2,85,000 करोड़ के कर्ज के बाद भी हालात जस के तस: ‘बसपा’ ने उड़ाई  ‘शिव’ राज की नींद

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ब्यूरोक्रेसी की आंकड़ेबाजी ने बिगाड़ा सरकार का गणित

भोपाल (विनोद उपाध्याय)। इतिहास खुद को दोहराता है। इस कहावत का एकदम ताजा उदाहरण यदि देखना चाहते हैं तो मप्र की वर्तमान स्थिति और परिस्थिति पर गौर करना होगा। करीब 14 साल पहले जिस ‘बसपा’ यानी बिजली, सडक़ और पानी की बदहाली को मुद्दा बनाकर भाजपा सत्ता में आई थी, अब वही उसके लिए भी परेशानी का सबब बन गए हैं। पिछले एक दशक में प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी ने आंकड़ेबाजी का ऐसा गुल खिलाया है की अब ‘शिव’ राज की नींद उड़ गई है। आलम यह है की सरकार के तमाम बड़े-बड़े दावों और आंकड़े के बावजूद वर्तमान समय में प्रदेश में बिजली, सडक़ और पानी (पेयजल, सिंचाई)की समस्या विकराल हो गई है। दरअसल, मप्र में सत्तारूढ़ भाजपा मैदानी हकीकत जानने की बजाय अधिकारियों की रिपोर्ट पर विश्वास करती आ रही है। प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी ने सरकार की मंशा भांपते हुए आंकड़ेबाजी करके विकास का ऐसा खाका दिखाया है की सरकार मगन है। लेकिन अल्पवर्षा ने सरकार की आंख खोल दी है। कम बारिश से बिजली और पानी की किल्लत खड़ी हो रही है तो वहीं खराब सडक़ों ने सरकार की नींद उड़ा दी है। आलम ये है कि भाजपा को सत्ता विरोधी माहौल का डर सताने लगा है और विपक्ष विरोध के सुर बुलंद करने लगा है।

127 सीटों पर बिगड़ सकता है गणित
प्रदेश में बिजली, सडक़, पानी की समस्या प्रदेश की करीब 127 सीटों पर जीत का गणित बिगाड़ सकता है। इसमें से जहां 103 सीटें भाजपा के कब्जे में हैं, वहीं 14 सीटें कांग्रेस के पास हैं। ज्ञातव्य है कि 1998 में 83 सीटें जीतने वाली भाजपा ने 2003 में बिजली, सडक़ और पानी की बदहाली का मुद्दा उछालकर 165 सीटें जीतकर 10 साल से शासन कर रही दिग्विजय सिंह सरकार को बाहर का रास्ता दिखाया था। अब करीब 14 साल बाद एक बार फिर से वही स्थिति निर्मित हुई है। भाजपा संगठन का सर्वे बताता है की अगर स्थिति नहीं सुधरी तो 127 विधानसभा सीटों पर गणित बिगड़ सकता है। ऐसे में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने प्रदेश संगठन को जो 200 पार का टारगेट दिया है वह अधर में लटक सकता है। इसको देखते हुए सरकार सचेत हो गई है और स्थिति सुधारने में जुट गई है।
कर्ज का बोझ बनता जा रहा मर्ज
2003 में जब बिजली, सडक़, पानी की दुर्दशा की स्थिति आई थी तब कांग्रेसी सत्ता वाले तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने ध्यान नहीं दिया था, लेकिन भाजपा शासित सरकार के वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्थिति को भांप लिया है और उससे निपटने की तैयारी शुरू कर दी है। इसीलिए राज्य सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक से और दो हजार करोड़ का कर्ज लिया है। इस वित्तीय वर्ष में अब तक पांच हजार करोड़ का कर्ज लिया जा चुका है। आलम यह है कि प्रदेश की भाजपा सरकार पर कर्ज का बोझ बढ़ता ही जा रहा है। सरकार के अब तक के करीब 14 साल के कार्यकाल में कर्ज का आंकड़ा लगभग 2,85,000 करोड़ रूपए पहुंच गया है। सरकार का तर्क है कि कर्ज लेना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इस राशि से प्रदेश की विकासात्मक गतिविधियां संचालित होती हैं लेकिन कर्ज का बोझ बढऩे के बाद भी समस्या जस की तस है। दरअसल, अगले साल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होना है। भाजपा चौथी बार सरकार बनाने के लिए आश्वस्त है। इसे देखते हुए प्रदेश में विकास को लेकर प्रोजेक्ट तैयार किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विजन 2023 तैयार करने के निर्देश दिए हैं। सरकार की मंशा है कि एक साल के भीतर राज्य में सडक़ों का जाल बिछा दिया जाए। कृषि उत्पादन क्षमता बढ़ाने और सिंचाई के साधन पुख्ता करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। सबको पीने का पानी और बिजली उपलब्ध कराने के लिए भी काम चल रहा है। इसलिए विकास की गति बढ़ाने के लिए राज्य सरकार को जल्दी-जल्दी कर्ज लेना पड़ रहा है। राज्य सरकार ने दूसरी बार में जो 2 हजार करोड़ आरबीआई से उठाए हैं। इस राशि से बांधों के निर्माण पर ज्यादा फोकस किया जाएगा। इसके अलावा सडक़ निर्माण, बिजली और अधोसंरचना के कार्य होंगे। सरकार ने वर्ष 2011-12 में 61,532 करोड़ रुपए का कर्ज लिया था। वर्ष 2014-15 में कर्ज बढक़र 94,979.16 करोड़ तक पहुंच गया। वर्ष 2015-16 में कर्ज करीब 1,50,000 करोड़ हो गया। सरकार के अनुसार कर्ज मध्यप्रदेश राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम 2005 के अनुसार सकल राज्य घरेलू उत्पाद के निर्धारित प्रतिशत के अनुसार लिया जाता है। विभिन्न माध्यमों से लिए गए कर्ज को समय-समय पर चुकाया जाता है और इसकी जानकारी वित्त लेखे में दर्ज होती है। राज्य सरकार पर कर्ज का बोझ बढ़ता ही जा रहा है। पिछले चार सालों में यह कर्ज बढक़र 2,85,000 करोड़ से अधिक हो गया है। जबकि वर्ष 2016-17 का राज्य का कर्ज अभी अधिकृत तौर पर उजागर नहीं हुआ है। वहीं केंद्र सरकार से अनुदान की राशि में लगातार इजाफा हुआ है। राज्य की साख है इसलिए केंद्र ने भी अनुदान राशि दो गुना से अधिक कर दिया है।

बिजली दे रही है सरकार को झटका
हालातों पर नजर डालें तो बिजली और कोयले की कमी से बिजली संकट गहराने के आसार बन चुके हैं। ज्यादातर थर्मल पावर प्लांट से क्षमता से कम बिजली उत्पादित हो रही है। यह सुनकर आपको आश्चर्य होगा की देश के कोयला उत्पादन का 28 प्रतिशत उपलब्ध कराने वाले मप्र के ताप विद्युत गृह कोयले की कमी होने के कारण बंदी की कगार पर पहुंच गए हैं। आलम यह है कि संकट से निपटने के लिए कई इकाइयों को बंद कर दिया गया है। एक तरफ मप्र सरकार का दावा है कि 2018 के अंत तक प्रदेश में 20,000 मेगावाट बिजली उत्पादित होने लगेगा, वहीं दूसरी तरफ कोयले की कमी के कारण बिजली उत्पादन प्रभावित हो रहा है। आलम यह है की कई थर्मल पावर प्लांट बंद हैं। साथ ही कम बारिश हाने के कारण डेम भी खाली पड़े है जिससे ज्यादातर हाइडल पावर प्लांट भी बंद हैं। ऐसे में आगामी दिनों में प्रदेश पर ब्लैक आउट का खतरा मंडरा रहा है। हालांकि अभी महंगी बिजली खरीद कर सरकार स्थिति को संभाले हुए है।
कोयला उत्पादन करने में मध्यप्रदेश का देश में पांचवा स्थान है। देश के कोयला उत्पादन का 28 प्रतिशत प्रदेश की धरती से हर साल राष्ट्र को उपलब्ध कराया जाता है। यह मात्रा लगभग 75 मिलियन टन है, लेकिन प्रदेश के बिजली प्लांटों के लिए 17 मिलियन टन कोयला भी प्रदेश को केंद्र सरकार नहीं दे रही है। प्रदेश में बिजली उत्पादन का मुख्य स्रोत कोयला ही है। बिजली प्लांटों के लिए कोयला केंद्र सरकार उपलब्ध कराती है। कोल इंडिया लिमिटेड यह मात्रा तय करती है। प्रदेश के बिजली प्लांटों के लिए केंद्र सरकार ने लगभग 17 मिलियन टन कोयला आपूर्ति का कोटा तय किया है, लेकिन पिछले चार सालों से प्रदेश को लगभग 13-14 मिलियन टन कोयला ही मिल रहा है, लेकिन वर्तमान में प्रदेश के थर्मल पावर प्लांटों को जरूरत का 50 फीसदी ही कोयला मिलने से संकट दिन-ब-दिन गहरा रहा है। संजय गांधी पावर प्लांट की हालात सबसे ज्यादा नाजुक है। यहां कोयले का स्टॉक खत्म हो चुका है। रोजाना सप्लाई हो रहे कोयले से ही इकाईयां चल रही हैं। यहां जिस दिन कोयले की सप्लाई नहीं होगी उसी दिन प्लांट में बिजली बनना बंद होना तय है। बिजली की जरूरत के वक्त कोयले पर ही आस थी लेकिन इसकी कमी ने सरकार का पूरा बिजली मैनेजमेंट ही फेल कर दिया।
मप्र पावर जेनरेटिंग कंपनी को 3200 मेगावाट बिजली पैदा करने के लिए तकरीबन 56 हजार मीट्रिक टन कोयले की जरूरत है। मौजूदा वक्त में 2200 मेगावाट बिजली पैदा हो रही है। इसके लिए करीब 46 हजार मीट्रिक टन कोयला मिलना चाहिए, लेकिन मिल पा रहा है सिर्फ 25 हजार मीट्रिक टन। संजय गांधी पावर प्लांट से 900 मेगावाट बिजली पैदा होती है। जिसमें करीब 15 हजार टन हर दिन कोयला लगता है, लेकिन यहां 48 घंटे से ज्यादा का स्टॉक नहीं जमा हो पा रहा। अमरकंटक पावर प्लांट- 2900 टन रोजाना कोयले की खपत है और रोजाना इतना ही कोयला पहुंच पा रहा है। श्री सिंगाजी पावर प्लांट-660 मेगावाट की एक यूनिट ही चल रही है। इसमें 1.5 लाख टन कोयले की खपत। 80 हजार टन कोयला ही मिल पा रहा है। सारणी पावर प्लांट- 9 हजार टन हर दिन कोयले की खपत है।
नवंबर से रबी सीजन में बिजली की डिमांड बढ़ जाएगी। दिवाली के बाद ही किसान सिंचाई के लिए बिजली लेंगे। प्रदेश में डिमांड 12 हजार मेगावाट के पार पहुंचने का अनुमान है। ऐसे वक्त में बिजली उपलब्ध कराना चुनौती से कम नहीं होगा। मप्र पावर जेनरेटिंग कंपनी के एमडी एपी भैरवे कहते हैं कि कोयले की कमी पावर प्लांट में बनी हुई है। डिमांड भी बढ़ी है। ज्यादातर यूनिट ओवरहॉलिंग में होती है। हमारे पास थोड़ा ही स्टॉक कोयले का बचा है। इन हालातों को देखते हुए ऊर्जा मंत्री पारस जैन ने कोयला आपूर्ति को लेकर केंद्र सरकार से अतिरिक्त डिमांड की है।
इधर, अप्रैल 2018 में बिजली कंपनी दाम बढ़ाकर जनता को बड़ा झटका देने के लिए जमीन तैयार करने में जुट गई है। मौजूदा नुकसान के आंकलन में भले ही वक्त लगे, लेकिन तीन साल पुराने घाटे की भरपाई कंपनी बिजली के दाम बढ़ाकर करना चाहती है। डिमांड भी दो-चार सौ करोड़ नहीं बल्कि पूरे 14 हजार करोड़ की। कंपनी एक माह में यह प्रस्ताव आयोग के पास भेजेगी। आयोग की मंजूरी मिली तो बिजली कंपनी दाम बढ़ाकर इसे जनता से वसूलेगी। 2016 में मप्र पॉवर मैनेजमेंट कंपनी ने ट्रू-अप पिटीशन के जरिए करीब 9 हजार करोड़ रुपए की मांग मप्र विद्युत नियामक आयोग से की थी। कंपनी ने दावा किया कि उसे साल 2013-14 में बिजली बेचने से नुकसान हुआ। जिसकी भरपाई होनी चाहिए। कंपनी की याचिका पर दावे-आपत्ति भी लगी। आयोग की ओर से उस पर कोई फैसला नहीं जारी हुआ। 9 हजार करोड़ रुपये के नुकसान पर फैसला आने से पहले ही कंपनी ने 2015 के नुकसान के आंकलन का हिसाब-किताब तैयार कर लिया है। ये भी तकरीबन 5 हजार करोड़ रुपए है।

27,000 करोड़ की सडक़ें बदहाल
मप्र में भाजपा लगातार चौथी बार सरकार बनाने के लिए ख्याली पुलाव बना रही है, लेकिन उसके इस पुलाव में करीब 14 साल बाद बदहाल सडक़ों ने कड़वाहट घोल दी है। 2003 में जिन बदहाल सडक़ों को मुद्दा बनाकर भाजपा ने जनता को अपने पक्ष में किया था अब वही सडक़ें उसको कटघरे में खड़ा कर रही हैं। सरकारी दावे के अनुसार प्रदेश सरकार ने वर्ष 2005-06 से वर्ष 2016-17 के मध्य योजना मद में सडक़ निर्माण और उन्नयन पर लगभग 27 हजार 412 करोड़ रूपए खर्च किए गए हैं, लेकिन आज भी सडक़ें जर्जर हैं जो रोज दुर्घटना को अंजाम दे रही हैं। दरअसल, मध्यप्रदेश सरकार ने पिछले 12 सालों में सडक़ों का जो जाल बिछाया है वही उसके लिए घातक सिद्ध हो रहा है। प्रदेश में सडक़ों का जाल बिछाने के लिए जिस तरह गुणवत्ता को दरकिनार किया गया है उसी का परिणाम है कि आज नेशनल हाईवे, स्टेट हाईवे और अन्य सडक़ें बदहाल हैं। प्रदेश में पांच हजार किलोमीटर नेशनल हाईवे है और पांच हजार किलोमीटर और का प्रस्ताव है, वहीं स्टेट हाईवे 20 हजार किलोमीटर है जबकि शहरी और ग्रामीण सडक़ों की लंबाई 70 हजार किलोमीटर है। सरकार ने सडक़ों का जाल तो बिछा दिया, लेकिन गुणवत्ताहीन निर्माण के कारण सडक़ें पहले साल में ही खराब होनी शुरू हुई जो आज जर्जर अवस्था में पहुंच गई हैं।
हर मामले में अव्वल रहने की प्रदेश सरकार की परंपरा का निर्वहन करते हुए लोक निर्माण विभाग, मप्र ग्रामीण सडक़ विकास प्राधिकरण, ग्रामीण यांत्रिकी विभाग ने प्रदेश में गुणत्ताहीन सडक़ों का ऐसा जाल बुन दिया है कि वह सरकार के लिए जी का जंजाल बन गया है। आलम यह है कि लोक निर्माण विभाग द्वारा बनाई गई 63,637 किमी सडक़ के अलावा मप्र ग्रामीण सडक़ विकास प्राधिकरण द्वारा बनाई गई 15,200 सडक़ों का हाल बदहाल है। इस बदहाली की वजह है सडक़ निर्माण में भ्रष्टाचार। मप्र में सडक़ों के निर्माण में गुणवत्ता के मापदंडों का पालन नहीं होता है। यह सब निर्माण एजेंसियों के अधिकारियों और इंजीनियरों की मिलीभगत से ठेकेदार करते हैं। इससे प्रदेश में अधिकांश सडक़ें दो माह में ही खराब होने लगती हैं। प्रदेश में सडक़ों की बदहाली की तस्वीर यह है कि शहर और गांवों की करीब 4,000 किमी सडक़ खराब होने के साथ ही 1600 किमी नेशनल और स्टेट हाईवे की सडक़ें खराब हैं। लोनिवि के प्रमुख सचिव प्रमोद अग्रवाल कहते हैं कि प्रदेश में सबसे अधिक सडक़ें भारी वाहनों के परिवहन से खराब हो रही है। सडक़ों की गुणवत्ता को लेकर निरंतर समीक्षा की जा रही है। खराब सडक़ निर्माण करने वालों के खिलाफ कार्रवाई भी हो रही है।
सडक़ पर अपनों की राजनीति
मध्य प्रदेश में खराब सडक़ों की स्थिति का आंकलन इसी से लगाया जा सकता है कि खुद मंत्री भी सडक़ों की बदहाली से परेशान हैं। प्रदेश की लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी, एवं जेल मंत्री कुसुम मेहदेले का जर्जर सडक़ों को लेकर दर्द फूट पड़ा है। मंत्री कुसुम मेहदेले ने पन्ना से सतना, खजुराहो से सतना सडक़ की दुर्दशा को लेकर केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी से गुहार लगाई है। मेहदेले ने ट्वीट कर नितिन गडकरी को जर्जर सडक़ों की हालत और उससे हो रही समस्याओं से अवगत कराया है। उल्लेखनीय है कि एक तरफ प्रदेश सरकार राज्य की सडक़ों को सबसे बेहतर सडक़ें मानने का दावा करती है। ऐसी परिस्थिति में मंत्री मेहदेले ने खुद ही सरकार के दावों की पोल खोल दी। उधर दूसरी तरफ लोक निर्माण मंत्री रामपाल सिंह गैर जिम्मेदाराना बयान देते हुए कहते हैं कि लोगों को कांग्रेस काल की याद बनी रहे इसलिए खराब सडक़ों को सुधारा नहीं गया है। कांग्रेस काल में सडक़ों की बदहाली का उदाहरण सरकार देती रही है, लेकिन भाजपा राज में भी सडक़ों की दुर्दशा किसी से छुपी नहीं है बल्कि सरकार के ही लोग इसकी शिकायत कर रहे हैं।
7,000 किमी सडक़ों का होगा डामरीकरण
घटिया सडक़ों के निर्माण के चलते प्रदेश में अधिकांश सडकें बेहद खराब हालात में पहुंच गई हैं। अगले साल विधानसभा के आम चुनाव होने हैं ऐसे में सडक़ों के खराब हाल के चलते लोगों की नाराजगी राज्य सरकार को लेकर बढ़ती ही जा रही है। इसे देखते हुए सरकार ने अगले एक साल में 7,000 किलोमीटर सडकें चमकाने की योजना पर काम शुरु कर दिया है। यह काम मप्र ग्रामीण सडक़ विकास प्राधिकरण द्वारा किया जा रहा है। इन सडक़ों का निर्माण मुख्यमंत्री ग्राम सडक़ योजना के तहत किया जा रहा है। प्राधिकरण ने इसके लिए तीन हजार करोड़ रुपयों का ऋण लिया है। विश्व बैंक ने ऋण जारी कर दिया है। बारिश और जीएसटी के कारण सडक़ों का काम बीते दो माह से रुका हुआ था। विभाग ने जीएसटी के चलते आ रही दिक्कतों को दूर कर लिया है। जीरो टैक्स पर सडक़ें बनाई जा रही है। सडक़ निर्माण के बाद ठेकेदार को जीएसटी अलग से देना होगा। वहीं प्रधानमंत्री ग्राम सडक़ योजना के तहत प्रदेश को 2 हजार किलोमीटर से ज्यादा नई सडक़ें स्वीकृत हुई है। केंद्रीय ग्रामीण विकास विभाग की मदद से ये सडकें प्रदेश में बनाई जाएगी। प्रधानमंत्री ग्राम सडक़ योजना के तहत 11 से ज्यादा जिलों में 10 नई लंबी लंबी सडक़े बनाई जा रही है। इसके टेंडर जारी कर दिए गए है। सडक़ और ब्रिज बनाने पर सौ करोड़ से अधिक की लागत आएगी।

३२ जिले सूखे की कगार पर
कम बारिश के कारण प्रदेश के 32 जिले सूखे के कागार पर पहुंच गए हैं। प्रदेश के प्रमुख तालाब और डेम खाली हैं। कई जिलों में पानी की किल्लत बरकरार है। कम बारिश से सोयाबीन और धान की फसलें हुई प्रभावित हुईं हैं। साथ ही पीने के पानी की किल्लत बढऩे के आसार बढ़ गए हैं। सरकार ने सूखा प्रभावित इलाकों में शार्ट टर्म प्लान बनाने के निर्देश दिए हैं। इसके अलावा जल की बर्बादी रोकने के के निर्देश भी दिए हैं, जो इस बात का संकेत है कि प्रदेश सरकार पेयजल और सिंचाई की व्यवस्था के जो दावे करती आ रही है वे सिर्फ कागजी हैं। आपको विश्वास नहीं होगा लेकिन यह हकीकत है कि पिछले एक दशक में मप्र सरकार ने करीब 24,000 करोड़ रूपए लोगों की प्यास बुझाने वाली पेयजल योजनाओं पर स्वाहा कर दिया है, लेकिन गर्मियों में हर साल यहां की आधी से अधिक आबादी बूंद-बूंद पानी के लिए तरसती रहती है। दरअसल, खरबों रूपए खर्च करने के बाद भी पेयजल योजनाएं प्यासी हैं। बीते 12 वर्ष की उपलब्धियों की चर्चा की जाए तो इस अवधि में 7 वृहद, 12 मध्यम और 1618 लद्यु योजनाएं पूरी की गई हैं। चम्बल मुख्य नहर प्रणाली विश्व बैंक की सहायता से किए गए लाईनिंग वर्क से इस वर्ष सिंचाई क्षमता 3 लाख 5 हजार हेक्टेयर हो गई है। बाण सागर परियोजना से 1 लाख 60 हजार हेक्टेयर और धार, झाबुआ जैसे आदिवासी बहुल इलाकों में माही परियोजना से 20 हजार हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में सिंचाई हो रही हैं। वास्तविक सिंचाई का प्रतिशत नहरों के विस्तारीकरण, संधारण और जल वितरण के अच्छे प्रबंधन से 37 से बढक़र 80 प्रतिशत हो गया है। इन सब दावों के बावजूद प्रदेश में खेती-किसानी मानसून के भरोसे है।
अब प्रदेश में एक बार फिर से जलसंकट की आहट सुनाई दे रही है। ऐसे में सरकार और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग को अपनी योजनाओं के क्रियान्वयन की चिंता सताने लगी है। यही नहीं सरकार ने प्रदेश के 51 जिलों में पेयजल के लिए 2017-18 के बजट में 2,493 करोड़ रुपए का प्रावधान भी किया है। लेकिन हर बार की तरह इस बार भी प्यास लगने पर कुंआ खोदने की मप्र सरकार की नीति लोगों की प्यास बुझा पाएगी इसमें संदेह है।
प्रदेश में हर घर तक सरकार की हर योजना का लाभ पहुंचाने का कागजी खाका तैयार किया गया है। सरकार का दावा है कि प्रदेश की सभी 22,825 ग्राम पंचायतों और 54,904 गांवों में पेयजल की व्यवस्था कर दी गई है लेकिन हकीकत कुछ और है। योजनाएं भले ही लोक कल्याण के लिए बनाई गई हैं लेकिन उनका बेहतर क्रियान्वयन न होने के कारण लोगों को लाभ नहीं मिल पा रहा है। योजनाएं या तो कागजों में ही तैयार कर दी गई हैं या फिर बजट का अभाव बताकर बीच में ही रोक दी गई हैं। आलम यह है की करोड़ों रुपये बर्बाद होने के बाद भी जनता को लाभ नहीं मिल रहा है। स्थिति कुछ ऐसी है कि प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी नलजल योजना के नाम सुनते ही पंचायतों में लोगों का गुस्सा फूटने लगता है। 8 साल पहले शुरू की गई योजना आज भी अंतिम छोर तक नहीं पहुंच पाई है। योजना के नाम पर हर साल लोगों को झुनझुना पकड़ाया जाता है, लेकिन गर्मी में न अधिकारी नजर आते हैं और न ही माननीय। पंचायत ग्रामीण विकास विभाग को पंचायतों ने जो आंकड़े भेजे हैं उसके मुताबिक 8 हजार पंचायतों में आज तक यह योजना नहीं पहुंची है, जबकि प्रदेश की 22,825 ग्राम पंचायतों में 14 हजार पंचायतों में योजना पहुंची तो है, किंतु वहां भी स्थिति बुरी है।
आंकड़ों की बाजीगरी
मप्र की साढ़े सात करोड़ आबादी की प्यास बुझाने के लिए हर साल आंकड़ों की ऐसी बाजीगरी की जाती है जिससे ऐसा लगता है प्रदेश में जलधारा बह रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 15,270 नलजल योजनाएं स्थापित हैं। प्रदेश में 5,23,247 हैंडपंप हैं लेकिन सरकारी दावे ऐसे हैं जैसे लगता है सरकार ने हर घर को पानी मुहैया करा दिया है। मध्यप्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग द्वारा पेयजल आपूर्ति के लिए विभिन्न योजनाएं क्रियान्वित की जा रही हैं। विभाग का दावा है कि ग्रामीण क्षेत्रों की कुल एक लाख 27 हजार 552 बसाहट में से एक लाख 7 हजार 708 बसाहट में 55 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन के मान से पेयजल की व्यवस्था की जा चुकी है। शेष 19 हजार 844 बसाहट में 40 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन के मान से पीने के पानी के सप्लाई की व्यवस्था की गई है, जिसे बढ़ाकर 55 लीटर के मान से किए जाने के प्रयास हो रहे हैं। प्रदेश के ग्रामीण बसाहटों में पिछले 11 साल के दौरान लगभग 2 लाख 11 हजार हैंडपम्प स्थापित कर पेयजल उपलब्ध करवाया गया है। इसी तरह लगभग 53 हजार ग्रामीण शाला में भी पीने के पानी के इंतजाम किए गए हैं। साल 2005 में 6,694 नल-जल योजना वाले बड़े ग्रामों में अब 15 हजार 129 योजनाएं चल रही हैं। पिछले 12 साल में लगभग 8,435 नल-जल योजना के कार्य पूरे किए गए हैं। सरकार के इन तमाम दावों के बावजुद इस बार मानसून ने मुंह क्या मोड़ा सरकार के तोते उड़ गए हैं।
मप्र में यहां की आबादी को पेयजल मुहैया कराने के लिए सरकार कितनी संवेदनशील है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पेयजल सुविधाएं उपलब्ध कराने में मप्र देश में केवल छत्तीसगढ़, उड़ीसा, असम, झारखंड और बिहार से ही आगे है। यानी मप्र से नीचे से छठवें स्थान पर है। दरअसल, प्रदेश सरकार ने लोगों की प्यास बुझाने के लिए जितनी योजनाएं-परियोजनाएं शुरू कर रखी हैं वे भ्रष्टाचार के कारण अधर में लटकी हुई हैं। सरकार ने वर्ष 2016-17 में राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के तहत आंशिक पूर्ण 5500 बसाहटों में जल प्रदाय व्यवस्था के लिए 6288.12 लाख रूपए का लक्ष्य रखा था लेकिन जनवरी 2017 तक 6211.62 लाख रूपए खर्च कर 5072 बसाहटों में जलप्रदाय की व्यवस्था हो सकी। इसी तरह 650 ग्रामीण शालाओं के लिए 813.53 लाख रूपए का प्रावधान किया गया था, लेकिन इस राशि से 629 शालाओं में जलप्रदाय की व्यवस्था हो पाई। 400 ग्रामीण नलजल प्रदाय योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए 10979.41 लाख रूपए का बजट मंजूर किया गया था, लेकिन 10928.64 लाख रूपए खर्च कर 371 योजनाओं का क्रियान्वयन हो सका। प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में हैंडपंपों की मरम्मत के लिए 2369.58 लाख रूपए का लक्ष्य रखा गया था लेकिन 2966.96 लाख रूपए खर्च कर दिए गए। पाईप वाटर सप्लाई योजनाओं की मरम्मत के लिए 2028.19 लाख रूपए का प्रावधान था लेकिन 2379.19 लाख रूपए खर्च कर दिए गए। इन कार्यो के सहित अन्य कार्यों पर जनवरी 2017 तक कुल 29,259.86 लाख रूपए खर्च किए गए। लेकिन इसके बावजुद प्रदेश के अधिकांश क्षेत्रों में नलजल योजनाएं अधर में हैं। इसके अलावा मप्र राज्य ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के तहत 900 करोड़ रूपए खर्च किए गए, लेकिन प्रदेश में जलसंकट दूर होने का नाम नहीं ले रहा।
भ्रष्टाचार में अटकी नलजल योजनाएं
प्रदेश में नलजल योजनाओं के पिछड़ेपन और फेल होने का प्रमुख कारण है भ्रष्टाचार। पीएचई के सूत्रों का दावा है कि करीब 70 फीसदी योजनाएं भ्रष्टाचार की जद में हैं। लेकिन न विभाग और न ही सरकार भ्रष्टाचार को लेकर संवेदनशील है। सबसे अधिक भ्रष्टाचार बुंदेलखंड में हुआ है। केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार ने मप्र में बंदुेलखंड क्षेत्र 6 जिलों के विकास के लिए 3700 करोड़ रुपए का विशेष पैकेज दिया था, जिसके तहत 9 विभागों द्वारा अलग-अलग विकास कार्य कराए। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकीय विभाग द्वारा 6 जिलों में 100 करोड़ की लागत से 1287 नलजल योजनाएं तैयार की। इनमें से 997 योजनाएं शुरू ही नहीं हो पाईं। अब मप्र जल निगम द्वारा निमाड़ क्षेत्र के नीमच, रतलाम और मंदसौर जिले के 1700 गांवों में नलों से पेयजल उपलब्ध कराने की योजना बनाई। योजना पर काम शुरू करने के लिए निगम द्वारा जायका से कर्ज लेने की कोशिश की जा रही है। गांधी सागर बांध से तीनों जिलों के 1700 गांवों में नलों के जरिए पेजयल आपूर्ति करने की रूपरेखा बन चुकी है। निगम के पास योजनाओं को पूरा करने के लिए बजट नहीं है। ऐसे में राज्य सरकार के सहयोग से जायका से कर्ज लेने की कोशिश जारी है। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकीय विभाग के प्रमुख सचिव मनोज गोहिल ने बताया कि जायका की टीम तीनों जिलों के एक दर्जन से ज्यादा गांवों का दौरा कर लिया है।

सिंचाई के लिए नहीं मिलेगा पानी
प्रदेश में सूखे के हालात बनता देख जल संसाधन विभाग ने तालाबों और नहरों से सिंचाई के लिए पानी लेने पर रोक लगाने को कहा है। विभाग ने सभी जिलों के कलेक्टर और संभाग आयुक्तों को पत्र जारी करते हुए कहा है कि जल उपभोक्ता संस्थाओं की बैठकें करके पानी को लेकर प्लान बनाएं। जल संसाधन विभाग का निर्देश है कि जल स्त्रोतों में पहले पीने का पानी आरक्षित करें, इसके बाद ही सिंचाई के लिए पानी दें। यह भी कहा गया है कि प्रदेश के सभी स्टाप डेम और बेराज बंद कर दिए जाएं ताकि पानी संग्रहित हो और इस पानी से किसानों को सिंचाई की सुविधा मिल सके। अवर्षा की स्थिति बनने से सबसे ज्यादा संकट ग्वालियर और चंबल संभागों में हैं। राज्य सरकार ने ग्वालियर में पेयजल की व्यवस्था करने 20 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। इस राशि से पानी परिवहन किया जाएगा। गुना, शिवपुरी, श्योपुर, भिंड और मुरैना सहित बुंदेलखंड इलाके में सूखे की आहट है। अशोकनगर शहर की प्यास बुझाने वाला अमाही जलाशय में मात्र 10 फीट पानी है। इस जलाशय से लोगों को 5 माह का पानी मिल पाएगा। लिहाजा जल संसाधन विभाग ने अमाही जलाशय से खेती को दिए जाने वाले पानी पर प्रतिबंध लगा दिया है।

भारत सरकार ने घटाया पेयजल का बजट
केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद राज्यों को पेयजल एवं स्वच्छता के लिए मिलने वाले बजट में कटौती की गई है। पहले मप्र को पेजयल के लिए 500 करोड़ का बजट मिलता था। इतना ही राज्य का शेयर होता था लेकिन केंद्र सरकार ने इसे घटकार 200 करोड़ कर दिया है। ऐसे में राज्य ने भी अपना शेयर घटा दिया है। ऐसे में बजट घटने से पीएचई को ग्रामीण क्षेत्र में नलों के जरिए पेयजल की उपलब्धता बढ़ाने में कठिनाई आ रही है जिसका विपरीत असर प्रधानमंत्री मोदी के खुले मे ंशौच से मुक्ति अभियान पर भी पड़ रहा है। क्योंकि पानी के अभाव में ग्रामीण क्षेत्र में लोग शौचालय का उपयोग नहीं करते हैं। विभागीय जानकारी के अनुसार वर्तमान में प्रदेश की 17 फासदी ग्रामीण आबादी को नलों के जरिए पानी मिल रहा है।
प्रदेश में मानसून जमकर नहीं बरसने से मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। पूरे प्रदेश का 62 प्रतिशत हिस्सा कम बारिश की चपेट में है। प्रदेश में मानसूनी बादलों ने औसत से भी 25 प्रतिशत कम पानी बरसाया है। 32 जिले ऐसे हैं, जहां बारिश 80 प्रतिशत से कम हुई है। 19 जिलों में भी हालात बहुत अच्छे नहीं हैं, क्योंकि यहां भी बारिश औसत से कम ही है। पूरे अगस्त में औसत से 52-55 प्रतिशत कम पानी बरसा है। ऐसे में भरपाई मुश्किल नजर आ रही है। अधिकांश जिलों को औसत से 65-70 प्रतिशत बारिश पर ही संतोष करना पड़ेगा। इसका प्रभाव यह होगा कि आगामी सीजन की फसल के लिए सिंचाई और पेयजल का संकट आ सकता है। मौसम वैज्ञानिकों की मानें तो अगस्त में मानसून का पैटर्न गड़बड़ाने से यह स्थिति बनी है। बारिश का आंकड़ा इंच में जरूर कहीं-कहीं पूर्ति बता रहा है, लेकिन बारिश इस तरह नहीं हुई कि स्थानीय जल स्रोतों में पानी लबालब हो सके।
आंकड़े कर रहे अलर्ट
प्रदेश की जीवनधारा नर्मदा नदी का जल स्तर भी सामान्य है। 51 जिलों में 32 ऐसे हैं, जिनमें औसत से 25 से 44 फीसदी कम पानी गिरा है। 19 जिले सामान्य की श्रेणी में, शेष 20 फीसदी या इससे कम की श्रेणी में है। कम बारिश के कारण बने सूखे के हालात बन रहे हैं। प्रमुख तालाब और डेम खाली हैं। कई जिलों में पानी की किल्लत बरकरार है। कम बारिश से सोयाबीन और धान की फसलें प्रभावित हुईं हैं। साथ ही पीने के पानी की किल्लत बढऩे के आसार बढ़ गए हैं। सरकार ने सूखा प्रभावित इलाकों में शार्ट टर्म प्लान बनाने के निर्देश दिए हैं। इसके अलावा जल की बर्बादी रोकने के निर्देश भी दिए हैं। दरअसल सरकार मामले की गंभीरता को समझ तो रही है, लेकिन हालात के आगे बेबस है। बारिश नहीं होने की वजह से न केवल पानी का संकट गहराता जा रहा है बल्कि नदियों में पानी नहीं होने के कारण बिजली उत्पादन भी बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। एक तरफ जहां खेतों में फसलों का हाल देखकर किसान बेहाल है तो वहीं दूसरी तरफ सरकार सूखे से निपटने की कार्ययोजना बनाने पर जुट गई है। इन सबके बीच आपदा पीडि़त किसानों की मौजूदा हालत कई सवाल भी खड़े कर रही है। सवाल ये कि पहले की आपदाओं से निपटने में नाकाम सरकार कैसे पहुंचाएंगे किसानों तक राहत।
कैसे होगी रबी की सिंचाई
प्रदेश से मानसून विदा होने की स्थिति में आ गया है, लेकिन बांधों का मौजूदा जलस्तर राज्य में भयाभय सूखे और पेयजल संकट के संकेत दे रहा है। प्रदेश के 19 प्रमुखों बांधों में से 4 बांधों को छोड़ दिया जाए तो कोई भी बांध 40 फीसदी से ज्यादा नहीं भरा है। यही स्थिति मध्यम एवं छोटे बांधों की है। ऐसे में 40 लाख हेक्टेयर में सिंचाई का दावा करने वाला जल संसाधन विभाग इस बार रबी फसलों के लिए एक बार से ज्यादा पानी देने की स्थिति में नहीं है। खरीफ फसलें सूखनें लगी हैं और धान के लिए पानी की मांग आने लगी है। सरकार हर बार की तरह भगवान पर ठीकरा फोडऩे की तैयारी में है। पेयजल संकट की संभावना के चलते कलेक्टरों ने जल स्रोतों पर रोक लगा दी है।
जल संसाधन विभाग के अनुसार पिछले साल सभी बांध औसतन 98 फीसदी भरे थे लेकिन इस बार औसतन 40 फीसदी भरे हैं। पिछले साल 19 बड़े, 85 मध्यम एवं 4800 छोटे बांधों से 28.90 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की गई थी, लेकिन इस बार विभाग 7 लाख हेक्टेयर क्षेत्र से सिर्फ एक बार से ज्यादा पानी देने की स्थिति में नहीं है। जल संसाधन विभाग के प्रमुख अभियंता राजीव कुमार सुकलीकर कहते हैं कि बांधों की स्थिति चिंताजनक है। विभाग चुनिंदा बांधों से ही सिंचाई के लिए सिर्फ एक पानी देने की स्थिति में है। कई बांधों से पीने का पानी दिया जाता है। उसको भी ध्यान में रखना है।

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