80 माननीयों की होगी राजनीति से विदाई!

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मप्र के 7 सांसदों और 73 विधायकों पर दर्ज है केस, देशभर के 1581 दागी सांसदों और विधायकों पर लटकी तलवार

 

भोपाल (विनोद उपाध्याय)। सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के रूख को देखकर ऐसा लगता है नवंबर 2018 में होने वाले विधानसभा चुनाव में दागी नेताओं को टिकट नहीं मिलेगा। यही नहीं प्रदेश के करीब 80 माननीयों (7 सांसद और 73 विधायक)की राजनीतिक विदाई हो जाएगी। यही नहीं आने वाले समय में देशभर के 1581 सांसद और विधायक राजनीति से दूर हो जाएंगे। दरअसल, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दागी जनप्रतिनिधियों के खिलाफ चल रहे मामलों के निपटारे के लिए 12 विशेष अदालतों के गठन पर सहमति जताई। ऐसे में संभावना जताई जा रही है की अधिकांश माननीयों पर राजनीति प्रतिबंध लग सकता है।

 
उल्लेखनीय है कि सभी राजनीतिक दल राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण को लेकर चिंता तो जताते हैं लेकिन इसके लिए जरूरी कदम नहीं उठाते। देर से ही सही लेकिन केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दागी जनप्रतिनिधियों के खिलाफ चल रहे मामलों के निपटारे के लिए 12 विशेष अदालतों के गठन पर सहमति जताई, इससे दागी सांसद-विधायकों की राजनीति से विदाई की एक उम्मीद तो नजर आई। तीन साल पहले के आंकड़ों के अनुसार देश में 1581 सांसदों और विधायकों के खिलाफ संगीन अपराधों में साढ़े तेरह हजार मामले दर्ज हैं। इनमें मप्र के 80 माननीय(7 सांसद और 73 विधायक) भी शामिल हैं, जिन पर 151 केस दर्ज हैं। यही हाल जिला प्रमुख और सरपंचों को लेकर हैं। मप्र में 2013 के विधानसभा चुनाव में 32 फीसदी आपराधिक पृष्ठ भूमि के प्रत्याशी चुनाव जीते है।
सभी पार्टियों में दागियों की भरमार
भारतीय लोकतंत्र में एक तथ्य यह देखा जा रहा है दागियों और अपराधियों के जीत की संभावना सबसे अधिक होती है। इसलिए सभी पार्टियां ऐसे नेताओं को टिकट देने परहेज नहीं करती हैं। यहां सवाल कानूनी प्रक्रिया से अधिक मंशा का है। सभी राजनीतिक दल राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण को लेकर चिंता तो जताते हैं लेकिन इसके लिए जरूरी कदम नहीं उठाते। हर राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए अपराधी छवि वाले प्रत्याशियों को टिकट देने से परहेज नहीं करता। राजनीतिक दल अगर ठान लें तो कोई कारण नहीं कि अपराधी छवि के लोग संसद और विधानसभाओं की दहलीज लांघ सकें। इसके लिए कुछ खास करने की जरूरत नहीं। जरूरत है तो अपराधी छवि के लोगों को टिकट देने से बचने की है। दागी जनप्रतिनिधियों ने देश की राजनीतिक छवि को धूमिल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। दागी राजनेताओं के खिलाफ चल रहे आपराधिक मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें तो बनें ही लेकिन ऐसे तत्वों को हाशिए पर पहुंचाने की जिम्मेदारी भी बड़े नेताओं को ही उठानी होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने नेताओं के खिलाफ चलने वाले मुकदमों के लिए विशेष अदालतें गठित करके 1 मार्च 2018 से सुनवाई शुरू करने का निर्देश दिया है। लंबित मुकदमों की जानकारी देने के लिए कोर्ट ने सरकार को दो महीने का समय दिया है। कोर्ट के निर्देश पर सरकार की ओर से दिए गए प्लान के मुताबिक सांसदों के मुकदमों के निपटारे के लिए 2 विशेष अदालतें गठित की जा सकती हैं। इसके अलावा बिहार, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में एक-एक अदालत गठित करने का प्रस्ताव है। इससे उम्मीद जगी है की राजनीति का शुद्धिकरण हो सकता है।

दावों पर दागी भारी
स्वच्छ और ईमानदार राजनीति के बड़े-बड़े दावों व जांच-परख कर प्रत्याशियों के चुनने के राजनीतिक दलों के वादों के बावजूद 2013 में मप्र विधानसभा चुनाव में जीत कर पहुंचे 32 फीसदी विधायक दागी हैं। सबसे ज्यादा दागदार दामन 38 प्रतिशत कांग्रेस विधायकों का है। यही आंकड़ा भाजपा में 29 फीसदी और बसपा के 4 में से 1 विधायक मतलब 25 प्रतिशत है। चिंताजनक ये है कि वर्ष 2008 के विधानसभा चुनाव में जीते दागी प्रत्याशियों की तुलना में 2013 में 6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। 2008 में इनका प्रतिशत 26 था। मप्र इलेक्शन वॉच और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स (एडीआर) की रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव में जीते 230 विधायकों में से 73 पर आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं।
…तो दोगुनी होती दागदारों की संख्या
आपराधिक पृष्ठभूमि वाले 73 विधायकों में से 45 विधायक ऐसे हैं, जिन्होंने अपने शपथ-पत्र में अपने खिलाफ अपहरण, डकैती, महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे गंभीर मामलों की जानकारी दी। मप्र विधानसभा में आपराधिक पृष्ठभूमि के विधायकों की संख्या दोगुनी से अधिक होती, क्योंकि भाजपा, कांग्रेस और बसपा के जो 120 प्रत्याशी चुनाव हारे थे उनमें से 77 प्रत्याशी ऐसे थे, जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इधर, इसी श्रेणी के 65 विधायकों के शपथ-पत्रों के विश्लेषण से पता चला कि इसमें से 20 ऐसे विधायक हैं, जिन्होंने 2013 चुनावों में अपने शपथ-पत्रों में आपराधिक मामलों का खुलासा किया है।

…तो 13 साल नहीं  लड़ पाएंगे चुनाव
सुप्रीम कोर्ट से दागी सांसदों और विधायकोंं के मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों के गठन की सलाह मिलने के बाद मोदी सरकार अब जनप्रतिनिधित्व कानून में बड़ा संशोधन करने की तैयारी कर रही है। इसके तहत जिन नेताओं पर गंभीर आरोप लगे हैं, उन्हें 13 साल तक चुनावी राजनीति से दूर किया जा सकेगा। जनप्रतिनिधित्व कानून में प्रस्तावित संशोधन के अनुसार, यदि जनप्रतिनिधि के खिलाफ किसी भी आपराधिक मामले में चार्जशीट पेश हो चुकी हो और उसमें कम से कम 7 साल की कैद का प्रावधान हो, तो वह खुद-ब-खुद अपात्र घोषित हो जाएगा। अगर केस का ट्रायल पेंडिंग हो या सजा के बाद अपील की गई हो, तो भी नेता को अपात्र ही माना जाएगा। कानून मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, संशोधन बिल का ड्राफ्ट तैयार है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अनुमति मिलने के बाद इसे आगामी शीत सत्र में संसद में पेश किया जाएगा। हालांकि, सूत्रों का कहना है कि कानून मंत्रालय ने प्रस्तावित संशोधन विधेयक में स्पष्ट किया है कि यदि उम्मीदवार के खिलाफ चुनाव की अधिसूचना जारी होने से 180 दिन पहले चार्जशीट पेश की गई हो, तो ही उसे अयोग्य घोषित किया जा सकेगा। साथ ही सरकार ने लॉ कमीशन द्वारा दागियों को राजनीति से दूर करने और जनप्रतिनिधित्व कानून में सुझाई गई अनुशंसाओं को भी संशोधन विधेयक में शामिल किया है। संशोधन बिल के ड्राफ्ट में कमीशन के सुझावों को भी शामिल किया गया है। इसके अलावा प्रस्तावित संशोधन विधेयक में पहली बार गलत शपथपत्र देने को भी शामिल किया गया है। प्रस्ताव के मुताबिक, ऐसा करने पर उम्मीदवार को उस सीट से भी चुनाव लडऩे पर पाबंदी होगी। साथ ही उसे अगले 6 साल तक किसी भी चुनाव लडऩे से अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा। गलत शपथपत्र देने की स्थिति में कानून मंत्रालय कम से कम 6 माह और ज्यादा से ज्यादा 3 साल की सजा का प्रावधान भी प्रस्तावित कर रहा है। समस्या है कि ऐसे मामलों में राजनीतिक दलों में आमतौर पर कोई सहमति नहीं बन पाती, क्योंकि यह सांसदों के वेतन-भत्ते और सुविधाएं बढ़ाने का मामला तो है नहीं! उस पर तो आम सहमति कायम होने में कभी कोई देर नहीं होती। इसी आम सहमति के चक्कर में राजग सरकार को 2002 में फजीहत झेलनी पड़ी थी। क्या राजग सरकार मौजूदा मामले में भी उसकी पुनरावृत्ति चाहती है? पता नहीं। याद रहे कि सुप्रीम कोर्ट ने 2002 में सख्त आदेश देकर केंद्र सरकार के उस निर्णय को बदल दिया था जिसके तहत केंद्र सरकार ने उम्मीदवारों के बारे में निजी सूचनाएं देने की पहले मनाही कर दी थी। उम्मीदवारों के लिए शैक्षणिक योग्यता, आपराधिक मुकदमे और संपत्ति का ब्यौरा देना जरूरी तभी हो सका था, जब सुप्रीम कोर्ट ने 2002 में ऐसा करने के लिए केंद्र सरकार को स्पष्ट आदेश दिया। उससे पहले केंद्र सरकार इसके लिए तैयार ही नहीं थी। केंद्र सरकार ने तब सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को पसंद नहीं किया था। अधिकतर राजनीतिक दल भी नहीं चाहते थे कि ऐसी व्यक्तिगत सूचनाएं जगजाहिर की जाएं। नतीजतन सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को बेअसर करने के लिए केंद्र सरकार ने तब राष्ट्रपति से अध्यादेश जारी करवा दिया। बाद में उसे संसद ने पारित करके कानून का भी दर्जा दे दिया, पर सुप्रीम कोर्ट ने उस कानून को रद्द कर दिया। उसके बाद ही ये सूचनाएं चुनाव में नामांकन पत्र भरने के साथ उम्मीदवार देने को बाध्य हो रहे हैं। यानी जिस देश के अधिकतर राजनीतिक दल और नेतागण अपने बारे में सामान्य सूचनाएं भी सार्वजनिक करने को तैयार नहीं, वे अपराधियों को चुनाव लडऩे से हमेशा के लिए रोकने के लिए खुद कोई कानून बनाने को तैयार हो जाएंगे, ऐसा फिलहाल लगता नहीं है।

संपत्ति की भी होगी जांच
सूत्रों की मानें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शीघ्र ही अपनी पार्टी के विधायक, मंत्री और सांसदों की संपत्ति की संपत्ति की जांच करवाने वाले हैं। मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले पार्टी के सभी विधायक, सांसद और मंत्रियों को अपनी-अपनी संपत्ति का ब्यौरा देना होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पार्टी के सभी सांसदों एवं मंत्रियों से 31 अगस्त तक अपनी-अपनी संपत्ति का ब्यौरा देने को कहा था, लेकिन अधिकांश सांसदों और मंत्रियों ने अपनी संपत्ति का ब्यौरा पेश नहीं किया है। सूत्रों की माने तो सरकार के खुफिया विभाग को भी संपत्ति की जानकारी जुटाने के निर्देश दे दिए गए हैं।

मप्र के 32 फीसदी विधायक दागदार
नेशनल इलेक्शन वॉच की मध्यप्रदेश इकाई और लोकतंत्र सुधार संघ (एडीआर) के अनुसार, चौदहवीं विधानसभा दागियों से भरपूर है। मतदाताओं ने जो नुमाइंदे चुनकर विधानसभा में भेजे हैं उनमें 73 (32 प्रतिशत )के खिलाफ विभिन्न धाराओं में आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं। इनमें 45 तो ऐसे हैं जिनके विरुद्ध डकैती, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ जैसे गंभीर प्रकरण चल रहे हैं जबकि, 2008 की विधानसभा में 26 प्रतिशत विधायकों के खिलाफ ही आपराधिक मामले थे।
मध्यप्रदेश इलेक्शन वॉच संस्था ने विधायकों के आपराधिक रिकार्ड का खुलासा करते हुए दावा किया है कि भाजपा के निर्वाचित 165 में से 48 विधायकों (29 प्रतिशत), कांग्रेस के 58 में से 22 विधायकों (38 प्रतिशत, बसपा के चार में से एक (25 प्रतिशत) एवं दो निर्दलीय विधायकों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों की घोषणा की है। आपराधिक पृष्ठभूमि वाले 73 विधायकों में से 45 पर अपहरण, डकैती, महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे गंभीर मामले दर्ज हैं। उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट के जुलाई 2013 के एक फैसले से ऐसे सांसद और विधायकों की सदस्यता पर खतरा मंडराने लगा था जिन्हें भ्रष्टाचार सहित ऐसे आपराधिक मामले में अदालत द्वारा दोषी ठहरा दिया गया हो जिसके लिए दो साल या इससे अधिक सजा का प्रावधान हो।
दागियों की सूची तैयार कर रही भाजपा
मिशन 2018-19 की तैयारी में जुटी भाजपा ने आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी के दागी नेताओं की सूची बनाना शुरू कर दी है। इसी सूची के आधार पर विधानसभा और लोकसभा चुनाव में टिकट का वितरण किया जाएगा। भाजपा सूत्रों के मुताबिक विधानसभा चुनाव में करीब 70 प्रत्याशी बदले जाएंगे। दूसरी तरफ आरएसएस ने भी दागी विधायक और मंत्रियों की सूची तैयार की है। सूत्रों की मानें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की टीम मध्यप्रदेश में गुप्त सर्वे कर चुकी है, जिसके आधार पर विधायक और मंत्रियों का परफॉरमेंस रिपोर्ट कार्ड तैयार किया है। मोदी सरकार के तीन साल के कार्यकाल में केंद्र में एक भी भ्रष्टाचार का मामला सामने नहीं आया है, इसी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजनीति में भी स्वच्छता लाने के प्रयास में जुटे हैं।
मप्र के 30 प्रतिशत मंत्री दागदार
हाल ही में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स द्वारा जारी की गई रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। रिपोर्ट बताती है कि सार्वजनिक जीवन में हमारे जिम्मेदार किस कदर समाज में वैमनस्य फैलाने में अव्वल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक मध्यप्रदेश का प्रतिनिधित्व करने वाले मंत्रियों के खिलाफ राष्ट्रीय एकता को खतरे में डालने से लेकर सार्वजनिक स्थल पर अश्लीलता फैलाने तक के केस दर्ज हैं। यही नहीं, जिन पर सरकार चलाने का जिम्मा है, उनमें से ज्यादातर के खिलाफ शासकीय कार्य में बाधा पहुंचाने के केस तक चल रहे हैं। ये जितने चौंकाने वाले तथ्य हैं, उतना ही सोचने पर भी मजबूर करते हैं। ये वो मामले हैं, जिनकी जानकारी खुद इन नेताओं ने अपने चुनावी हलफनामे में भी दी है, लिहाजा रिपोर्ट के गलत या फर्जी होने पर संदेह करने की कोई जरुरत महसूस नहीं होती।मध्यप्रदेश की बात करें तो इस राज्य की स्थिति भी दूसरों से जुदा नहीं। मध्यप्रदेश के 30 में से नौ मंत्रियों ने अपने खिलाफ आपराधिक प्रकरण और पांच ने गंभीर आपराधिक प्रकरण दर्ज होना स्वीकारा है।
फग्गन सिंह कुलस्ते: दंगा भडक़ाने पर हुआ मुकदमा
मंडला लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले फग्गन सिंह कुलस्ते केंद्र सरकार में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री हैं। कुलस्ते ने अपने चुनावी शपथ-पत्र में जो जानकारी दी है, उसके मुताबिक उनके खिलाफ थाना निवास और डिंडोरी में कुल सात केस दर्ज हैं। इनमें दो सीरियस क्रिमिनल केस हैं। कुलस्ते के खिलाफ दंगा भडक़ाने (धारा 148), अवैध रूप से किसी को रोककर रखना (धारा 341) और जानबूझकर चोट पह़ुंचाना (धारा 323) के प्रकरण दर्ज हैं। इसके अलावा उनके खिलाफ ऑब्सीन एक्ट एंड सॉंन्गस (धारा 294) का भी केस दर्ज है। यह सार्वजनिक स्थल पर अश्लीलता से संबंधित है।
नरेंद्र सिंह तोमर: शासकीय आदेश की अवज्ञा
केंद्रीय पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद सिंह तोमर के खिलाफ धारा 188 (स्पेशल रेलवे मजिस्ट्रेट ग्वालियर) के तहत केस दर्ज है। यह शासकीय सेवक के आदेश की अवज्ञा से संबंधित है।
एमजे अकबर: मानहानि के मकदमे
केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर के खिलाफ दिल्ली पटियाला हाउस और कौंतल पश्चिम बंगाल की अदालतों में मानहानि के केस विचाराधीन हैं।
जयभान सिंह पवैया: शासकीय कार्य में बाधा
मध्यप्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री जयभान सिंह पवैया के खिलाफ दो समुदायों के बीच दुश्मनी बढ़ाने और सांप्रदायिक सद्भाव को क्षति पहुंचाने से लेकर डकैती तक के मामले हैं। उनके खिलाफ पूजास्थल को अपत्रित्र करना, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना, राष्ट्रीय एकता को हानि पहुंचाने वाले कार्य, भडक़ाऊ भाषण और शासकीय सेवक को ड्यूटी से रोकने के आरोप हैं। स्पेशल सेशन कोर्ट लखनऊ में चार्ज फ्रेम लिए जा चुके हैं।
रुस्तम सिंह: महिला पर क्रूरता
मध्यप्रदेश के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री रुस्तम सिंह के खिलाफ दो केस दर्ज हैं। इनमें हरियाणा के यमुना नगर थाने में धारा (498 ए) के तहत दर्ज मामला गंभीर है। यह पति और पति के रिश्तेदारों द्वारा किसी महिला पर क्रूरता से संबंधित है। इसके अलावा मुरैना सिटी कोतवाली में उनके खिलाफ शासकीय सेवक को ड्यूटी से रोकना और शासकीय कार्य में बाधा पहुंचाने का मामला दर्ज है।
इसी तरह कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन पर बालाघाट में वर्ष 2008 में आईपीसी की धारा 316 के तहत मामला दर्ज है। जीएडी राज्यमंत्री लाल सिंह आर्य पर हत्या, गोहद भिंड में वर्ष 2004 में न्यायालय का समन न लेने और शासकीय कार्य में बाधा डालने का मामला दर्ज हुआ है। पूर्व मंत्री रंजना बघेल पर मनावर धार में वर्ष 2009 में आईपीसी की धारा 171 बी के तहत मामला दर्ज है। विधायक (इंदौर) रमेश मेंदोला पर वर्ष 2013 में आईपीसी की धारा 13 (1) डी भ्रष्टाचार अधिनियम के तहत प्रकरण दर्ज है। विधायक (घटिया उज्जैन) सतीश मालवीय पर 2008 में आईपीसी की धारा जान से मारने की धमकी देने का मामला दर्ज है। विधायक (नागदा खाचरौद) दिलीप सिंह पर तीन अपराधिक प्रकरण दर्ज हैं। इनमें लोक संपत्ति हानि निवारण का मामला भी दर्ज है। इनमें एक मामला वर्ष 1998 और दो मामले 2008 में दर्ज हुए हैं। विधायक (त्यौंथर) रमाकांत तिवारी पर हत्या के प्रयास का मामला 2008 में दर्ज हुआ है। विधायक (मऊगंज) सुखेन्द्र सिंह पर आत्महत्या के लिए प्रेरित करने सहित मारपीट और अपराध की साजिश करने सहित 2 अन्य मामलों में प्रकरण दर्ज किए गए हैं। इनमें एक मामला वर्ष 1999 और दो मामले 2012 में दर्ज किए गए हैं। विधायक (भिण्ड) नरेन्द्र सिंह पर मारपीट करने सहित तीन अपराधिक मामले वर्ष 2008, 2009 और 2014 में दर्ज हुए हैं। विधायक (पुष्पराजगढ़ अनूपपुर) फुंदेलाल सिंह पर आईपीसी की धारा 188 व 177 के तहत वर्ष 2014 में मामला दर्ज हुआ है। विधायक (हरदा) आरके दोगने पर आईपीसी की धारा 188 में वर्ष 2014 में मामला दर्ज है। विधायक (आगर मालवा) गोपाल परमार पर चार आपराधिक प्रकरण वर्ष 2003, 2011, 2012 और 2014 में दर्ज हुए हैं।
विधायक (शाहपुर) अरूण भीमावद पर धोखाधड़ी करने सहित अन्य धाराओं में वर्ष 2013 में मामला दर्ज हुआ है। विधायक (बंडा) हरवंश सिंह राठौर पर जान से मारने की धमकी सहित अन्य धाराओं में 1999 में मामला दर्ज है। विधायक (देपालपुर) मनोज पटेल पर वर्ष 2001 में सरकारी काम-काज में बाधा डालने सहित अन्य अपराधिक प्रकरण दर्ज हुआ। विधायक (इंदौर) ऊषा ठाकुर पर वर्ष 2001 में धारा 188 का प्रकरण दर्ज हुआ। विधायक (इंदौर) जीतू पटवारी पर 6 आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें सरकारी काम-काज में बाधा डालने सहित बलवा आदि के प्रकरण दर्ज हुए हैं। इन पर वर्ष 2007, 2011, 2012 और 2013 में मामले दर्ज हुए हैं। विधायक (सांवेर) राजेश सोनकर पर वर्ष 2012 में मारपीट का अपराधिक मामला दर्ज हुआ है।
मप्र के दागी विधायक और उनपर दर्ज मामलों की संख्या
क्र. नाम विस.क्षेत्र पार्टी केस संख्या
1 तरूण भनोत जबलपुर पश्चिम कांग्रेस केस-8
2 गिरीश कुमार नरसिंहगढ़ कांग्रेस केस-5
3 जयभान सिंह पवैया ग्वालियर भाजपा केस-1
4 राजेंद्र कुमार सिंह सतना कांग्रेस केस-2
5 केपी सिंह अमरपाटन कांग्रेस केस-1
6 दिलीप शेखावत नागदा खाचरौद भाजपा केस-9
7 मुरलीधर पाटीदार सुसनेर भाजपा केस-5
8 बलवीर सिंह दिमनी बसपा केस-3
9 रुस्तम सिंह मुरैना भाजपा केस-2
10 जालम सिंह नरसिंहपुर भाजपा केस-2
11 भंवरसिंह शेखावत धार भाजपा केस-1
12 अरुण भीमावत शाजापुर भाजपा केस-1
13 गोपाल सिंह चौहान चंदेरी कांग्रेस केस-6
14 संजय पाठक विजयराघवगढ़ भाजपा केस-2
15 रमाकांत तिवारी श्योपुर भाजपा केस-1
16 अंचल सोनकर पूर्वी जबलपुर भाजपा केस-1
17 चंद्रशेखर देशमुख मुलताई भाजपा केस-1
18 सत्यपाल सिंह सुमावली भाजपा केस-4
19 सुख सिंह बाना मऊगंज (रीवा) कांग्रेस केस-3
20 राजेश सोनकर सांवेर भाजपा केस-3
21 सोहनलाल वाल्मिकी परासिया कांग्रेस केस-2
22 सुरेंद्र नाथ सिंह भोपाल मध्य भाजपा केस-2
23 मोती कश्यप बड़वारा भाजपा केस-2
24 सतीश मालवीय घट्टिया कांग्रेस केस-1
25 निशंक जैन बासौदा कांग्रेस केस-1
26 जितेंद्र पटवारी राऊ कांग्रेस केस-6
27 नरेंद्र सिंह कुशवाह भिंड भाजपा केस-5
28 कालू सिंह धरमपुरी भाजपा केस-4
29 मनोज पटेल देपालपुर भाजपा केस-3
30 दिनेश राय सिवनी निर्दलीय केस-3
31 विश्वास सारंग नरेला भाजपा केस-2
32 यादवेंद्र सिंह नागोद कांग्रेस केस-2
33 सुरेंद्र गुप्ता इंदौर-1 भाजपा केस-2
34 इंदर सिंह परमार कालापीपल भाजपा केस-2
35 वेलसिंह भूरिया सरदारपुर भाजपा केस-1
36 विक्रम सिंह राजनगर कांग्रेस केस-1
37 बहादुर सिंह महीदपुर भाजपा केस-1
38 कल सिंह भभर चंदला निर्दलीय केस-1
39 लालसिंह आर्य गोहद भाजपा केस-1
40 गौरिशंकर बिसेन बालाघाट भाजपा केस-1
41 राजेश यादव गरोठ भाजपा केस-1
42 रमेश मंदोला इंदौर-2 भाजपा केस-1
43 महेंद्र सिंह बामौरी कांग्रेस केस-1
44 संजय शर्मा तेंदुखेड़ा भाजपा केस-1
45 अमर सिंह यादव राजगढ़ भाजपा केस-1
46 अजय सिंह चुरहट कांग्रेस केस-2
47 हर्ष सिंह रामपुर बघेलान भाजपा केस-2
48 रामेश्वर शर्मा भोपाल (हुजूर) भाजपा केस-2
49 ऊषा ठाकुर इंदौर-3 भाजपा केस-2
50 गोविंद सिंह लहार कांग्रेस केस-1
51 रामदयाल चंदला भाजपा केस-1
52 शंकरलाल तिवारी सतना भाजपा केस-1
53 शकुंतला खटीक करेरा कांग्रेस केस-1
54 लखन पटेल पथरिया भाजपा केस-1
55 ओम प्रकाश धुर्वे शाहपुरा भाजपा केस-1
56 सज्जन सिंह उइके घोड़ाडोंगरी भाजपा केस-1
57 बाबूलाल गौर गोविंदपुरा भाजपा केस-1
58 कमल मसकुले बालाघाट भाजपा केस-1
59 आरिफ अकील भोपाल उत्तर कांग्रेस केस-1
60 राजेंद्र शुक्ला रीवा भाजपा केस-1
61 राम सिंह यादव कोलारस कांग्रेस केस-1
62 मनोज अग्रवाल कोतमा कांग्रेस केस-1
63 संदीप जायसवाल मुड़वारा भाजपा केस-1
64 कैलाश विजयवर्गीय मऊ भाजपा केस-1
65 निलेश अवस्थी पाटन कांग्रेस केस-1
66 तुकोजीराव पवार देवास भाजपा केस-1
67 कृष्ण श्रीवास्तव टीकमगढ़ भाजपा केस-1
68 हरवंश राठौर बंडा भाजपा केस-1
69 रामनिवास विजयपुर कांग्रेस केस-1
70 बाला बच्चन राजपुर कांग्रेस केस-1
71 रंजना बघेल मनावर भाजपा केस-1
72 सरताज सिंह सिवनी मालवा भाजपा केस-1
73 जसवंत सिंह हांडा शुजालपुर भाजपा केस-1
मध्यप्रदेश के दागी सांसद और उन पर दर्ज केसों की संख्या
1 गणेश सिंह सतना भाजपा केस-2
2 फग्गन सिंह कुलस्ते मंडला भाजपा केस-2
3 लक्ष्मी नारायण यादव सागर भाजपा केस-1
4 ज्योति धुर्वे बैतूल भाजपा केस-2
5 राव उदय प्रताप होशंगाबाद भाजपा केस-1
6 राकेश सिंह जबलपुर भाजपा केस-1
7 नरेंद्र सिंह तोमर ग्वालियर भाजपा केस-1

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