भ्रष्टाचार के विरूद्ध जीरो टॉलरेंस का राग: 7, 576 भ्रष्टों पर सरकार मेहरबान

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भोपाल (विनोद उपाध्याय)। मप्र सरकार भले ही भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति का दावा कर रही है और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के निशाने पर दागी अफसर हंै,लेकिन यह सब दिखावा साबित हो रहा है, क्योंकि प्रदेश में करीब साढ़े सात हजार से ज्यादा भ्रष्ट ऐसे हैं जिनपर सरकार पिछले 13 साल से मेहरबान हैं। लोकायुक्त, ईओडब्ल्यू में इन अधिकारियों, कर्मचारियों की रिश्वतखोरी सहित भ्रष्ट आचरण के मामले लंबित हैं। आलम यह है की सरकार के ढुलमुल रवैए के कारण इन भ्रष्टों पर कार्रवाई नहीं हो रही है। मुख्यमंत्री भ्रष्टों को निरंतर चेतावनी दे रहे हैं, लेकिन वह बेअसर साबित हो रही है। न दागियों के खिलाफ कार्रवाई हो रही है और न ही भ्रष्टाचार व रिश्वतखोरी रूक रही है।

मप्र में पिछले 13 सालों में विकास की गति बढऩे के साथ ही भ्रष्टाचार के द्वार भी खुल गए। आज स्थिति यह है की यहां बिना रिश्वत, कमीशन के कोई काम नहीं होता। हाल ही में सामने आए राजस्व घोटाले और आबकारी घोटाले इसके ताजा उदाहरण है। हालांकि कि ये घोटाले मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव बीपी सिंह की सतर्कता और सख्ती के बाद सामने आए हैं।
5 प्रतिशत भ्रष्टों से प्रशासनिक व्यवस्था तार-तार
मप्र में जीरो टॉलरेंस की स्थिति क्या है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि केवल 5 प्रतिशत भ्रष्टों ने पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को चौपट कर रखा है। खुद प्रदेश के उप लोकायुक्त यूसी माहेश्वरी कहते हैं कि प्रदेश में 95 प्रतिशत लोग ईमानदार हैं। केवल पांच प्रतिशत से भी कम लोग हैं, जो भ्रष्टाचार करते हैं। यानी आज साढ़े सात करोड़ की आबादी वाले मप्र में 5 प्रतिशत भ्रष्ट अधिकारियों-कर्मचारियों ने व्यवस्था पर इस कदर कुंडली मार रखी है कि अधिकांश को सरकार की योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अरूण यादव कहते हैं कि जब सरकार में भ्रष्टों को संरक्षण मिल रहा है तो व्यवस्था कैसे सुधरेगी। मुख्यमंत्री भ्रष्ट अफसरों का सबक सिखाने की बात हर बैठक और हर सभा में कहते हैं, लेकिन वे खुद भ्रष्टों से घिरे हैं।
दागियों के खिलाफ नहीं होती  कोई कार्रवाई
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पिछले एक दशक से दागियों और भ्रष्टों के खिलाफ कार्रवाई करने की चेतावनी देते आ रहे हैं, लेकिन हकीकत ये है कि उनकी चेतावनी का अफसरों पर कोई असर नहीं हो रहा है। जांच में दोषी पाए जाने के बाद भी अफसरों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो पाती है। ऑडियो टेप के जरिए कई अधिकारियों की कारगुजारियां सामने आईं पर किसी के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं की गई। जबलपुर में पदस्थ रहे आईएफएस अधिकारी व मुख्य वन संरक्षक अजीत श्रीवास्तव एक कार्रवाई को रफा-दफा करने के एवज में 55 लाख रुपए की मांग करते सुनाई दिए थे। दतिया में कलेक्टर रहे प्रकाश जांगरे व कार्यपालन यंत्री आरके सिंघारे के बीच ऑडियो वायरल हुआ। अजाक आयुक्त रहे जेएन मालपानी विभाग के बड़वानी में पदस्थ सहायक आयुक्त श्रोती से रिश्वत की मांग करते सुनाई दिए थे, तब उन्हें निलंबित कर दिया गया था। इसके अलावा भी कई अफसर ऐसे हैं, जिनके खिलाफ जांच चल रही है पर नतीजा नहीं आया। लकड़ी व्यवसायी अशोक रंगा और आईएफएस अजीत श्रीवास्तव का एक ऑडियो टेप वॉट्सएप पर वायरल हुआ था। इसके मुताबिक रंगा के बेटे अरुण के ट्रक को सागौन की लकड़ी के साथ गत जुलाई में काल्पी डिपो के पास तत्कालीन सीसीएफ श्रीवास्तव ने पकड़ा व राजसात किया था। आरोप है कि श्रीवास्तव ने रंगा को आठ अलग-अलग स्थानों पर चर्चा के लिए बुलाया। उन्होंने 55 लाख रुपए रिश्वत मांगी थी। श्रीवास्तव को हटाकर भोपाल वन मुख्यालय में तैनात कर दिया गया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। रिश्वत के ही एक अन्य ऑडियो में अजाक आयुक्त रहे जेएन मालपानी, विभाग के बड़वानी में पदस्थ सहायक आयुक्त श्रोती को निलंबित कर दिया गया था। मालपानी तो सेवानिवृत्त हो गए। दूसरी तरफ श्रोती के खिलाफ सवा साल बाद भी जांच पूरी नहीं हो पाई है। आदिम जाति कल्याण विभाग में ही अपर संचालक रहे वाष्र्णेय भी निलंबित चल रहे हैं। उनके खिलाफ छत्तीसगढ़ में पदस्थापना के दौरान शिक्षक भर्ती में गोलमाल करने का आरोप है। अदालत में चालान पेश होने के बाद उन्हें निलंबित कर दिया था। वन भू-अभिलेख शाखा में पदस्थ मुख्य वनसंरक्षक पीके सिंह पर मुकुंदपुर सफारी के निर्माण में गड़बड़ी के आरोप हैं। मामले की प्रारंभिक जांच कार्य आयोजना के अपर प्रान मुख्य वनसंरक्षक अरुण कुमार ने की थी। इसमें सिंह पर गड़बड़ी के आरोप सही पाए गए थे। इसके बाद संरक्षण शाखा के एपीसीसीएफ डॉ. अतुल श्रीवास्तव से विस्तृत जांच कराई गई है। इस मामले में सिंह को राहत मिलने की उम्मीद कम है, क्योंकि सिंह मामले की प्रारंभिक जांच करने वाले अफसर अरुण कुमार के खिलाफ रीवा कोर्ट में प्राइवेट इस्तगासा लगा चुके हैं। उनके इस निर्णय से शासन में बैठे अफसर नाराज हैं।
राजस्व विभाग सबसे ज्यादा भ्रष्ट
मप्र में भ्रष्टाचार का तमगा लेने के लिए विभागों में प्रतियोगिता सी होती रहती है। वैसे तो हर विभाग में भ्रष्टाचार है, लेकिन राजस्व विभाग सबसे आगे हैं। किसान आंदोलन में बाद सरकार ने जब से राजस्व विभाग पर ध्यान दिया है भ्रष्टाचार की परतें खुलने लगी हैं। अगर लोकायुक्त के आंकड़ों को भी देखें तो राजस्व विभाग सबसे भ्रष्ट है। पिछले तीन सालों के लोकायुक्त के आंकड़ों को देखें तो परिवहन, एक्साइज, कमर्शियल टैक्स, सिंचाई विभाग और पीडब्ल्यूडी में कम मामले सामने आए हैं। लोकायुक्त के आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन सालों में जहां राजस्व विभाग के 36 लोग रंगेहाथ रिश्वत लेते पकड़े गए तो पुलिस विभाग के भी 29 लोग ट्रैप हुए।
लोकायुक्त ने 3 साल में 176 भ्रष्टाचारी पकड़े लेकिन इनमें परिवहन और एक्साइज विभाग का एक भी कर्मचारी शामिल नहीं है। इस लिहाज से तो यह सबसे ईमानदार विभागों में शामिल हैं। वहीं लोकायुक्त इंदौर ने पिछले तीन सालों में पीडब्ल्यूडी के तो फिर भी पांच मामले पकड़े हैं लेकिन कमर्शियल टैक्स विभाग में एक साल में औसतन एक भ्रष्टाचारी भी लोकायुक्त की निगाह में न तो आया और न ही पकड़ा गया। यह तथ्य वाकई आश्चर्यजनक है कि जिन विभागों को सबसे गड़बड़ी भरा माना जाता है, वे विभाग लोकायुक्त के आकड़ों के मुताबिक भ्रष्टाचार से मुक्त हैं। रोचक तथ्य यह भी है कि नोटबंदी का असर भ्रष्टाचार के प्रकरणों पर भी पड़ा है। 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी लागू होने के बाद पांच महीनों में सिर्फ 7 मामले भ्रष्टाचार के सामने आए जबकि इसके पहले अप्रैल 2016 तक 169 कर्मचारियों को लोकायुक्त पुलिस ट्रैप कर चुकी थी।
विशेष न्यायालयों में लंबित है 1166 प्रकरण
प्रदेश में भ्रष्टाचार पर अंकुश न लग पाने का एक बड़ा कारण है भ्रष्टों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पाना। लोकायुक्त की विशेष पुलिस स्थापना द्वारा चालान पेश किए जाने के बाद भी विभिन्न विशेष न्यायालयों में लंबित अपराधिक प्रकरणों की संख्या 1166 है। सबसे अधिक भोपाल विशेष न्यायालय में 188 मामले लंबित हैं। वहीं इंदौर में 109, उज्जैन में 54, जबलपुर में 30, ग्वालियर में 42, रीवा में 36 और सागर मेें 49 मामले लंबित हैं। लोकायुक्त में 2016 तक के आंकड़े बता रहे हैं कि भ्रष्टाचार की 154 से ज्यादा शिकायतें जांच के नाम पर लंबित हैं। इसमें से 38 मामले तो पांच साल से ज्यादा पुराने हैं। सबसे ज्यादा 2013 के 25 मामले प्राथमिक जांच कर ठंडे बस्ते में डाल दिए गए। इनमें से अधिकांश का खात्मा काटने की तैयारी है।
हर चौथा अधिकारी कर्मचारी दागी
नौकरशाहों पर भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर मध्यप्रदेश भले ही तीसरे स्थान पर है, लेकिन यहां के हर चौथे अधिकारी-कर्मचारी पर कोई न कोई आरोप है। पिछले 10 साल से जिस तरह के मामले उजागर हो रहे हैं, उनसे इतना तो साफ है कि चाहे नौकरशाही हो या फिर अन्य अधिकारी-कर्मचारी सबके सब भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। पंचायत के सचिव से लेकर सरकार के बड़े अफसरों तक के यहां पड़े छापों में जो सच्चाई सामने आई है, वह आंखें खोलने के लिए काफी है। इस तरह आईएएस, आईएफएस, आईपीएस अधिकारियों, कर्मचारियों और राज्य स्तर के अधिकारियों की एक लंबी सूची है। प्रदेश सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस का दावा करती है, लेकिन लोकायुक्त, ईओडब्ल्यू और अदालतों में दर्ज मामलों को देखें तो सच्चाई कुछ और ही नजर आती है। मुख्यमंत्री सचिवालय से लेकर प्रदेश के अधिकांश मलाईदार पदों पर, ऐसे आईएएस अधिकारी काबिज हैं, जिन के खिलाफ एंटी करप्शन एजेंसी लोकायुक्त में भ्रष्टाचार की जांच चल रही है। यही नहीं लोकायुक्त संगठन के आंकड़ों के मुताबिक 26 आईएएस अफसरों के साथ ही दो मंत्रियों, एक पूर्व मंत्री सहित 2 हजार 7 सौ नेता और अफसर भ्रष्टाचार के आरोप से घिरे हैं। आंकड़ों के मुताबिक आईएएस अफसरों में मुख्यमंत्री सचिवालय में प्रमुख सचिव अशोक वर्णवाल, प्रमुख सचिव मनोहर अगनानी, प्रवीण गर्ग, प्रवीण कृष्ण, शिखा दुबे, अजीत केसरी, विवेक पोरवाल, नरेश पाल, बसंत कुर्रे, संतोष मिश्रा, एसएस कुमरे, अरुण पांडे, विशेष गढ़पाले, आकाश त्रिपाठी, अखिलेश त्रिपाठी, सभाजीत यादव, विकास नरवाल, रमेश थेटे, पीएल सोलंकी शामिल हैं। इनके खिलाफ पद का दुरुपयोग कर लाभ पहुंचाने, अनियमितता बरतने के अलावा दवा खरीदी, किसानों की जमीन हड़पने से लेकर मंदिर की जमीन बेचने तक के मामलों की जांच चल रही है।

लोकायुक्त में इसलिए लटक जाते हैं मामले
लोकायुक्त सूत्रों के मुताबिक छापे की कार्रवाई के बाद पहले तो दस्तावेजों के परीक्षण और विभागीय जांच में ही डेढ़ से दो साल लग जाते हैं, इसके बाद जब आरोपी अधिकारी को अपना पक्ष रखने के लिए बुलाया जाता है तो वे कमियां दिखाकर आवेदन पर आवेदन लगाते रहते हैं। इससे मामला और ज्यादा लंबित होता जाता है। फिर शासन के नियमों के मुताबिक प्रकरण को विभागीय जांच के लिए भेजना होता है। ऐसा इसलिए कि यदि विभाग ने कोई राशि नकद खर्च करने के लिए संबंधित अफसर या कर्मचारी को दी हो तो उसके लेन-देन के दौरान किसी को गलत ढंग से न फंसा दिया जाए। इसलिए मूल विभाग से अनुशंसा का नियम है।
इस तरह मिलती है अनुमति
विभाग से अनुमति के लिए लोकायुक्त चालान की प्रति विभाग को भेजता है तो संबंधित विभाग के पीएस पूरी फाइल पढ़ते हैं। इसके बाद 10 से 20 पेज में लिखे आरोप को पढक़र अनुमति और अनुशंसा दी जाती है। जानकारी के अनुसार पहले नियम था कि केवल चालान फाइल पर लिखा जाता था कि अनुशंसा की जाती है लेकिन इसे लेकर आरोपी के वकील आपत्ति लगाते थे कि विभाग बिना पढ़े ही अनुमति दे देते हैं। इससे केस कमजोर हो जाता था। जानकारी के अनुसार, राजस्व विभाग में 146, सामान्य प्रशासन विभाग में 25, नगरीय निकाय में 16, पंचायत विभाग में 45 और सहकारिता विभाग में 49 मामले लटके हैं। उप लोकायुक्त यूसी माहेश्वरी कहते हैं कि हमारी तरफ देर नहीं होती है। छापे की कार्रवाई के बाद अभियोजन की अनुमति के लिए संबंधित विभागों को प्रकरण भेज दिया जाता है। अब ये सरकार को देखना होगा की उनकी आंतरिक व्यवस्था कैसी है। सरकार को अपने संसाधन बढ़ाने चाहिए, ताकि इस तरह के मामलों में देरी न हो।
अब जमानत नहीं आसान
अभी तक लोकायुक्त छापों के मामले में सभी आरोपियों को चालान पेश होने के साथ ही जमानत मिल जाती थी। रंगेहाथों पकड़े गए कर्मचारी भी गिरफ्तार नहीं होते थे लेकिन हाईकोर्ट ने कुछ मामलों में भ्रष्टाचार के आरोपियों को जमानत नहीं देने के फैसले सुनाए हैं। इनको नजीर बनाकर अब जमानत निरस्त की जा रही है। इंदौर जेल अधीक्षक रहे पीडी सोमकुंवर को जहां ऐसे ही मामले में सुप्रीम कोर्ट तक से जमानत नहीं मिली। वहीं हाल ही में रिश्वत लेते रंगेहाथों पकड़े गए सतना नगर निगम कमिश्नर इंदौर के अपर आयुक्त रह चुके कथूरिया को भी सलाखों के पीछे दिन गुजारने पड़े। लोकायुक्त पुलिस के 80 प्रतिशत मामलों में सजा हो रही है।
लोकायुक्त से उठा भरोसा
भ्रष्टाचार, पद के दुरुपयोग और कुप्रशासन पर रोक लगाने के लिए गठित लोकायुक्त प्रशासन अब लोगों का विश्वास जीतता नहीं दिख रहा है। यह साबित हो रहा है लोकायुक्त में आने वाली शिकायतों की कम होती संख्या से। भ्रष्टाचार के मामलों में ढुलमुल रवैए के चलते लोगों का लोकायुक्त पर से भरोसा उठता जा रहा है। साल की पहली तिमाही में लोकायुक्त में दर्ज मामले भी इस बात की पुष्टि कर रहे हैं। इस साल लोकायुक्त में दर्ज प्रकरणों की संख्या में पिछले साल की तुलना में 25 फीसदी की कमी आई है। लोग अब लोकायुक्त में शिकायत करने की बजाए सोशल मीडिया में रिश्वत लेने वालों के ऑडियो और वीडियो डाल कर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं। दरअसल, स्टाफ की कमी और अधिकार विहीन होने के कारण लोकायुक्त पंगु साबित हो रहा है। जिस तरह लोकायुक्त संगठन में स्टाफ की कमी है उससे शिवराज सिंह चौहान के भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस पर बड़ा सवाल उठ गया है। आज प्रदेश में भ्रष्टाचार चरम पर है लेकिन लोकायुक्त संगठन में छापा मारने वाले अफसरों की कमी के चलते भ्रष्ट बाबुओं पर कार्रवाई प्रभावित हो रही है। प्रभारी लोकायुक्त जस्टिस माहेश्वरी के बार-बार पत्र लिखे जाने के बाद भी डीएसपी और इंस्पेक्टर के पचास फीसदी पद खाली हैं। नाराज प्रभारी लोकायुक्त यूसी माहेश्वरी का कहना है कि खाली पदों पर नियुक्तियां सरकार को प्राथमिकता के आधार करनी चाहिए।
अधिकारियों का टोटा
छापेमारी करने वाले डीएसपी और इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारियों का टोटा होने से ऐसी स्थिति बनी है। दरअसल, मुख्यालय के अलावा लोकायुक्त संगठन के सात संभागों भोपाल, इंदौर, उज्जैन, जबलपुर, ग्वालियर, सागर और रीवा में दफ्तर हैं, जो विशेष पुलिस स्थापना के एसपी के नाम से जाने जाते हैं। विशेष पुलिस स्थापना यानि लोकायुक्त पुलिस को ही छापा मारने का अधिकार है। खाली पदों पर नजर डाले तो प्रदेश में डीएसपी के कुल 33 पद स्वीकृत हैं इस में से 16 पद खाली है। इसी तरह इंस्पेक्टर के कुल 51 पद स्वीकृत हैं। इसमें से 33 भरे हैं जबकि 18 रिक्त हैं। आंकड़ों के मुताबिक भोपाल संभाग में डीएसपी स्तर के तीन, इंदौर में तीन, जबलपुर में 2, उज्जैन में 2, ग्वालियर में 4, सागर संभाग में 2 पद खाली हैं। खाली पदों को भरने के लिए प्रभारी लोकायुक्त जस्टिस यूसी माहेश्वरी ने राज्य सरकार को कई बार पत्र लिखा, लेकिन अब तक रिक्त पदों को नहीं भरा गया है। नाराज माहेश्वरी का कहना है कि सरकार की अपनी मजबूरियां हैं, लेकिन रिक्त पदों पर नियुक्तियां प्राथमिकता में होना चाहिए। लोकायुक्त संगठन के जनवरी 2016 से अप्रैल 2017 के आंकड़ों के मुताबिक सरकारी दफ्तरो में काम के बदले या फिर फाइल आगे बढ़ाने के लिए रिश्वतखोरी बढ़ी है। हालांकि इस अवधि में भोपाल संभाग में 18 घूसखोर, सागर में 12 , इंदौर में 20, रीवा 7, जबलपुर में 15, ग्वालियर में 9 और उज्जैन संभाग में 12 घूसखोर सरकारी अधिकारी और कर्मचारी लोकायुक्त हाथों गिरफ्तार किये गए। लेकिन छापेमारी न के बराबर रही। भोपाल संभाग, इंदौर, उज्जैन,सागर और रीवा संभाग में एक भी भ्रष्ट अफसरों पर छापे की कार्रवाई नहीं हुई। फिलहाल, शिवराज सिंह चौहान ने तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस का संकल्प लिया था। ऐसे में एंटी करप्शन एजेंसी लोकायुक्त संगठन में डीएसपी और इंस्पेक्टरों की कमी से साफ है, जिम्मेदार अधिकारी सीधेतौर से सीएम से जुड़े मसले पर गंभीर नहीं रहते।

इन अफसरों के मामले भी लंबित
मयंक जैन
भ्रष्टाचार के आरोप के बाद लोकायुक्त ने छापा मारा। आय से अधिक संपत्ति मिली। मामला दर्ज हुआ। उन्हें सस्पेंड कर दिया गया लेकिन लोकायुक्त को अभी तक अभियोजन की अनुमति नहीं मिली।
बीके सिंह
आईएफएस बीके सिंह पर आय के अधिक संपत्ति के मामले में उज्जैन व भोपाल में लोकायुक्त ने छापा मारा था। मामला दर्ज हुआ और अभियोजन के लिए सरकार के पास आज भी लंबित।
डॉ. डीएन शर्मा
एग्रीकल्चर डायरेक्टर रहते हुए डॉ. डीएन शर्मा के घर लोकायुक्त का छापा पड़ा था। आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज हुआ लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। आखिरकार वे रिटायर हो गए।
राघव चंद्रा
गृह निर्माण मंडल के आयुक्त रहते समय भ्रष्टाचार के आरोप लगे। मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है।
पीयूष त्रिवेदी
तकनीकी विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर काबिज हैं। व्यापमं फर्जीवाड़े के आरोप इन पर लगे। गलत नियुक्ति को लेकर कई शिकायतें।
बीके मंदोरिया
तहसीलदार रहते हुए बीके मंदोरिया पर 50 हजार की रिश्वत का आरोप। निलंबित करने की जगह भोपाल तबादला कर दिया।
रमाकांत तिवारी
प्रमुख सचिव पीडब्ल्यूडी प्रमोद अग्रवाल के नाम पर एसडीओ अनिल मिश्रा और असिस्टेंट इंजीनियर आरपी शुक्ला से रिश्वत मांगने का आरोप।
डॉ. अजीत श्रीवास्तव
आईएफएस डॉ अजीत श्रीवास्तव द्वारा 55 लाख की रिश्वत मांगने का ऑडियो आया। उनका सिर्फ तबादला किया। जांच चल रही है।
एएन मित्तल
स्वास्थ्य संचालक रहते हुए इन पर भी भ्रष्टाचार का आरोप लगा। लोकायुक्त ने छापे मारे तो लाखों रुपए नकद और संपत्ति मिली। मामले में उन्हें सस्पेंड किया गया।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी खाली हैं लोकायुक्त का पद
प्रदेश की कई संवैधानिक संस्थाएं लंबे समय से प्रभारियों के भरोसे चल रही हैं। हाईकोर्ट ने भी कई बार सरकार को लोकायुक्त संगठन और मानवाधिकार आयोग जैसी संस्थाओं में पूर्णकालिक मुखिया की नियुक्ति करने के निर्देश दिए, लेकिन सरकार ने कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया। प्रदेश का शीर्ष संवैधानिक राज्यपाल का पद भी बीते एक साल से खाली है। सरकार का दावा भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का भले हो, लेकिन वास्तविक हालात ये है कि एक साल से भी ज्यादा समय से लोकायुक्त का पद खाली है। जस्टिस पीपी नावलेकर जून 2016 में सेवानिवृत्त हुए थे, तब से ही लोकायुक्त का प्रभार उपलोकायुक्त जस्टिस यूसी माहेश्वरी संभाल रहे हैं। हाईकोर्ट भी सरकार से इस मामले में जवाब-तलब कर चुका है। तब सरकार ने कोर्ट को दिए जवाब में कहा था कि मध्यप्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष न होने से लोकायुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया पूरी नहीं हो पा रही हैं। अब नेता प्रतिपक्ष आए भी छह महीने बीत गए, लेकिन सरकार ने नियुक्ति में रुचि नहीं ली।
लगातार मिल रही है शिकायतें
एक तरफ लोकायुक्त संगठन में स्टाफ की कमी है वहीं दूसरी तरफ संगठन में भ्रष्टाचार की शिकायतें बराबर मिल रही हैं। लोकायुक्त पुलिस की परेशानी का सबब बनी हुई हैं गुमनाम चि_ियां। रोजाना 5 से 7 ऐसी चि_ियां लोकायुक्त पुलिस पहुंच रही हैं, जिनमें सरकारी महकमों के अफसर या बाबू के खिलाफ घोटाले या फिर रिश्वतखोरी की शिकायतें होती हैं। समस्या यह है कि लोकायुक्त पुलिस चाहकर भी जांच नहीं कर पा रही है क्योंकि शिकायत करने वाले का कोई नाम-पता नहीं होता। इन शिकायतकर्ताओं की बस इतनी ही पहचान होती है कि वे शुभचिंतक, देश प्रेमी, राष्ट्र का प्रहरी या फिर व्हिसल ब्लोअर होते हैं। बीते साल में इस तरह की करीब दो हजार शिकायतें गुमनाम चि_ियों के माध्यम से पहुंची हैं। इनमें कुछ शुभचिंतक ऐसे भी हैं, जो लोकायुक्त पुलिस को कामकाज के तरीके भी सिखा रहे हैं। उप लोकायुक्त यूसी माहेश्वरी कहते हैं कि लोकायुक्त पुलिस के पास रोजाना 5 से 7 शिकायतें आती हैं। ऐसी 150 से ज्यादा शिकायतें महीने में आ जाती हैं। जिनमें शुभचिंतक, देशप्रेमी और सजग प्रहरी लिखा होता है। कुछ तो नीति में बदलाव जैसे पत्र लिख देते हैं। कोई ठोस आधार नहीं होने की वजह से शिकायतों को खारिज करना पड़ता है।
एक ने भी नहीं भेजी भ्रष्टों की सूची
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 15 दिन पहले सभी कलेक्टरों व विभिन्न विभाग प्रमुखों को निर्देश दिए कि भ्रष्टों की सूची बनाएं और वह सूची हमें भेजें ताकि उनके खिलाफ कार्रवाई हो सके। लेकिन अभी तक किसी ने सूची नहीं भेजी। आलम यह है की प्रदेश में लोकायुक्त रोजाना एक न एक भ्रष्ट को पकड़ रहा है, लेकिन कलेक्टर और विभागों के प्रमुख उनकी पहचान नहीं कर पा रहे हैं।

सीएम की सख्ती भी बेअसर
दरअसल, मुख्यमंत्री तो भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रूख अपनाएं हैं लेकिन अफसर उनके निर्देश और धमकियों को प्राथमिकता नहीं दे रहे हैं। मुख्यमंत्री अभी तक पांच बार धमकी दे चुके हैं। पहली बार उन्होंने 17 दिसंबर 2016 आईएएस सर्विस मीट में कहा था कि जनता के विरूद्ध काम करने वालों के साथ पूरी कठोरता के साथ पेश आएंगे। किसी प्रकार की दया नहीं होगी। भ्रष्टाचार के विरूद्ध जीरो टॉलरेंस अपनाएं। दूसरी बार 20 अप्रैल 2017 को सिविल सर्विस डे पर अफसरों को नसीहत दी थी कि अफसर जनता को कूड़ा समझते हैं। जनता के लिए कुछ नहीं किया तो आपका जीवन बेकार है। लापरवाही हुई तो सख्त कदम उठाया जाएगा। तीसरी बार 22 जुलाई 2017 को भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में बोले थे कि यदि जिले में अविवादित नामांतरण और राजस्व प्रकरण लंबित मिले तो उल्टा टांग दूंगा। कलेक्टरी करने लायक नहीं छोड़ूंगा। चौथी बार 6 सितंबर 2017 को रातापानी गेस्ट हाउस में मुख्यमंत्री सचिवालय के अकिारियों से बातचीत करते हुए कहा था कि जो अधिकारी काम के प्रति संजीदा नहीं हैं, वे परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहें। पांचवी बार 7 सितंबर 2017 स्वच्छ भारत की कार्यशाला में कहा कि मेरे शब्द भले ही किसी को अच्छे न लगे, लेकिन गड़बड़ी करने वालों को टांग दो। भ्रष्टाचार किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं होगा। लेकिन मुख्यमंत्री के निर्देश और धमकियों का अफसरों पर कोई असर नहीं पड़ रहा है। हर तरफ रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार चरम पर है, लेकिन अभी तक न तो कोई विभाग का प्रमुख और न ही कलेक्टर भ्रष्टों की सूची तैयार कर सका।

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