वाराणसी में बीजेपी के लिए राह मुश्किल है

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वाराणसी में चुनाव बीजेपी के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है. यहां विधानसभा चुनाव में कामयाबी पार्टी के लिए नाक का सवाल है क्योंकि वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है. बीजेपी की स्थानीय इकाई में समस्याओं और फूट से पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अनजान नहीं है. मोदी और उनके मंत्रालय ने गंगा की सफाई के दावे बहुत जोर-शोर से किए थे. नमामि गंगा परियोजना को लॉन्च किए जाना इसी का नतीजा था. लेकिन राज्य सरकार और केंद्र की खींचतान के चलते गंगा की सफाई को लेकर खास कुछ नहीं किया जा सका.

इस मुद्दे की काट के तौर पर बीजेपी ने वाराणसी में फतेह को पक्का करने के एक और प्लान तैयार किया. इस प्लान का बड़ा हिस्सा जातिगत राजनीति, दलबदलुओं और गठबंधन पर आधारित है. वाराणसी में आठ विधानसभा क्षेत्र हैं. बीजेपी ने 2012 विधानसभा चुनाव में इन 8 में से 3 सीटों पर जीत हासिल की थी. एसपी को 2, बीएसपी को 2 और कांग्रेस को 1 सीट पर कामयाबी मिली थी. बीजेपी का जोर वाराणसी के ग्रामीण क्षेत्रों में सेंध लगाने पर है. हालांकि शहरी क्षेत्र की सीटों पर कब्जा बरकरार रखना पार्टी के लिए टेढ़ी खीर से कम नहीं है.

शहरी सीटों पर जातिगत राजनीति हावी

बीजेपी को वाराणसी में ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य-बनिया वोटों के समर्थन से बल मिलता है. वहीं दूसरी पार्टियां मुस्लिम, दलित, कुर्मी, यादव वोटों के सहारे चुनावी वैतरणी पार करना चाहते हैं. इस चुनाव में कांग्रेस की पूरी कोशिश है कि सवर्ण वोटों में जितनी संभव हो सके सेंधमारी की जाए. इन वोटों को पारंपरिक तौर पर बीजेपी का समर्थक माना जाता है.

यही वजह है कि कांग्रेस ने वाराणसी की शहरी सीटों से बीजेपी को कड़ी चुनौती देने के लिए मजबूत ब्राह्मण प्रत्याशियों को उतारा है. बीजेपी शहर में पार्टी में अंदरूनी बगावत से पहले ही परेशान है. शहर के मौजूदा अपने तीन विधायकों में से बीजेपी ने एक का टिकट काट दिया. दूसरे को दोबारा टिकट दिया गया. तीसरे विधायक को टिकट ना देकर पार्टी ने उसके बेटे को उम्मीदवार बनाया.

7 बार के विधायक श्याम देव राय चौधरी को बीजेपी ने टिकट ना देकर इस बार नए ब्राह्मण चेहरे नीलकंठ तिवारी पर भरोसा किया. इसी मुद्दे पर बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य जब भी क्षेत्र में आए भारी विरोध का सामना करना पड़ा. हालात इतने काबू से बाहर हुए कि बीजेपी अध्यक्ष को स्थानीय झमेलों से निपटने के लिए खुद कमान संभालनी पड़ी.

जाति समीकरणों को साधने के लिए बीजेपी का दारोमदार गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलितों को अपनी ओर मोड़ने पर है. यूपी में जहां पांच चरणों में मतदान संपन्न हो चुका है वहां चाहे गैर यादव ओबीसी मतों का लाभ बीजेपी को मिला हो और समाजवादी पार्टी के लिए परेशानी खड़ी हुई हो लेकिन वाराणसी में समय ही बताएगा कि बीजेपी को इस रणनीति का कितना फायदा मिलता है.

अमित शाह का जोर शहर की तीन सीटों पर कब्जा बरकरार रखने के साथ ग्रामीण क्षेत्र की 5 सीटों पर भी ज्यादा से ज्यादा अपना दबदबा बनाने की है. बीजेपी की हड़बड़ी इसी बात से देखी जा सकती है कि बीते हफ्ते पार्टी के कमान मुख्यालय को लखनऊ से बदल कर वाराणसी ले आया गया. मुस्लिम, यादव, ब्राह्मण, वैश्य और दलित मुख्य पक्ष हैं जिनका वोट प्रतिशत 6 से 9% के बीच है.

वाराणसी चुनाव में जयापुर गांव प्रतिष्ठा का सवाल

वाराणसी के बाह्यक्षेत्र में स्थित सेवापुरी विधानसभा सीट के अंतर्गत जयापुर आता है. ये वही गांव है जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद ग्राम योजना के तहत मॉडल गांव के तौर पर गोद ले रखा है. सेवापुरी सीट पिछली बार समाजवादी पार्टी के कुर्मी उम्मीदवार के खाते में गई थी. इस बार इस सीट को छीनने के इरादे से बीजेपी के समर्थन से अपना दल की ओर से कुर्मी उम्मीदवार नील रतन नीलू मैदान में हैं. सेवापुरी से हमेशा कुर्मी उम्मीदवार के जीतने का इतिहास रहा है.

जहां तक विकास की बात है तो कहा जा सकता है कि जयापुर ने अच्छे दिनों को देखा है. यहां इंटरलॉक सड़कों का निर्माण हुआ. अब ये बात अलग है कि उनकी टाइल्स टूट चुकी हैं. सोलर चार्जर लगाया गया लेकिन उसकी बैट्री चोरी हो चुकी है. टॉयलेट्स बनाए गए लेकिन पानी की आपूर्ति से उन्हें नहीं जोड़ा गया. पानी के ओवरहैड टेंक बनाए गए लेकिन उनमें पानी नहीं है. ऐसे में विकास तो हुआ लेकिन उसका लाभ गरीबों तक पहुंचने की कोई गारंटी नहीं.

ग्राउंड जीरो पर लोगों से जुड़े कई मुद्दे हैं लेकिन राजनीतिक दल जातिगत समीकरणों पर तवज्जो दे रहे हैं. ये देखना दिलचस्प होगा कि लोगों का इस पर क्या रुख रहेगा. अपना दल के रोहनिया सीट को लेकर बीजेपी से मतभेद रहे हैं क्योंकि यहां से वो अपना उम्मीदवार उतारना चाहता था लेकिन आखिरकार बीजेपी उम्मीदवार को ही यहां से भाग्य आजमाने का मौका मिला.

बगावत और भितरघात से पार्टी को हो सकता है नुकसान

टिकट बंटवारे को लेकर असंतोष एक वो बड़ा मुद्दा है जिस पर बीजेपी को पार पाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ रही है. वाराणसी की एक सीट से बीजेपी के मौजूदा विधायक श्याम देव राय चौधरी अपना टिकट कटने को खुद के खिलाफ साजिश मान रहे हैं. चौधरी को क्षेत्र में दादा के नाम से जाना जाता है. एक और मौजूदा विधायक के बेटे को टिकट दिया गया है. इससे भी पार्टी के कई कार्यकर्ता नाखुश हैं और अमित शाह और केशव प्रसाद मौर्य के सामने नाराजगी भी जता चुके हैं.

वाराणसी कैंट से मौजूदा विधायक ज्योत्सना श्रीवास्तव की जगह सौरभ श्रीवास्तव को टिकट दी गई है. वाराणसी के शहरी क्षेत्र की 3 सीटों के मौजूदा विधायकों में से सिर्फ रविंद्र जैसवाल ही हैं जिन्हें पार्टी ने इस बार भी उम्मीदवार बनाया है. हालांकि यहां से बीजेपी के एक कार्यकर्ता सुजीत सिंह टीका भी टिकट के दावेदार थे, टिकट नहीं मिला तो अब वो निर्दलीय ही चुनावी मैदान में ताल ठोक रहे हैं.

बीएसपी से दलबदल कर बीजेपी में आए स्वामी प्रसाद के सहयोगी उदय लाल मौर्य पिछले चुनाव में बीएसपी टिकट से चुनाव जीते थे. इस बार स्वामी प्रसाद के साथ उन्होंने भी बीजेपी का दामन थाम लिया. लेकिन शिवपुर सीट से बीजेपी ने उदय लाल मौर्य की जगह एक और दलबदलू अनिल राजभर पर भरोसा करते हुए उन्हें टिकट दिया.अजगेरा की एससी सीट पर पिछली बार बीएसपी को कामयाबी मिली थी. इस बार बीजेपी ने इस सीट पर भारतीय समाज पार्टी के कैलाश नाथ सोनकर के साथ चुनावी तालमेल किया है

नमामि गंगा प्रोजेक्ट के बावजूद गंगा साफ नहीं

वाराणसी के घाटों के सतही सौंदर्यीकरण के अलावा गंगा में कुछ भी नहीं बदला है. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने फरवरी में एक सुनवाई के दौरान कहा, गंगा की एक बूंद भी अब तक साफ नहीं हुई है. एनजीटी ने सार्वजनिक पैसे को व्यर्थ खर्च करने के लिए सरकारी एजेंसियों को लताड़ लगाई. जल प्रदूषण का स्तर पहले जैसे ही बरकरार है. केंद्र के नमामि गंगा प्रोजेक्ट का अभी तेजी पकड़ना बाकी है.

केंद्रीय मंत्री उमा भारती इसके लिए अखिलेश यादव सरकार की ओर से खड़ी की गई समस्याओं को जिम्मेदार बताती हैं. लेकिन वाराणसी के लोगों ने बड़ी उम्मीदों के साथ मोदी को वोट किया था. करीब 2000 करोड़ का बजट इस प्रोजेक्ट के लिए आवंटित किया गया था. कौन भूल सकता है उन दृश्यों को जब मोदी खुद सफाई के लिए बनारस के घाट पर सामने आए थे. विडंबना ये है कि पिछले 3 साल में ज्यादा कुछ बदलाव नहीं हुआ. किन्हीं नए सीवरों का निर्माण नहीं हुआ.

स्थानीय विधायकों का कामकाज बीजेपी के लिए समस्या

वाराणसी में बीजेपी के मौजूदा विधायक केंद्र की परियोजनाओं का लोगों में प्रचार नहीं कर सके. साथ ही जमीनी स्तर पर उनका प्रदर्शन भी खास नहीं रहा. इन विधायकों का अपना कोई बड़ा आधार नहीं रहा. वे मोदी के नाम की रट लगाकर ही चुनावी नैया पार लगाना चाहते हैं. इसके अलावा नोटबंदी ने वैश्य-बनिया मतदाताओं को नुकसान पहुंचाया है. विकास के नाम पर शहर में जगह जगह सड़कों को खोद दिया गया. गगोलिया चौराहे पर दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के दौरान हिंदू श्रद्दालुओं पर लाठीचार्ज के दौरान बीजेपी का चुप्पी साधे रखने से भी कुछ मतदाता नाराज हैं.

परिवर्तन के नाम पर वोट मांग रही है बीजेपी

अब जबकि मोदी पहले से ही वाराणसी के सांसद हैं, अब उनके नाम पर फिर सपनों को बेचना टेढ़ी खीर से कम नहीं है. विकास के नाम पर ज्यादा कुछ खास नहीं हुआ है. बीजेपी के नेता वाराणसी में अधिक से अधिक मतदाताओं तक पहुंचने के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं. केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने हालिया यात्राओं के दौरान परिवर्तन के नाम पर वोट मांगे. प्रधानमंत्री मोदी को आखिरी चरण के मतदान के लिए 4 और 5 मार्च को होने प्रचार में पूरा जोर लगाना होगा. बहरहाल ये देखना दिलचस्प होगा कि बनारसी मतदाताओं के दिलों को जीतने के लिए बीजेपी का परिवर्तन का नारा और जातिगत समीकरणों का कॉकटेल कितना कारगर रहता है.

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