में आने वाले ग्रामों के निवासियों को प्रशासन द्वारा बेघर किया जा रहा है। सरकार द्वारा आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन के अधिकार का हनन किया जा रहा है।

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