अब ‘शाह’ की इंटरनल ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का इंतजार

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Bengaluru: BJP National Preisdent Amit Shah speaks at a press conference during his three day visit to Bengaluru on Monday. PTI Photo by Shailendra Bhojak (PTI8_14_2017_000091A)

बीजेपी के साथ एनडीए के गठबंधन को  मजबूत करने को लेकर भी पैनी नजर

भोपाल (राकेश अग्निहोत्री)। संघ की वृंदावन समन्वय बैठक के साथ हुए मोदी मंत्रिमंडल विस्तार के बाद अब सबको इंतजार है तो अमित शाह की इंटरनल सर्जिकल स्ट्राइक का, जिन्होंने 100 दिन से अधिक के अपने राज्यों के दौरे के दौरान बदलती बीजेपी के मिजाज और कार्यकर्ताओं की नब्ज को बखूबी पहचान लिया है। ऐसे में मोदी के बाद शाह को अपनी नई टीम गठन करना है जिसे बीजेपी की इंटरनल सर्जिकल स्ट्राइक का नाम दिया जा रहा है। मोदी और शाह सत्ता और संगठन में इन दो चरणों में फेरबदल कर मिशन 2019 का ब्लू प्रिंट तैयार कर आगे बढ़ रहे हैं तो देश की दिशा पर पैनी नजर रखने के लिए संघ की एक और महत्वपूर्ण बैठक कार्यकारिणी मंडल की अक्टूबर के पहले पखवाड़े के अंत में भोपाल में होने जा रही है। मोदी और शाह अपने मंत्रियों, पदाधिकारियों के साथ भाजपा शासित राज्यों की दिशा का मूल्यांकन लगातार कर रहे हैं तो इसी क्रम में आखिर संघ की सक्रियता क्या गुल खिलाएगी, वह भी तब जब मोदी और शाह की धमक से बदल गई बीजेपी में लिए गए कुछ विवादित फैसलों पर अब संघ के हस्तक्षेप और वीटो पर सवाल खड़े होने लगे हैं।

चुनावी राज्यों को लेकर बनेगा नया एजेंडा
नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल विस्तार के बाद भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक दिल्ली में 24-25 सितंबर को होने जा रही है, तो संघ प्रमुख मोहन भागवत का दशहरे के मौके पर संदेश आना है और संघ की कार्यकारिणी मंडल की प्रस्तावित बैठक अक्टूबर के पहले पखवाड़े में होना है । अमित शाह देशव्यापी दौरे के तहत भाजपा शासित राज्य और जहां उनकी सरकार नहीं है वहां कांग्रेस और तीसरे दलों के अस्तित्व का आंकलन कर चुके हैं। जिन राज्यों में निकट भविष्य में विधानसभा के चुनाव हैं उसको लेकर भी अलग रणनीति के तहत अमित शाह पार्टी के एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं। उद्देश्य मिशन 2019 लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए आगे बढऩा ही है। इस जमावट के कुछ संकेत मोदी मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान भी देखने को मिले। बावजूद इसके अमित शाह की बीजेपी के साथ एनडीए के गठबंधन को मजबूत करने को लेकर भी पैनी नजर रही है। वह बात और है कि गठबंधन का कुनबा बढऩे के बावजूद इस तीसरे विस्तार में जेडीयू, शिवसेना, अन्ना डीएमके जैसे दलों की मंत्रिमंडल में भागीदारी सुनिश्चित नहीं हो पाई। ऐसे में भाजपा संविधान के तहत हर 3 माह में होने वाली राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक की तारीख पहले ही अमित शाह के दौरों को ध्यान में रखते हुए बढ़ा दी गई थी। अब उसका समय नजदीक आ गया है जिसे संघ की वृंदावन में समन्वय बैठक मोदी मंत्रिमंडल का विस्तार की तीसरी महत्वपूर्ण कड़ी बीजेपी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से जोडक़र देखा जा रहा है। अमित शाह की टीम में पिछले कुछ सालों में कोई बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिला है लेकिन अब राज्यों के विधानसभा चुनाव और उसके बाद लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए कुछ नए चेहरों को शाह की टीम में जगह मिलने से इंकार भी नहीं किया जा सकता। चाहे फिर वह मंत्रिमंडल से हटाए गए चेहरे हों या फिर केंद्र से लेकर राज्य संगठन में जरूरी फेरबदल को ध्यान में रखते हुए बदलाव की जरूरत ही क्यों ना हो। केंद्रीय मंत्रिमंडल से पांडे को हटाकर उन्हें उत्तर प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बनाए जाने के यदि संकेतों को समझा जाए तो इस दायरे में आने वाले दूसरे नेताओं को भी जिसमें मंत्री पद से हटाए गए या फिर मंत्री नहीं बन पाए दावेदारों को भी संगठन में राष्ट्रीय स्तर से लेकर प्रदेश स्तर पर नई भूमिका से नवाजा जा सकता है। खासतौर से चर्चा राजीव प्रताप रूडी जिन्होंने पहले ही मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था और प्रहलाद पटेल जो ऐनटाइम पर मोदी मंत्रिमंडल का हिस्सा नहीं बन सके की ज्यादा है।
शाह की स्क्रिप्ट का क्या होगा मप्र में असर ?
देखना दिलचस्प होगा कि जब संघ को भरोसे में लेकर अमित शाह मिशन मोदी को पूरा करने के लिए एक नई स्क्रिप्ट लिख रहे हैं तो उसका असर मध्यप्रदेश की राजनीति पर क्या पड़ता है। जहां से वीरेंद्र कुमार खटीक को हाल ही में मंत्री बनाया गया है। इस राज्य से कुल 6 मंत्री केंद्र में हो चुके हैं तो अब अमित शाह की टीम का हिस्सा बने राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा, राष्ट्रीय सचिव ज्योति धुर्वे की नई भूमिका पर नजर टिक जाती है। सवाल यहीं पर खड़ा होता है कि मंत्री बनने से रह गए प्रहलाद पटेल को क्या राष्ट्रीय पदाधिकारी के तौर पर अमित शाह अपनी टीम का हिस्सा बनाएंगे और यदि यह संभव हुआ तो प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने वाले दूसरे राष्ट्रीय नेताओं की भूमिका में क्या बदलाव देखने को मिलेगा। क्या पश्चिम बंगाल की अहम जिम्मेदारी निभा रहे वहां के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय जो अभी भी विधायक हैं क्या वापस मध्यप्रदेश का रुख करेंगे। यदि इस फार्मूले पर राष्ट्रीय नेतृत्व विचार करता है तो सत्ता और संगठन में उनकी भूमिका क्या होगी जबकि वह विधायक हैं और मंत्री रह चुके हैं। नंदकुमार सिंह चौहान के उत्तराधिकार की एक नई चर्चा फिर सुनने को मिलेगी या फिर कैलाश विजयवर्गी शिवराज मंत्रिमंडल का हिस्सा बनकर नई भूमिका में नजर आएंगे। आदिवासी नेता फग्गन सिंह कुलस्ते के मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने के बाद भी प्रदेश की राजनीति में उनकी नई भूमिका पर ध्यान रखना अभी भी बाकी है तो संगठन की खासी समझ रखने वाले प्रभात झा जैसे नेताओं की सेवाएं अमित शाह किस भूमिका में लेंगे यह भी तय होना बाकी है। जो भी हो इतना तय है कि यदि प्रहलाद पटेल अमित शाह की टीम में राष्ट्रीय पदाधिकारी बनते हैं तो संगठन की दूसरी कडिय़ां भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकतीं। इसके लिए अगले 2 सप्ताह बहुत मायने रखते हैं क्योंकि दिल्ली में यदि प्रहलाद पटेल और अमित शाह एक-दूसरे के संपर्क में हैं तो मध्यप्रदेश के संगठन महामंत्री सुहास भगत भी विस्तार के बाद दिल्ली में ही मौजूद हैं। वह भी तब जब अमित शाह भोपाल दौरे के दौरान मुख्यमंत्री ही नहीं प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान के नेतृत्व को भी 2019 तक के लिए हरी झंडी देकर जा चुके हैं।
समन्वय बैठक और मंत्रिमंडल विस्तार!
संघ की वृंदावन में खत्म हुई समन्वय बैठक का भले ही अपना एजेंडा रहा हो लेकिन मोदी सरकार के तीसरे विस्तार से भी इसे जोडक़र देखा जा रहा है जो शायद गलत भी नहीं है क्योंकि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की समन्वय बैठक में मौजूदगी और उसके बाद तेजी से बदलते दिल्ली के घटनाक्रम का पटाक्षेप मंत्रिमंडल विस्तार के साथ सामने आया। नौकरशाही की पृष्ठभूमि वाले नए मंत्रियों की इंट्री हो या फिर संघ की विचारधारा वाली उमा भारती जैसे मंत्री का सियासी कद कमजोर कर देने के संकेत इन दिनों चर्चा का विषय बने हुए हैं। जिसे विस्तार के बाद नए सिरे से मंत्रियों के लिए आवंटित विभाग और खासतौर से रक्षा मंत्री की भूमिका में पहली बार पूर्णकालिक मंत्री के तौर पर निर्मला सीतारमन के सामने आने से जोडक़र देखा जा रहा है। चर्चा नीतीश कुमार के एनडीए के गठबंधन में शामिल होने के बावजूद जेडीयू और महाराष्ट्र में शिवसेना की मंत्रिमंडल में भागीदारी के साथ तमिलनाडु की राजनीति में अन्ना डीएमके का शामिल नहीं हो पाना भी चर्चा में है। इसके लिए एक और विस्तार की उम्मीद की जा रही है। कुल मिलाकर जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की धमक में और इजाफा लाने की रणनीति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने एक बार फिर कारगर सिद्ध की तो संदेश फिर वही गया कि मोदी और शाह की इस जोड़ी को चुनौती देना फिलहाल न तो पार्टी के अंदर किसी के वश में है और न ही विरोधियों की ही ताकत है जो वह सरकार के 3 साल पूरे होने के बाद कोई टक्कर दे सके। ऐसे में जब कई महत्वपूर्ण फैसलों को लेकर मोदी सरकार पर विपक्ष नए सिरे से हमले की रणनीति बना रहा है और जनता भी नोटबंदी-जीएसटी को लेकर सोचने को विवश हुई है तब भाजपा जिस संघ को अपना मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत मानता है उसकी तरफ से भी मोदी और शाह को फ्री हैंड देने के ही संकेत मिल रहे हैं। ऐसे में नरेंद्र मोदी की नई टीम सामने आने के बाद जब जल्दी ही अमित शाह की टीम भी सामने आने की चर्चा है तो 24-25 सितंबर को होने वाली राष्ट्रीय कार्यकारिणी का महत्व बढ़ जाता है। यह निश्चित तौर पर मिशन 2019 के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाएगी तो ऐसे में वृंदावन की संघ की समन्वय बैठक के बाद कार्यकारिणी मंडल की 3 दिन की भोपाल बैठक को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। वह बात और है कि मोदी सरकार के 3 साल पूरे होने के बाद भोपाल में प्रस्तावित संघ के कार्यकारिणी मंडल की बैठक के पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत के दशहरा संदेश में भी कई संकेत छुपे होंगे।
पार्टी में जल्दी ही कुछ नए चेहरे आएंगे!
लोकसभा से पहले कई राज्यों में विधानसभा चुनाव भी हैं इसलिए कुछ नए चेहरे संगठन में लाए जा सकते हैं। पार्टी को अच्छे प्रवक्ताओं की जरूरत भी महसूस हो रही है। इसलिए भी संगठन में नए चेहरे आएंगे।अमित शाह ने जब राजनाथ सिंह से पार्टी की कमान ली थी, तब 2014 में पार्टी के 11 उपाध्यक्ष होते थे, लेकिन अभी सिर्फ सात हैं। चार उपाध्यक्षों में से रघुवर दास झारखंड के मुख्यमंत्री हो गए और किरण माहेश्वरी राजस्थान सरकार में मंत्री बन गए। बंडारू दत्तात्रेय और मुख्तार अब्बास नकवी उसी समय केंद्र में मंत्री बन गए थे। अब बंडारू दत्तात्रेय मंत्रिमंडल से मुक्त हो गए हैं। इसी तरह शाह की टीम में से तीन महासचिव भी कम हो गए हैं। राजीव प्रताप रूड़ी, रामशंकर कठेरिया और जेपी नड्डा को केंद्र में मंत्री बना दिया गया था। अब रूड़ी मंत्रिमंडल से बाहर हो गए हैं और कठेरिया को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का अध्यक्ष बना दिया गया है। अभी शाह की टीम में आठ महासचिव हैं। अमित शाह जनवरी 2016 में पूर्ण कार्यकाल के लिए अध्यक्ष चुने गए। उसके बाद उन्होंने अपनी टीम में बहुत मामूली फेरबदल किया। कुछ लोग हटे तो उनकी जगह नए लोग रख लिए। जैसे सिद्धार्थ नाथ सिंह और श्रीकांत शर्मा उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री हुए तो श्रीकांत शर्मा वाली जिम्मेदारी अनिल बलूनी को दे दी गई और संजय मयूख को उनके साथ मीडिया का सह प्रभारी बना दिया गया। शाह ने नितिन गडकरी के समय बनाए गए सारे प्रकोष्ठ भंग कर दिए हैं। उनमें से हटाए गए नेता भी नई जिम्मेदारी का इंतजार कर रहे हैं। सो, कहा जा रहा है कि पार्टी में जल्दी ही कुछ उपाध्यक्ष, कुछ महासचिव और कुछ प्रवक्ता नियुक्त हो सकते हैं।

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